राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | प्रयागराज/नई दिल्ली | 6 अगस्त 2026
पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, बेरोजगारी, भर्ती में देरी और युवाओं के भविष्य को लेकर राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान अब खुद एक बड़े राजनीतिक और लोकतांत्रिक विवाद के केंद्र में आ गया है। राजस्थान के कोटा से शुरू हुए इस अभियान के बाद उत्तराखंड के देहरादून में कार्यक्रम के लिए पहले तय स्थान की अनुमति वापस ली गई और अब उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 8 अगस्त को प्रस्तावित कार्यक्रम से ठीक पहले KP कॉलेज मैदान की अनुमति भी वापस लिए जाने का मामला सामने आया है। कांग्रेस इसे महज संयोग मानने को तैयार नहीं है। उसका आरोप है कि BJP शासित राज्यों में राहुल गांधी और छात्रों के सीधे संवाद को रोकने के लिए प्रशासनिक अड़चनें खड़ी की जा रही हैं। दूसरी ओर आयोजन स्थल से जुड़े पक्ष ने शैक्षणिक गतिविधियों और न्यायालय के निर्देशों जैसे कारणों का हवाला दिया है। सवाल फिर भी अपनी जगह है—राहुल गांधी के सामने छात्रों के बोलने और अपने सवाल रखने से आखिर किसे परेशानी है?
‘छात्रों की गूंज’ को केवल राहुल गांधी की एक राजनीतिक रैली के रूप में देखना पूरे घटनाक्रम की तस्वीर को छोटा कर देना होगा। इस अभियान का घोषित केंद्र पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, भर्ती में देरी, बेरोजगारी और युवाओं का भविष्य है। राजस्थान के कोटा से इसकी शुरुआत हुई, जहां बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र रहते हैं। राहुल गांधी ने युवाओं से सीधा संवाद कर उनकी परेशानियां सुनीं और शिक्षा तथा भर्ती व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए। इसके बाद इस अभियान को दूसरे राज्यों और शहरों तक ले जाने की योजना बनाई गई। कांग्रेस इसे ऐसी राष्ट्रीय मुहिम के रूप में पेश कर रही है जिसमें मंच पर केवल नेता नहीं बोलेगा, बल्कि छात्र भी अपनी कहानी, संघर्ष और सवाल देश के सामने रखेंगे।
यही ‘छात्रों की गूंज’ की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत भी है। किसी राजनीतिक सभा में नेता सरकार पर आरोप लगाए तो सत्ता उसे विपक्ष की राजनीति कहकर खारिज कर सकती है, लेकिन जब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र खुद बताता है कि उसने कितने वर्षों तक पढ़ाई की, कितनी परीक्षाएं दीं, कितने फॉर्म भरे, कितनी बार परीक्षा रद्द हुई, पेपर लीक होने से उसके कितने साल बर्बाद हुए और नौकरी का इंतजार करते-करते उसकी उम्र कहां पहुंच गई, तो उस कहानी को महज राजनीतिक भाषण बताना आसान नहीं होता। राहुल गांधी इसी व्यक्तिगत पीड़ा को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
कोटा से उठी आवाज, देहरादून में मैदान बदला और अब प्रयागराज में विवाद
राजस्थान के कोटा के बाद ‘छात्रों की गूंज’ उत्तराखंड पहुंची। देहरादून में राहुल गांधी के कार्यक्रम के लिए पहले तय स्थल की अनुमति वापस लिए जाने के बाद कार्यक्रम को दूसरे मैदान में स्थानांतरित करना पड़ा। उस समय भी कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि BJP सरकार राजनीतिक दबाव के जरिए राहुल गांधी के छात्र संवाद में बाधा डाल रही है। प्रशासन और संबंधित संस्थाओं की ओर से अपने कारण बताए गए, लेकिन राजनीतिक विवाद थमा नहीं।
अब लगभग वैसी ही तस्वीर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में सामने आने के बाद कांग्रेस का आरोप और तीखा हो गया है। 8 अगस्त को राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम KP कॉलेज मैदान में प्रस्तावित था। तैयारियां चल रही थीं, कांग्रेस नेताओं ने स्थल का निरीक्षण किया और छात्रों तथा प्रतियोगी अभ्यर्थियों की बड़ी भागीदारी की तैयारी की जा रही थी। लेकिन कार्यक्रम से ऐन पहले मैदान की अनुमति वापस लिए जाने से पूरा मामला राजनीतिक टकराव में बदल गया।
अब सवाल केवल इतना नहीं है कि KP कॉलेज का मैदान मिलेगा या कोई दूसरा मैदान तलाशना पड़ेगा। सवाल यह है कि बार-बार राहुल गांधी के छात्र कार्यक्रमों के आयोजन स्थल पर ही अंतिम समय में संकट क्यों खड़ा हो रहा है? कांग्रेस इसे BJP शासित राज्यों में उभरते एक पैटर्न के रूप में पेश कर रही है। हालांकि बिना प्रत्यक्ष दस्तावेज के यह अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता कि प्रत्येक अनुमति राज्य सरकार के सीधे राजनीतिक आदेश पर रद्द हुई, लेकिन लगातार ऐसी परिस्थितियां पैदा होना विपक्ष को सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का पर्याप्त राजनीतिक मौका जरूर दे रहा है।
प्रयागराज का चुनाव BJP के लिए राजनीतिक रूप से ज्यादा असहज क्यों?
