मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 10 जुलाई 2027
हिंदी सिनेमा में कुछ लोग सुपरस्टार बनते हैं और कुछ सुपरस्टार गढ़ते हैं। राकेश रोशन उन चुनिंदा फिल्मकारों में हैं, जिन्होंने अपने अभिनय करियर में वह ऊँचाई नहीं पाई, जिसकी उन्होंने कल्पना की थी, लेकिन निर्माता और निर्देशक के रूप में ऐसा मुकाम हासिल किया, जहाँ तक पहुँचना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
राकेश रोशन भी अपने दौर के अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जितेंद्र या शत्रुघ्न सिन्हा की तरह बड़े स्टार बनने का सपना लेकर फिल्म इंडस्ट्री में आए थे। 1970 और 80 के दशक में उन्होंने दर्जनों फिल्मों में अभिनय किया। वे लगातार काम करते रहे, लेकिन उन्हें कभी सुपरस्टार का दर्जा नहीं मिला। कई फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई, तो कई में सह-नायक बने, लेकिन दर्शकों ने उन्हें उस रूप में स्वीकार नहीं किया, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।
अक्सर लोग असफलता के बाद हार मान लेते हैं, लेकिन राकेश रोशन ने अपनी नाकामी को ही नई शुरुआत बना लिया। उन्होंने फिल्मक्राफ्ट प्रोडक्शंस की स्थापना की और निर्माता के रूप में नई पारी शुरू की। 1982 में फिल्म ‘कामचोर’ का निर्माण किया। इस फिल्म में उन्होंने खुद अभिनय भी किया और जया प्रदा उनके साथ थीं। साधारण लेकिन दिल को छू लेने वाली कहानी, रविंद्र जैन का मधुर संगीत और पारिवारिक मनोरंजन ने इस फिल्म को बड़ी सफलता दिलाई। यही वह मोड़ था, जहाँ राकेश रोशन को एहसास हुआ कि उनकी असली पहचान कैमरे के सामने नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे बन सकती है।
1987 में उन्होंने निर्देशन की दुनिया में कदम रखा। उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘खुदगर्ज’ थी, जिसने उन्हें सफल निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया। कहा जाता है कि अंग्रेज़ी का अक्षर ‘K’ उन्हें शुभ लगता था। इसके बाद उन्होंने अपनी लगभग हर फिल्म का नाम ‘K’ से शुरू किया और यह सिलसिला उनकी पहचान बन गया।
‘खुदगर्ज’, ‘खून भरी मांग’, ‘किशन कन्हैया’, ‘किंग अंकल’, ‘करण अर्जुन’, ‘कोयला’, ‘कहो ना… प्यार है’, ‘कोई… मिल गया’, ‘कृष’ और ‘कृष 3’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे सफल निर्देशकों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। इनमें ‘करण अर्जुन’ और ‘कोयला’ ने शाहरुख खान और सलमान खान जैसे सितारों के साथ उनकी अलग पहचान बनाई, जबकि ‘कहो ना… प्यार है’ ने बॉलीवुड को एक नया सुपरस्टार—ऋतिक रोशन—दिया।
साल 2000 में रिलीज़ हुई ‘कहो ना… प्यार है’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि बॉलीवुड के इतिहास की सबसे सफल लॉन्च फिल्मों में गिनी जाती है। इसके बाद ‘कोई… मिल गया’ और ‘कृष’ सीरीज़ के जरिए राकेश रोशन ने भारतीय सिनेमा में साइंस फिक्शन और सुपरहीरो फिल्मों का नया अध्याय लिखा। जिस दौर में बॉलीवुड इस तरह के प्रयोग करने से हिचकता था, उस समय उन्होंने जोखिम उठाया और दर्शकों ने उसे हाथोंहाथ स्वीकार किया।
राकेश रोशन की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने व्यावसायिक सफलता और पारिवारिक मनोरंजन के बीच बेहतरीन संतुलन बनाया। उनकी फिल्मों में मजबूत कहानी, यादगार संगीत, भावनाएँ, एक्शन और मनोरंजन का ऐसा मेल होता था, जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकता था।
विडंबना यह है कि इतनी सफल फिल्मों के बावजूद राकेश रोशन को अक्सर उतनी चर्चा और सम्मान नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। उन्हें कई बार केवल ऋतिक रोशन के पिता या सफल निर्माता-निर्देशक के रूप में याद किया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई ऐसी फिल्में दीं, जो आज भी दर्शकों की यादों में ज़िंदा हैं।
राकेश रोशन इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि असफलता किसी व्यक्ति की अंतिम पहचान नहीं होती। अभिनय में वे सुपरस्टार नहीं बन सके, लेकिन निर्देशक और निर्माता के रूप में उन्होंने ऐसी विरासत बनाई, जिसने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे सफल फिल्मकारों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया। कई बार ज़िंदगी आपको वह नहीं देती जो आप चाहते हैं, बल्कि वह देती है जिसके लिए आप वास्तव में बने होते हैं। राकेश रोशन की कहानी उसी विश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण है।




