राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/छत्रपति संभाजीनगर | 6 अगस्त 2026
नई दिल्ली/छत्रपति संभाजीनगर: NEET पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर से राष्ट्रीय चर्चा में आई Cockroach Janta Party (CJP) ने फिलहाल चुनावी राजनीति में उतरने की अटकलों पर विराम लगाते हुए अपने भविष्य की दिशा स्पष्ट कर दी है। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा है कि संगठन अभी राजनीतिक दल बनकर चुनाव लड़ने के बजाय ‘प्रेशर ग्रुप’ यानी दबाव समूह के रूप में काम करेगा। दीपके के मुताबिक इस समय भारत को ऐसे समूह की जरूरत है जो चुनावी सत्ता हासिल करने के बजाय व्यवस्था और संस्थाओं से जवाबदेही मांगे। इसी रणनीति के तहत CJP अब झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों और नौकरी अभ्यर्थियों के समर्थन में रांची जाने की तैयारी कर रही है।
‘चुनाव को लेकर हमसे ज्यादा मीडिया उत्साहित’—दीपके ने साफ की CJP की रणनीति
अभिजीत दीपके से जब पूछा गया कि क्या जंतर-मंतर आंदोलन के बाद CJP अब राजनीतिक पार्टी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने जा रही है, तो उन्होंने कहा कि शायद संगठन से ज्यादा मीडिया इस संभावना को लेकर उत्साहित है। दीपके ने स्पष्ट किया कि “फिलहाल CJP एक प्रेशर ग्रुप के रूप में काम करेगी, क्योंकि अभी भारत को एक प्रेशर ग्रुप की जरूरत है।” यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि NEET आंदोलन के बाद लगातार यह सवाल उठ रहा था कि क्या CJP भी किसी बड़े जनआंदोलन से निकले संगठन की तरह अंततः चुनावी राजनीति की ओर बढ़ेगी। फिलहाल दीपके ने उस संभावना को न तो संगठन का तात्कालिक लक्ष्य बनाया है और न ही चुनावी महत्वाकांक्षा को अपने आंदोलन का केंद्र बताया है।
आखिर ‘प्रेशर ग्रुप’ क्या है और CJP खुद को इसी भूमिका में क्यों देख रही है?
राजनीति विज्ञान में प्रेशर ग्रुप उस संगठित समूह को कहा जाता है जो स्वयं सरकार बनाने या चुनाव लड़कर सत्ता हासिल करने के बजाय सरकार की नीतियों, कानूनों और संस्थागत फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश करता है। राजनीतिक दल का अंतिम उद्देश्य शासन की सत्ता हासिल करना होता है, जबकि दबाव समूह किसी मुद्दे, समुदाय या सार्वजनिक हित के सवाल पर सत्ता और संस्थाओं को प्रभावित करने की कोशिश करता है। धरना, प्रदर्शन, जन अभियान, अदालत का रास्ता, मीडिया के जरिए मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श में लाना, ज्ञापन, सार्वजनिक दबाव और सरकार से बातचीत—ये सभी उसके औजार हो सकते हैं। इस परिभाषा के आधार पर CJP फिलहाल खुद को चुनावी पार्टी से अधिक मुद्दा आधारित जनदबाव संगठन के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
NEET से निकला आंदोलन, अब रांची अगला मोर्चा
CJP की आगे की रणनीति का पहला बड़ा संकेत झारखंड से मिला है। दीपके ने घोषणा की है कि संगठन के लोग रांची जाएंगे और JPSC तथा JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों के साथ खड़े होंगे। झारखंड के नौकरी अभ्यर्थी कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं की CBI जांच की मांग कर रहे हैं। ऐसे में CJP का दिल्ली के NEET आंदोलन से निकलकर दूसरे राज्य के भर्ती परीक्षा आंदोलन में उतरना बताता है कि संगठन स्वयं को केवल एक परीक्षा या एक आंदोलन तक सीमित रखने के बजाय परीक्षा पारदर्शिता, युवाओं के अधिकार और संस्थागत जवाबदेही के व्यापक मंच में बदलना चाहता है।
जंतर-मंतर से मिला मॉडल—सड़क का दबाव बनेगा CJP का सबसे बड़ा हथियार?
