ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 जून 2026
जन्म प्रमाण पत्र भी सबूत नहीं! अब अगला नंबर किसका?
ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली
एक समय था जब लोग निश्चिंत होकर कहते थे—”मेरे पास सारे कागज़ हैं।” सामने वाला भी मान जाता था। अब वक्त बदल गया है। अब कागज़ दिखाइए, फिर बताइए कि कागज़ असली है, फिर साबित कीजिए कि वह कागज़ आपका ही है। और अगर सब ठीक रहा, तो शायद अगली तारीख पर यह भी तय हो जाए कि आप सचमुच मौजूद हैं।
पिछले कुछ वर्षों में देश में नियम-कायदों और दस्तावेज़ों को लेकर बहस लगातार बढ़ी है। कभी कोई नई व्यवस्था आती है, कभी पुरानी व्यवस्था में बदलाव होता है, तो कभी नाम बदल जाते हैं। सरकार इसे सुधार कहती है, विपक्ष इसे उलझाव बताता है। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज़्यादा उलझन उस आम आदमी की है, जो हर नए नियम के साथ अपनी फाइल में एक नया कागज़ जोड़ता चला जाता है।
पहले कहा गया कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है। फिर आधार, वोटर आईडी और दूसरे दस्तावेज़ों को लेकर बहस छिड़ी। अब अगर कोई मज़ाक में कह दे कि “जन्म प्रमाण पत्र भी जन्म का अंतिम सबूत नहीं है”, तो लोग हँसेंगे कम और माथा ज़्यादा पकड़ेंगे।
ज़रा कल्पना कीजिए। अस्पताल से पूछा जाएगा—”बच्चा पैदा हुआ था या सिर्फ़ रजिस्टर में एंट्री हुई थी?” फिर मां-बाप से कहा जाएगा—”कोई गवाह है कि यही आपका बच्चा है?” पड़ोसी को बुलाइए, दाई को बुलाइए, डॉक्टर को बुलाइए… और अगर कोई न मिले तो अगली तारीख ले लीजिए।
बेचारा आम आदमी भी क्या करे? जन्म हुआ तो जन्म प्रमाण पत्र बनवाया। स्कूल गया तो टीसी संभाली। कॉलेज की डिग्री संभाली। नौकरी के लिए चरित्र प्रमाण पत्र बनवाया। आधार, पैन, वोटर कार्ड, पासपोर्ट—जो कहा गया, सब बनवाया। पूरी ज़िंदगी फाइल मोटी करता रहा। अब अगर एक-एक करके हर कागज़ पर सवाल उठने लगें, तो वह किस पर भरोसा करे?
हो सकता है कल कोई नया फॉर्म आ जाए—”फॉर्म संख्या-101: कृपया प्रमाणित करें कि आप अभी भी जीवित हैं।” साथ में तीन गवाह, दो फोटो, एक सेल्फी, पड़ोसी का हलफनामा और डॉक्टर का प्रमाण पत्र भी लगाइए। अधिकारी मुस्कुराकर कहे—”सब ठीक है… लेकिन कोई पक्का सबूत?”
बैंक कहे—”पैसे तभी मिलेंगे, जब साबित करेंगे कि आप वही व्यक्ति हैं जो कल भी ज़िंदा था।” मोबाइल कंपनी बोले—”ओटीपी तभी मिलेगा, जब जीवित होने का डिजिटल सत्यापन हो जाएगा।” बिजली विभाग कहे—”पहले साबित कीजिए कि आप इसी घर में रहते हैं, फिर बिल पर बात करेंगे।”
और सबसे मज़ेदार दिन वह होगा, जब किसी सरकारी दफ्तर में बाबू पूछे—”आप कह रहे हैं कि आप ज़िंदा हैं… इसका कोई प्रमाण?” बेचारा आदमी अपनी नब्ज़ दिखाएगा। बाबू कहेगा—”नब्ज़ चल रही है, लेकिन यह अंतिम प्रमाण नहीं माना जाएगा।”
व्यंग्य वहीं जन्म लेता है, जहाँ व्यवस्था और आम आदमी के बीच भरोसे की दूरी बढ़ने लगती है। सवाल किसी एक दस्तावेज़ का नहीं, पूरे भरोसे का है। अगर सरकार के जारी किए गए दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता पर ही बार-बार नए सवाल उठने लगें, तो सबसे बड़ी परेशानी उसी नागरिक की होगी जिसने हर नियम का पालन किया है।
लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, भरोसे से भी चलता है। नियम बदल सकते हैं, प्रक्रियाएँ बदल सकती हैं, लेकिन अगर नागरिक को हर बार अपने अस्तित्व का प्रमाण देना पड़े, तो समस्या सिर्फ़ कागज़ों की नहीं, व्यवस्था और नागरिक के रिश्ते की भी है।
हो सकता है कल सुबह उठने का भी प्रमाण देना पड़े। अलार्म बजना काफी न हो। बिस्तर से उठते हुए वीडियो रिकॉर्ड करना पड़े। चाय पीने का डिजिटल रिकॉर्ड अपलोड करना पड़े। छींक आए तो उसका भी ऑनलाइन सत्यापन कराना पड़े।
व्यंग्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति का मज़ाक उड़ाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाना होता है। और आज यह आईना सिर्फ़ एक सवाल पूछ रहा है—
अगर जन्म प्रमाण पत्र जन्म का अंतिम सबूत नहीं, पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं, आधार पहचान का अंतिम सबूत नहीं… तो आखिर आम आदमी अपने होने का अंतिम सबूत किससे मांगे?
या फिर आने वाले दिनों का नया सरकारी नारा यही होगा—
“साबित करो… तुम ज़िंदा हो, क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है!”



