ओपिनियन | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अगस्त 2026
‘गजब होई गवा’—कुछ बातें अनुवाद में अपना मजा खो देती हैं
गजब होई गवा! इसे अंग्रेजी में कैसे कहेंगे? Amazing? Incredible? Wonderful? शायद इनमें से कोई शब्द इसका असली मजा नहीं पकड़ सकता। भाषा केवल शब्दों का मतलब नहीं होती, उसके पीछे भावना होती है, मिट्टी की खुशबू होती है और बोलने वाले के चेहरे की मुस्कान होती है। जैसे हिंदी की गाली को अंग्रेजी या फ्रेंच में बदल देने से उसका वही असर नहीं रहता, वैसे ही ‘गजब होई गवा’ का अनुवाद कर दीजिए तो उसकी जान निकल जाती है। शायद देश की नई पीढ़ी, जिसे हम Gen Z कहते हैं, के इस आंदोलन को समझने के लिए भी यही देसी शब्द सबसे ठीक है—गजब! इस पीढ़ी ने दिखाया है कि आंदोलन का मतलब केवल गुस्सा, पत्थर, हिंसा और गाली नहीं होता। विरोध हंसते हुए भी हो सकता है। सत्ता को सवालों के सामने खड़ा करने के लिए चेहरे पर गुस्सा और हाथ में पत्थर जरूरी नहीं; कभी-कभी एक जोरदार ठहाका भी बहुत कुछ कह देता है।
पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी, बच्चों ने पूछा—ये ‘लाफिंग बम’ है क्या?
जंतर-मंतर के आंदोलन की सबसे दिलचस्प तस्वीर शायद यही रही। सामने पुलिस थी, बैरिकेड थे, वाटर कैनन थे, आंसू गैस थी और दूसरी तरफ युवा लड़के-लड़कियां। सामान्य तौर पर ऐसी तस्वीर देखकर मन में डर आता है। लेकिन इस पीढ़ी ने डर की तस्वीर को भी मजाक में बदल दिया। आंसू गैस आई तो मानो सवाल था—ये आंसू गैस है या हमें हंसाने वाला कोई नया बम? पानी की बौछार आई तो युवा ऐसे झूमे जैसे मानसून की पहली बारिश आ गई हो। बैरिकेड हटे तो उन्हें भारी सरकारी लोहे की दीवार समझने के बजाय खिलौने की तरह लिया गया। रस्सियां सामने आईं तो रस्साकशी शुरू हो गई। जिस चीज से डर पैदा होना था, उसी को खेल बना देना शायद इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत थी। सत्ता के लिए इससे कठिन स्थिति क्या होगी कि वह आपको डराने की कोशिश करे और आप डरने के बजाय मुस्करा दें!
‘हमसे न टकराना, हंसा-हंसाकर सीधा करेंगे’
पटना के एक Gen Z प्रदर्शनकारी की बात इस पूरे आंदोलन का नारा बन सकती है—“हमसे न टकराना, हंसा-हंसाकर सीधा करेंगे।” सुनने में यह मजाक लगता है, लेकिन इसके भीतर राजनीति का बड़ा संदेश छिपा है। पुरानी राजनीति मानती रही है कि ताकत का जवाब ताकत से दिया जाएगा। लाठी आएगी तो पत्थर आएगा, गुस्सा आएगा तो गाली आएगी। नई पीढ़ी कह रही है—जरूरी नहीं। आप लाठी लेकर आइए, हम हास्य लेकर आएंगे। आप डर पैदा कीजिए, हम उस डर का मजाक बना देंगे। आप हमें गंभीर चेहरों वाली व्यवस्था दिखाइए, हम उसी व्यवस्था के सामने मुस्कराकर पूछेंगे—भाई, इतना गुस्सा क्यों? इस तरह का हास्य केवल मनोरंजन नहीं होता। डर का मजाक बन जाने के बाद डर की ताकत आधी रह जाती है।
‘चोर-पुलिस’ का बचपन वाला खेल सड़क पर लौट आया
