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35 साल से एक ही कहानी… लेकिन क्या बीजेपी अयोध्या का पूरा सच बताएगी?

राजनीति/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 9 जुलाई 2026

कारसेवकों पर गोली चलने की घटना को बीजेपी पिछले 35 वर्षों से अपनी राजनीति के सबसे बड़े प्रतीकों में शामिल करती रही है। हर चुनाव में, हर बड़ी राजनीतिक सभा में और हर भावनात्मक बहस में 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 की घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी अयोध्या के पूरे इतिहास पर बात करने का साहस करेगी, या फिर केवल उसी हिस्से को दोहराएगी जो उसके राजनीतिक विमर्श को मजबूत करता है? इतिहास तब पूरा होता है जब उसके सभी अध्याय पढ़े जाएं। यदि केवल एक घटना को बार-बार दोहराया जाए और बाकी तथ्यों को चर्चा से बाहर रखा जाए, तो वह इतिहास नहीं बल्कि राजनीतिक नैरेटिव बन जाता है।

1990 की घटना का उल्लेख करते समय यह भी याद रखना होगा कि उस समय अयोध्या विवाद अदालत में विचाराधीन था और न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए थे। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार का कहना था कि वह न्यायालय के आदेशों का पालन कराने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाध्य थी। उस दौर में लाखों कारसेवकों के अयोध्या पहुंचने से प्रशासन के सामने असाधारण चुनौती खड़ी हो गई थी। गोली चलाने का निर्णय आज भी विवादित है और इसकी आलोचना भी होती रही है, लेकिन क्या उस समय की कानूनी और प्रशासनिक परिस्थितियों की चर्चा भी उतनी ही ईमानदारी से की जाती है? यही वह सवाल है, जिसे अक्सर राजनीतिक भाषणों में जगह नहीं मिलती।

अगर 1990 की बात होती है, तो फिर 6 दिसंबर 1992 की भी बात होनी चाहिए। उस समय उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी। सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र सरकार को यह आश्वासन दिया गया था कि विवादित ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी और केवल प्रतीकात्मक कारसेवा होगी। लेकिन इन आश्वासनों के बावजूद बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि विवादित ढांचे का विध्वंस कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन था। सवाल यह है कि क्या बीजेपी अपने राजनीतिक मंचों से इस अध्याय का भी उतनी ही मजबूती से उल्लेख करती है, जितनी मजबूती से 1990 की गोलीकांड की चर्चा करती है? यदि नहीं, तो क्यों?

इस पूरे घटनाक्रम में एक और सवाल लगातार उठता है। 1990 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था के प्रमुख अधिकारियों में शामिल रहे नृपेंद्र मिश्रा बाद के वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार के सबसे भरोसेमंद नौकरशाह बने। उन्हें प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव बनाया गया और बाद में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया। यदि 1990 की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को बीजेपी लगातार कठघरे में खड़ा करती है, तो उसी व्यवस्था के इतने महत्वपूर्ण अधिकारी पर बाद में इतना भरोसा क्यों किया गया? यह सवाल केवल राजनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव की निरंतरता का भी है।

बीजेपी पर उसके आलोचक लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि वह इतिहास के उन्हीं हिस्सों को सामने रखती है जो उसके राजनीतिक अभियान को लाभ पहुंचाते हैं, जबकि असहज सवालों को पीछे छोड़ दिया जाता है। कारसेवकों पर गोली चलने की घटना को याद रखना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि 1992 का विध्वंस, न्यायालय की टिप्पणियां, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और उस समय दिए गए राजनीतिक आश्वासन भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनें। किसी भी लोकतंत्र में इतिहास का चयनात्मक उपयोग अंततः राजनीतिक ध्रुवीकरण को ही बढ़ाता है।

आज, जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन चुका है और यह मुद्दा एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या देश को आधा इतिहास सुनाया जाएगा या पूरा इतिहास बताया जाएगा? क्या राजनीतिक दल केवल भावनात्मक घटनाओं को याद रखेंगे, या उन फैसलों और घटनाओं पर भी चर्चा करेंगे जिन्होंने देश की न्यायिक, संवैधानिक और राजनीतिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया?

इतिहास का सम्मान तभी संभव है जब उसके सभी तथ्य सामने रखे जाएं। 1990 भी इतिहास है, 1992 भी इतिहास है। अदालतों के आदेश भी इतिहास हैं, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां भी इतिहास हैं। केवल सुविधाजनक हिस्सों को दोहराकर पूरे इतिहास का दावा नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि नागरिकों के सामने पूरा सच रखा जाए, ताकि वे स्वयं तय कर सकें कि इतिहास का वास्तविक चेहरा क्या था।

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