ओपिनियन/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 जुलाई 2026
आज देश की राजनीति एक ऐसे दौर में पहुँच गई है, जहाँ राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का बड़ा हिस्सा जनता के बीच से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन और सोशल मीडिया की टाइमलाइन तक सिमटता जा रहा है। जब लड़ाइयाँ सड़कों पर लड़ने के बजाय केवल हैशटैग, पोस्ट, वीडियो और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित हो जाएँ, तो किसी भी सरकार या सत्तारूढ़ दल का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में सत्ता कभी ट्रेंडिंग हैशटैग से नहीं डरती, वह हमेशा उस जनता से डरती है जो सड़क पर उतरकर सवाल पूछती है। इतिहास गवाह है कि सत्ता परिवर्तन ट्वीट और रीपोस्ट से नहीं, बल्कि जनांदोलनों और जनदबाव से हुआ है।
आज जिस तरह लोकतंत्र और भारतीय संविधान की मूल भावना को लेकर बहस और चिंताएँ दिखाई देती हैं, उसमें केवल सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि विपक्ष की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल बयान देना, प्रेस कॉन्फ्रेंस करना या सोशल मीडिया पर सरकार को घेरना नहीं होता। उसका असली काम जनता के बीच जाकर संघर्ष करना, जनमत तैयार करना और सत्ता को लगातार जवाबदेह बनाए रखना होता है। जब विपक्ष संसद के भीतर भी कमजोर दिखे और संसद के बाहर भी जनता के बीच दिखाई न दे, तब सत्ता का आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है।
जब यह धारणा बनने लगे कि सत्ता का प्रभाव लोकतंत्र के विभिन्न संस्थानों तक पहुँच गया है, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर चिंताएँ और गहरी हो जाती हैं। यदि मीडिया सरकार से कठिन सवाल पूछने के बजाय प्रचार का माध्यम बनता दिखाई दे और न्यायपालिका की भूमिका पर भी सार्वजनिक बहस होने लगे, तो जनता के भीतर निराशा और असुरक्षा की भावना जन्म ले सकती है। लोकतंत्र केवल संविधान की किताब से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं पर जनता के भरोसे से चलता है जिन्हें संविधान की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है। जब वह भरोसा कमजोर पड़ता है, तब लोकतंत्र भी कमजोर दिखाई देने लगता है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी वजह केवल कमजोर विपक्ष नहीं, बल्कि कमजोर विपक्षी नेतृत्व है। ऐसे नेता जो संघर्ष की राजनीति के बजाय सुविधाभोगी राजनीति में अधिक सहज महसूस करते हैं। जो अपने घरों और कार्यालयों के बंद कमरों में बैठकर यह मान लेते हैं कि सोशल मीडिया अभियान ही राजनीतिक आंदोलन का विकल्प बन सकता है। लाइक, व्यू और रीपोस्ट जनसमर्थन का भ्रम पैदा कर सकते हैं, लेकिन वे जनांदोलन का विकल्प कभी नहीं बन सकते। जनता का विश्वास केवल डिजिटल उपस्थिति से नहीं, बल्कि उसके बीच जाकर संघर्ष करने से मिलता है।
कुछ समय पहले राहुल गांधी ने आशंका जताई थी कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात बन सकते हैं। यह एक राजनीतिक मत है, लेकिन इतिहास की तुलना करते समय कुछ बुनियादी अंतर भी याद रखने चाहिए। 1975 से पहले विपक्ष लगातार सड़कों पर संघर्ष कर रहा था। मीडिया सरकार से तीखे सवाल पूछता था। न्यायपालिका कई मामलों में सरकार के फैसलों को चुनौती देती थी। विपक्षी नेता जेल जाने से नहीं डरते थे। लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में गिरफ्तारी उनके लिए राजनीतिक सम्मान मानी जाती थी। आज विरोध की राजनीति का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म तक सीमित दिखाई देता है। यही वह अंतर है, जिस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
आज अधिकांश विपक्षी दलों में सबसे बड़ी कमजोरी राजनीतिक संघर्ष की कीमत चुकाने की इच्छा का कम होना दिखाई देता है। नेतृत्व चाहता है कि कार्यकर्ता सड़कों पर उतरें, मुकदमे झेलें और जेल जाएँ, जबकि नेता सोशल मीडिया से आंदोलन चलाएँ। यह मॉडल किसी भी संगठन को लंबे समय तक जीवित नहीं रख सकता। राजनीतिक संघर्ष हमेशा जोखिम मांगता है। इतिहास में कोई बड़ा आंदोलन वातानुकूलित कमरों में बैठकर नहीं जीता गया।
पिछले कुछ वर्षों की राजनीति भी यही संकेत देती है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, पंजाब में आम आदमी पार्टी और महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के भीतर हुए राजनीतिक घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करते हैं कि केवल चुनाव जीत लेना पर्याप्त नहीं होता, संगठन को लगातार जनता के बीच सक्रिय रखना भी उतना ही आवश्यक है। कभी ममता बनर्जी की पहचान बिना सुरक्षा के सड़कों पर संघर्ष करने वाली नेता की थी। अरविंद केजरीवाल ने अपना राजनीतिक कद लंबे धरनों और आंदोलनों से बनाया था। महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे की आवाज़ मातोश्री से निकलकर पूरे राज्य की राजनीति को प्रभावित करती थी। आलोचक कहते हैं कि आज इन दलों का संघर्ष पहले जैसा जनांदोलन नहीं रहा और उसका बड़ा हिस्सा मीडिया तथा सोशल मीडिया तक सीमित होकर रह गया है।
जब किसी राजनीतिक दल की गूँज जनता के बीच सुनाई देने के बजाय केवल सोशल मीडिया तक सीमित हो जाए, जब नेतृत्व जेल जाने के डर से संघर्ष से दूरी बना ले, जब कार्यकर्ताओं से अपेक्षा की जाए कि वे मुकदमे झेलें लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी फिल्मी सितारों, उद्योगपतियों या प्रभावशाली चेहरों को मिले, तब धीरे-धीरे कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटने लगता है। संगठन की रीढ़ कार्यकर्ता होते हैं, और यदि वही निराश हो जाएँ तो सबसे बड़ा राजनीतिक अभियान भी खोखला साबित होता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत केवल मतदान नहीं, बल्कि जनता की निरंतर भागीदारी और अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने का अधिकार है। अंत में मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठता है। यदि अदालतें यह तय करती हैं कि चुनावी प्रक्रिया में वोट कौन देगा, तो यह कौन तय करेगा कि जिस प्रतिनिधि को जनता चुनती है, उसके प्रति जनता की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी? लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं, बल्कि चुनी हुई सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार भी है।
आखिरकार, लोकतंत्र में सत्ता को चुनौती देने के लिए हैशटैग नहीं, हिम्मत चाहिए। पोस्ट नहीं, जनसंपर्क चाहिए। ट्रेंड नहीं, आंदोलन चाहिए। और सबसे बढ़कर ऐसा नेतृत्व चाहिए जो जनता के बीच खड़ा होने का साहस रखता हो, क्योंकि इतिहास में बदलाव हमेशा सड़कों पर लिखे गए हैं, सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर नहीं।