प्रयागराज केवल उत्तर प्रदेश का एक बड़ा शहर नहीं है। यह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं की उम्मीदों, संघर्ष और बेचैनी का बड़ा केंद्र है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग सहित तमाम सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी यहां वर्षों गुजारते हैं। छोटे शहरों और गांवों से परिवार अपनी सीमित कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च कर बच्चों को प्रयागराज भेजते हैं। कोई पांच साल से तैयारी कर रहा है, कोई सात साल से; किसी की परीक्षा टलती है, किसी की भर्ती अटकती है और किसी को पेपर लीक की खबर अपनी वर्षों की मेहनत पर पानी फेरती दिखाई देती है।
ऐसे शहर में राहुल गांधी यदि हजारों युवाओं के बीच बैठकर पेपर लीक, भर्ती और बेरोजगारी पर उनकी बात सुनते हैं, तो उसका राजनीतिक असर किसी सामान्य रैली से कहीं ज्यादा हो सकता है। कांग्रेस इस बात को समझती है और BJP भी इस राजनीतिक चुनौती से अनजान नहीं हो सकती। इसलिए प्रयागराज का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि इस बड़ी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है कि भारत के युवाओं की नाराजगी और बेचैनी की राजनीतिक आवाज आखिर कौन बनेगा?
NEET आंदोलन के बाद बदल चुका है ‘छात्रों की गूंज’ का संदर्भ
इस बीच NEET पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन ने छात्र राजनीति का पूरा माहौल बदल दिया है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई और उसके बाद आंदोलनकारी युवाओं द्वारा लाठीचार्ज, हिरासत, उत्पीड़न, महिलाओं के साथ कथित बदसलूकी तथा पैलेट गन के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद शिक्षा व्यवस्था का सवाल केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रहा। अब इसके साथ लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार और पुलिस की जवाबदेही भी जुड़ गई है।
राहुल गांधी ने आंदोलन में शामिल कई युवाओं से मुलाकात कर उनकी बातें सार्वजनिक रूप से सुनीं। छात्रों ने उनके सामने पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को राजनीतिक रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए जवाब मांगा। इन आरोपों की अंतिम सत्यता जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से तय होगी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने राहुल गांधी की छात्र राजनीति को नया राजनीतिक आधार जरूर दिया है।
यही कारण है कि प्रयागराज में होने वाला ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम अब कोटा में हुए शुरुआती कार्यक्रम जैसा नहीं रह गया है। बीच में NEET आंदोलन, छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई, संसद में सरकार से जवाब की मांग और युवाओं के सीधे सामने आने जैसे घटनाक्रम हो चुके हैं। अब यदि प्रयागराज के हजारों प्रतियोगी अभ्यर्थी राहुल गांधी के सामने अपनी समस्याएं रखते हैं तो मंच से केवल पेपर लीक का सवाल नहीं उठेगा—वह सवाल इस बात तक जाएगा कि देश में अपनी परीक्षा, नौकरी और भविष्य के लिए आवाज उठाने वाले युवाओं के साथ सरकार और व्यवस्था का व्यवहार कैसा होना चाहिए।
सवाल राहुल गांधी का नहीं, छात्रों के बोलने के अधिकार का है
BJP यह तर्क दे सकती है कि ‘छात्रों की गूंज’ कांग्रेस का राजनीतिक अभियान है और राहुल गांधी इसके जरिए युवाओं के असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलना चाहते हैं। यह राजनीतिक तौर पर अस्वाभाविक भी नहीं है। विपक्ष का काम ही सरकार की नीतियों की कमजोरियों को उठाना और उससे राजनीतिक समर्थन हासिल करना होता है। लेकिन इससे छात्रों के सवाल खत्म नहीं हो जाते।