देश के कई शहरों में विरोध की तस्वीरें मानो बचपन के खेलों जैसी दिखाई दीं। कहीं पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भाग-दौड़, कहीं बैरिकेड के आसपास मजाक, कहीं गीत और कहीं नारे के बीच हंसी। दिल्ली से नागपुर और दूसरे शहरों तक इस आंदोलन का अपना अलग रंग दिखाई दिया। लेकिन यहां एक बात साफ रहनी चाहिए—किसी पुलिसकर्मी को व्यक्तिगत रूप से अपमानित करना इस हास्य का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। पुलिस भी इसी समाज का हिस्सा है और कानून-व्यवस्था उसकी जिम्मेदारी है। सवाल उस व्यवस्था और उस बल प्रयोग का है जिसे प्रदर्शनकारी जरूरत से ज्यादा या अनुचित मानते हैं। लोकतंत्र में पुलिस को जनता से लड़ने वाली सेना की तरह नहीं दिखना चाहिए। उसकी जिम्मेदारी व्यवस्था बनाए रखना है, और नागरिक की जिम्मेदारी शांतिपूर्ण विरोध करना। जहां दोनों अपनी सीमा समझते हैं, वहीं लोकतंत्र सुंदर लगता है।
राष्ट्रगीत ने जहां लाठी से ज्यादा ताकत दिखाई
इस आंदोलन में सबसे असरदार दृश्य वे भी रहे जहां तनाव के बीच युवाओं ने गीत और राष्ट्रीय प्रतीकों का सहारा लिया। कल्पना कीजिए—एक तरफ आगे बढ़ती पुलिस और दूसरी तरफ खड़े युवा अचानक सम्मान के साथ राष्ट्रीय गीत गाने लगें। उस क्षण स्थिति बदल जाती है। जिसे पुलिस ‘भीड़’ समझ रही थी, वही भीड़ अचानक नागरिकों का समूह दिखाई देने लगती है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। राष्ट्रीय गीत केवल सरकारी समारोह में बजने वाली धुन नहीं है; वह जनता और राष्ट्र के रिश्ते की याद भी दिलाता है। पुलिस की वर्दी पहनने वाला भी उसी देश का नागरिक है और सामने खड़ा प्रदर्शनकारी भी। ऐसे क्षण दोनों को याद दिलाते हैं कि वे दुश्मन नहीं हैं। एक लोकतंत्र में असहमति युद्ध नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने भी एक सीधी बात याद दिलाई
27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने आंदोलन और पुलिस कार्रवाई की बहस में एक महत्वपूर्ण बात सामने रखी—केवल आंदोलन हो रहा है, इसलिए लाठीचार्ज नहीं किया जा सकता। यह सुनने में सामान्य बात लगती है, लेकिन लोकतंत्र के लिए इसका अर्थ बहुत बड़ा है। आंदोलन होना अपने आप में अपराध नहीं है। सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है। सड़क पर उतरना भी कानून के दायरे में नागरिक अधिकार का हिस्सा हो सकता है। हां, हिंसा होगी तो कानून काम करेगा; सार्वजनिक संपत्ति तोड़ी जाएगी तो कार्रवाई होगी। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन को केवल इसलिए बल से खत्म नहीं किया जा सकता कि वह सरकार के लिए असुविधाजनक है। अदालत की यह बात व्यवस्था को याद दिलाती है कि लोकतंत्र में अंतिम मालिक जनता है और सरकार तथा प्रशासन उसी जनता के प्रति जवाबदेह हैं।
बहुत समय बाद देश के विरोध में हंसी सुनाई दी
हमने पिछले कुछ वर्षों में राजनीति को जरूरत से ज्यादा गंभीर, कड़वा और गुस्से से भरा बना दिया है। सोशल मीडिया खोलिए तो कोई किसी को देशद्रोही बता रहा है, कोई भक्त, कोई एजेंट और कोई गद्दार। टीवी बहसों में लोग एक-दूसरे पर चिल्लाते हैं। राजनीति मानो रोज का युद्ध बन गई है। ऐसे माहौल में हंसते हुए प्रदर्शन करते युवा एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। शायद देश को इसी हंसी की जरूरत थी। लोकतंत्र केवल गुस्से से नहीं चलता। उसमें गीत भी होना चाहिए, व्यंग्य भी, नाटक भी और हंसी भी। जिस समाज में सत्ता पर हंसा जा सकता है, वहां लोकतंत्र अभी सांस ले रहा होता है।
लड़कियां हंसीं, नाचीं तो उन्हें ‘बेशर्म’ क्यों कहा जाए?