CJP ने जुलाई में जंतर-मंतर पर जिस तरह आंदोलन किया, वह उसके भविष्य के मॉडल की झलक भी देता है। संगठन ने छात्रों और युवाओं को सड़क पर लामबंद किया, प्रदर्शन किए और NEET पेपर लीक तथा शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में बनाए रखने की कोशिश की। आंदोलन को उस समय और गति मिली जब पर्यावरण एवं शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और भूख हड़ताल पर बैठे। अब यदि CJP इसी मॉडल को रांची और फिर अन्य राज्यों में परीक्षा तथा रोजगार से जुड़े आंदोलनों तक ले जाती है, तो संगठन की वास्तविक ताकत इस बात से तय होगी कि वह स्थानीय असंतोष को कितनी प्रभावी ढंग से राष्ट्रीय मुद्दे में बदल पाता है।
सोनम वांगचुक बने रहेंगे ‘मेंटर’, CJP उनसे लेगी सलाह
CJP के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास के मुताबिक सोनम वांगचुक संगठन के मेंटर बने रहेंगे और महत्वपूर्ण मामलों में उनसे सलाह ली जाएगी। यह घोषणा इसलिए अहम है क्योंकि जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान वांगचुक की मौजूदगी ने CJP को राष्ट्रीय स्तर पर अतिरिक्त पहचान दिलाई थी। अब संगठन यदि खुद को औपचारिक प्रेशर ग्रुप के रूप में विकसित करता है, तो वांगचुक जैसे सार्वजनिक चेहरे का मार्गदर्शन उसकी आंदोलनकारी पहचान और रणनीति पर प्रभाव डाल सकता है। हालांकि संगठनात्मक निर्णयों में उनकी वास्तविक भूमिका कितनी होगी, यह CJP की आगे बनने वाली संरचना से स्पष्ट होगा।
आंदोलन से संगठन की ओर—CJP के सामने अब असली परीक्षा
जंतर-मंतर पर भीड़ जुटाना और किसी एक मुद्दे पर आंदोलन खड़ा करना एक बात है, लेकिन उसे स्थायी और विश्वसनीय राष्ट्रीय दबाव समूह में बदलना बिल्कुल अलग चुनौती है। इसके लिए CJP को स्पष्ट संगठनात्मक ढांचा, सदस्यता व्यवस्था, नेतृत्व की जवाबदेही, राज्यों में समन्वय, निर्णय लेने की प्रक्रिया और वित्तीय पारदर्शिता विकसित करनी होगी। छत्रपति संभाजीनगर में कोर टीम बनाने की दिशा में हुई बैठक को इसी संक्रमण की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। यानी CJP अब स्वतःस्फूर्त आंदोलन की पहचान से निकलकर एक संगठित संस्था बनने की ओर कदम बढ़ाती दिख रही है।
सबसे बड़ा सवाल पैसा—फंडिंग कहां से आएगी और हिसाब कौन देगा?