यदि पेपर लीक नहीं हो रहे हैं तो सरकार रिकॉर्ड रखे। यदि भर्ती व्यवस्था बेहतर हुई है तो आंकड़े बताए। यदि बेरोजगारी को लेकर विपक्ष गलत तस्वीर पेश कर रहा है तो सरकार अपने आंकड़ों से उसका जवाब दे। यदि NEET प्रदर्शनकारियों के आरोप गलत हैं तो जांच, CCTV फुटेज, पुलिस रिकॉर्ड और संबंधित आदेश सामने रखे जाएं। लोकतंत्र में राजनीतिक आरोपों का सबसे मजबूत जवाब तथ्य होते हैं—मैदान की अनुमति रद्द करना नहीं।
और यही वजह है कि ‘छात्रों की गूंज’ के आयोजन स्थलों पर बार-बार पैदा हो रहे विवाद BJP के लिए राजनीतिक रूप से उलटे पड़ सकते हैं। राहुल गांधी की सभा सामान्य तरीके से हो जाए तो वह एक दिन की खबर हो सकती है। लेकिन सभा से पहले अनुमति रद्द हो, मैदान बदले और कांग्रेस को यह कहने का अवसर मिले कि सरकार छात्रों की आवाज से डर गई है, तो कार्यक्रम होने से पहले ही उसका राजनीतिक संदेश कई गुना बड़ा हो जाता है।
लोकतंत्र में मैदान सरकार का हो सकता है, आवाज जनता की है
किसी भी सरकार और प्रशासन के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने का पूरा अधिकार है। किसी कार्यक्रम से वास्तविक सुरक्षा संबंधी समस्या हो, शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित होती हों या न्यायालय का कोई स्पष्ट आदेश बाधा बनता हो तो प्रशासन अनुमति न देने का निर्णय ले सकता है। लेकिन ऐसे निर्णय पारदर्शी होने चाहिए। कारण लिखित रूप में सामने आने चाहिए और जहां संभव हो, वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में असहमति को जगह देना सरकार की उदारता नहीं, संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में है। यह अधिकार केवल उस नागरिक के लिए नहीं है जो सरकार की प्रशंसा करता है; इसकी असली परीक्षा तभी होती है जब सरकार के सबसे तीखे आलोचक को भी अपनी बात कहने की जगह मिले।
‘संविधान’ या विपक्ष का तंज—‘संघ-विधान’?
यहीं से कांग्रेस और विपक्ष का BJP तथा RSS पर सबसे तीखा राजनीतिक हमला शुरू होता है। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि एक तरफ सरकार संविधान की बात करती है, संसद में संविधान की शपथ ली जाती है और लोकतंत्र की मजबूती के दावे किए जाते हैं; दूसरी तरफ BJP शासित राज्यों में विपक्ष और छात्र आंदोलनों के कार्यक्रमों को लेकर बार-बार प्रशासनिक अड़चनों के आरोप सामने आते हैं।
इसी विरोधाभास पर विपक्षी राजनीति का बेहद तीखा तंज बन रहा है—देश संविधान से चल रहा है या ‘संघ-विधान’ से?
यह राजनीतिक नारा है, कानूनी निष्कर्ष नहीं। लेकिन BJP इस सवाल को केवल विपक्ष का प्रचार बताकर खत्म नहीं कर सकती। उसे अपने प्रशासनिक फैसलों से साबित करना होगा कि विरोध करने वाले नागरिक और विपक्षी नेता भी उतनी ही स्वतंत्रता से अपनी बात रख सकते हैं जितनी सत्ता समर्थक संगठन।
यदि राहुल गांधी की राजनीति गलत है तो BJP जनता के बीच जाकर उसका जवाब दे। यदि कांग्रेस छात्रों को भ्रमित कर रही है तो BJP उन्हीं छात्रों के बीच जाकर तथ्य रखे। यदि पेपर लीक और बेरोजगारी पर सरकार का रिकॉर्ड बेहतर है तो उसे देश के सामने रखे। लेकिन छात्रों और नेता प्रतिपक्ष के बीच संवाद के लिए मैदान ही उपलब्ध न हो, तो सवाल सरकार से ही पूछा जाएगा।
राहुल गांधी के भाषण से ज्यादा छात्रों के माइक्रोफोन का डर?