इस आंदोलन में युवा लड़कियों की मौजूदगी और उनका बेफिक्र होकर गीत गाना, नाचना और विरोध करना भी कुछ लोगों को पसंद नहीं आया। उन्हें लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं। लेकिन सवाल है—एक लड़की आंदोलन में हंस क्यों नहीं सकती? वह गाना क्यों नहीं गा सकती? क्या विरोध करने के लिए चेहरे पर गुस्सा और आंखों में आंसू जरूरी हैं? भारत की युवा महिलाएं पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं, खेल के मैदान में पदक जीत रही हैं, विमान उड़ा रही हैं और राजनीति से सवाल भी पूछ रही हैं। उन्हें यह बताना कि सार्वजनिक स्थान पर उन्हें कैसे हंसना, बोलना या कपड़े पहनना चाहिए, आधुनिक भारत की भाषा नहीं हो सकती। नई पीढ़ी इस पुरानी सोच को स्वीकार करने वाली नहीं है।
जंतर-मंतर पर गाली से बड़ी कहानी अनुशासन और सवालों की थी
आंदोलन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा इस्तेमाल की गई आपत्तिजनक भाषा पर काफी चर्चा हुई। गलत भाषा का बचाव करने की जरूरत नहीं है। गाली गलत है तो गलत है। लेकिन पूरे आंदोलन को केवल कुछ गालियों तक सीमित कर देना भी सही तस्वीर नहीं होगी। वहां हजारों युवाओं के सवाल थे, परीक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी थी, पेपर लीक पर जवाबदेही की मांग थी और पुलिस कार्रवाई को लेकर गुस्सा था। इसके साथ गीत, हंसी और रचनात्मक विरोध भी था। किसी आंदोलन को समझना हो तो उसके सबसे खराब दस सेकंड की वायरल क्लिप नहीं, उसकी पूरी कहानी देखनी चाहिए।
युवाओं की मुस्कान के पीछे बहुत गंभीर सवाल थे
यह आंदोलन केवल मौज-मस्ती नहीं था। हंसी के पीछे गहरी नाराजगी थी। युवा परीक्षा प्रणाली से सवाल पूछ रहे थे। वे जानना चाहते थे कि वर्षों पढ़ाई करने के बाद अगर प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो उनकी मेहनत की कीमत कौन लौटाएगा? केंद्रीकृत परीक्षाओं की व्यवस्था में लगातार गड़बड़ियां सामने आएं तो जिम्मेदारी किसकी होगी? कोचिंग, परीक्षा एजेंसियों और पेपर लीक नेटवर्क के बीच युवा आखिर कहां जाए? सरकार ने पेपर लीक रोकने के कानून को और सख्त किया है और फास्ट-ट्रैक अदालतों जैसी व्यवस्था की दिशा में कदम उठाया है। यह स्वागत योग्य है। लेकिन कानून बन जाना कहानी का अंत नहीं है। असली सफलता तब होगी जब पेपर लीक होना बंद होगा और छात्र परीक्षा देने जाते समय व्यवस्था पर भरोसा कर पाएगा।
मंत्री गया, कानून बदला—यानी युवाओं की आवाज पूरी तरह बेअसर नहीं रही
किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि सड़क पर कितने लोग आए। असली सवाल होता है—क्या व्यवस्था ने उनकी बात सुनी? शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बदलाव देखने को मिले। सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ कानून को और सख्त किया और तेज सुनवाई की व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाया। आंदोलनकारी इसे अपने दबाव की सफलता के रूप में देख रहे हैं। सरकार का अपना पक्ष हो सकता है कि फैसले व्यापक नीति प्रक्रिया का हिस्सा थे। लेकिन इतना तो साफ है कि युवाओं के सवाल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच गए। लोकतंत्र का मतलब भी यही है—जनता सवाल उठाए और व्यवस्था को जवाब देना पड़े।
हंसते-हंसते व्यवस्था को आईना दिखा दिया
शायद इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई एक इस्तीफा, कानून या राजनीतिक बयान नहीं है। इसकी सबसे दिलचस्प उपलब्धि यह है कि इसने विरोध की भाषा बदलने की कोशिश की। “हंसते-हंसते सीधा करेंगे” केवल मजेदार वाक्य नहीं है। इसका मतलब है कि हम हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन चुप भी नहीं रहेंगे। हम डरेंगे नहीं, लेकिन आपको डराएंगे भी नहीं। हम सवाल पूछेंगे और आपके जवाब न देने पर आपकी गंभीरता का मजाक भी बनाएंगे। लोकतंत्र में व्यंग्य की यही ताकत होती है।
यही तो ‘अच्छे दिन’ होने चाहिए—जब जनता डरने के बजाय हंस सके
‘अच्छे दिन’ का मतलब केवल GDP बढ़ना, शेयर बाजार चढ़ना या बड़ी सड़कें बनना नहीं हो सकता। अच्छे दिन वह भी हैं जब नागरिक बिना डर के सरकार से सवाल पूछ सके। छात्र पुलिस को देखकर भागने के बजाय अपने अधिकार याद रख सके। लड़कियां सार्वजनिक स्थान पर हंस सकें, गा सकें और अपनी बात कह सकें। सरकार आलोचना सुन सके और अदालत जरूरत पड़ने पर प्रशासन को उसकी सीमा याद दिला सके। सत्ता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सत्ता का डर लोकतंत्र का आदर्श नहीं हो सकता।
इसलिए ‘गजब होई गवा’ को केवल मजाक मत समझिए। इसके पीछे बदलते भारत की एक छोटी-सी कहानी छिपी है। यह पीढ़ी नाराज भी है, लेकिन हंसना नहीं भूली। सवाल भी पूछती है और मीम भी बनाती है। पुलिस की पानी की बौछार को बारिश बना देती है और भारी बैरिकेड को खेल का सामान। इसे डराना आसान नहीं, क्योंकि इसने डर पर हंसना सीख लिया है।
और जिस दिन जनता डर पर हंसना सीख जाती है, उस दिन सत्ता को भी जनता की बात सुनना सीखना पड़ता है। शायद यही अच्छे दिनों की असली शुरुआत है—गजब होई गवा!