किसी भी राष्ट्रीय प्रेशर ग्रुप के सामने सबसे कठिन प्रश्नों में एक उसकी फंडिंग होती है। आंदोलन चलाने, राज्यों में टीम खड़ी करने, यात्रा, कानूनी सहायता, अभियान, कार्यक्रम और संगठनात्मक ढांचे के लिए संसाधनों की जरूरत होती है। CJP की फंडिंग और कानूनी स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं और शिकायतें किए जाने के दावे सामने आए हैं। ऐसे में यदि CJP लंबे समय तक युवाओं और सार्वजनिक जवाबदेही की आवाज बनने का दावा करती है तो उसे अपनी आय, खर्च, दान और संगठनात्मक ढांचे में अधिकतम पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। सत्ता से जवाबदेही मांगने वाले संगठन की विश्वसनीयता की पहली कसौटी स्वयं उसकी जवाबदेही ही होगी।
भारत में प्रेशर ग्रुप की पुरानी परंपरा—सड़क से संसद तक पहुंचने के उदाहरण भी
भारत में दबाव समूह कोई नई अवधारणा नहीं है। मजदूर संगठनों और किसान यूनियनों से लेकर उद्योग संगठनों, पर्यावरण आंदोलनों और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों तक अलग-अलग रूपों में ऐसे संगठन दशकों से सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करते रहे हैं। चिपको आंदोलन ने चुनाव लड़े बिना पर्यावरण नीति पर गहरी छाप छोड़ी, जबकि नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सड़क, अदालत और अंतरराष्ट्रीय मंच—तीनों का इस्तेमाल किया। दूसरी तरफ जेपी आंदोलन और इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसे अभियानों ने अंततः चुनावी राजनीति को भी प्रभावित किया। इसी इतिहास के कारण CJP के ‘हम फिलहाल प्रेशर ग्रुप रहेंगे’ वाले बयान के बाद भी यह सवाल पूरी तरह खत्म नहीं होता कि भविष्य में संगठन किस दिशा में जाएगा।
अन्ना आंदोलन से निकली AAP की कहानी इसलिए बार-बार आएगी सामने
CJP को लेकर चुनावी राजनीति का सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि भारत ने हाल के इतिहास में इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन को आम आदमी पार्टी में बदलते देखा है। अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन स्वयं चुनावी दल नहीं बना, लेकिन अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने 2012 में AAP बनाई और बाद में दिल्ली तथा पंजाब की सत्ता तक पहुंचे। यही वजह है कि जब कोई नया युवा आंदोलन राष्ट्रीय पहचान बनाता है और सरकार पर दबाव डालने की क्षमता प्रदर्शित करता है, तो उसके चुनावी भविष्य को लेकर सवाल स्वतः पैदा होते हैं। अभिजीत दीपके ने फिलहाल इस रास्ते से दूरी बनाई है, लेकिन CJP की दिशा आने वाले वर्षों में उसके आंदोलनों और संगठनात्मक विस्तार से तय होगी।
CJP की ताकत चुनाव नहीं, मुद्दों को जोड़ने की क्षमता से तय होगी
यदि CJP वास्तव में प्रेशर ग्रुप बनी रहती है तो उसकी सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसके कितने विधायक या सांसद हैं, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि वह कितने सार्वजनिक मुद्दों पर व्यवस्था को जवाब देने के लिए मजबूर कर पाती है। NEET से रांची तक की उसकी यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है। यदि संगठन परीक्षा पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े अलग-अलग आंदोलनों को एक साझा राष्ट्रीय मंच देने में सफल होता है, तो चुनाव लड़े बिना भी उसकी राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव क्षमता बढ़ सकती है। लेकिन यदि हर आंदोलन केवल सुर्खियों और सोशल मीडिया तक सीमित रह जाता है, तो ‘राष्ट्रीय प्रेशर ग्रुप’ बनने का दावा टिकना कठिन होगा।
सरकार से जवाबदेही मांगने निकली CJP को खुद भी देनी होगी हर सवाल की जवाबदेही
CJP के लिए आने वाला दौर आंदोलन से कहीं अधिक कठिन होगा। सड़क पर व्यवस्था से सवाल पूछने वाले संगठन को अपने भीतर भी वही मानदंड अपनाने होंगे—नेतृत्व कैसे चुना जाता है, पैसा कहां से आता है, निर्णय कौन करता है, किसी आंदोलन को समर्थन देने का आधार क्या है और संगठन की कानूनी संरचना क्या है। यही पारदर्शिता तय करेगी कि CJP एक टिकाऊ जनदबाव समूह बनती है या किसी एक दौर के असंतोष की अभिव्यक्ति बनकर रह जाती है।
फिलहाल अभिजीत दीपके का संदेश स्पष्ट है—CJP की नजर संसद की सीट पर नहीं, सत्ता और संस्थाओं पर दबाव बनाने पर है। जंतर-मंतर के बाद उसका अगला पड़ाव रांची है। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि पोस्टर और संसद के बीच की दूरी हमेशा उतनी स्थायी नहीं होती जितनी शुरुआत में दिखाई देती है। CJP उस दूरी को बनाए रखती है या किसी दिन उसे पार करती है—यह उसके भविष्य की सबसे दिलचस्प राजनीतिक कहानी होगी।