‘छात्रों की गूंज’ की सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि इसमें राहुल गांधी से ज्यादा राजनीतिक असर उन छात्रों की बातों का हो सकता है जिन्हें मंच मिलता है। कोई छात्र यदि कहता है कि उसके पिता ने जमीन बेचकर पढ़ाया, लेकिन पेपर लीक हो गया; कोई बताता है कि पांच साल से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है; कोई भर्ती परीक्षा के बाद वर्षों से नियुक्ति का इंतजार कर रहा है; कोई NEET आंदोलन के दौरान अपने साथ कथित पुलिस कार्रवाई की कहानी सुनाता है—तो ये आवाजें सामान्य चुनावी भाषण से ज्यादा असर छोड़ सकती हैं।
और शायद यही कारण है कि ‘छात्रों की गूंज’ नाम अपने आप में राजनीतिक संदेश बनता जा रहा है। यह राहुल गांधी की आवाज से ज्यादा उन युवाओं की आवाज का दावा करता है जो खुद बोलना चाहते हैं।
BJP के सामने राजनीतिक चुनौती राहुल गांधी अकेले नहीं हैं। असली चुनौती वह युवा है जिसके हाथ में अब माइक्रोफोन आ रहा है और जो पूछ रहा है—मेरा पेपर क्यों लीक हुआ? मेरी भर्ती क्यों रुकी? मेरी नौकरी कहां है? शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों हुआ? और यदि मैं सरकार से सवाल पूछूं तो क्या मुझे अपनी बात कहने के लिए मैदान भी नहीं मिलेगा?
कोटा से प्रयागराज तक सवाल एक ही—युवाओं की आवाज आखिर क्यों रोकी जाए?
कोटा से शुरू हुई ‘छात्रों की गूंज’ देहरादून होते हुए अब प्रयागराज पहुंची है। रास्ते में मैदान बदल रहे हैं, अनुमतियों पर विवाद हो रहा है और राजनीतिक आरोप तेज होते जा रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच एक बात BJP को समझनी होगी—किसी कार्यक्रम का स्थान बदला जा सकता है, किसी मैदान की अनुमति रद्द हो सकती है, मंच कहीं और लगाया जा सकता है, लेकिन युवाओं के भीतर जमा सवालों को किसी प्रशासनिक आदेश से रद्द नहीं किया जा सकता।
पेपर लीक BJP या कांग्रेस देखकर किसी छात्र का भविष्य बर्बाद नहीं करता। बेरोजगारी किसी युवा का राजनीतिक दल देखकर दरवाजा नहीं खटखटाती। वर्षों तक भर्ती लटकने की कीमत पूरा परिवार चुकाता है। इसलिए छात्रों के सवालों को विपक्ष की राजनीति कहकर खारिज करना सरकार के लिए आसान रास्ता जरूर हो सकता है, समाधान नहीं।
राहुल गांधी इस असंतोष को राजनीतिक मंच दे रहे हैं—यह स्पष्ट है। कांग्रेस इसका राजनीतिक लाभ चाहेगी—यह भी राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है। BJP को इसका जवाब भी राजनीतिक और नीतिगत स्तर पर देना चाहिए। मैदान से नहीं, मैदान में उतरकर।
और यही प्रयागराज विवाद का सबसे बड़ा संदेश है। यदि देश सचमुच संविधान से चलता है तो छात्रों को बोलने दीजिए, सरकार को जवाब देने दीजिए और जनता को तय करने दीजिए कि कौन सही है। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की ताकत इस बात से साबित नहीं होती कि वह कितनी आवाजें रोक सकती है; ताकत इससे साबित होती है कि वह अपने खिलाफ उठने वाली सबसे असुविधाजनक आवाज को भी सुनने का साहस रखती है।
आखिर राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ से इतना डर क्यों? अगर युवाओं के सवाल गलत हैं तो जवाब दीजिए। अगर आरोप झूठे हैं तो तथ्य रखिए। लेकिन यदि कोटा से उठी आवाज को देहरादून और प्रयागराज में मैदान के लिए भी संघर्ष करना पड़े, तो विपक्ष का यह सवाल और तेज होगा—देश संविधान से चल रहा है या सत्ता अपने आलोचकों के लिए कोई नया ‘संघ-विधान’ लिख रही है?क्योंकि मैदान रोका जा सकता है, सवाल नहीं; मंच बदला जा सकता है, युवाओं की गूंज नहीं।




