ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 28 जून 2026
सुनील शेट्टी जी, बच्चे राजनीति नहीं समझते, वे सिर्फ़ चेहरे, रंग और आवाज़ पहचानते हैं। आज आपकी 15 महीने की पोती को किसी नेता की तस्वीर अच्छी लग सकती है, कल वही बच्ची पेप्पा पिग, मिकी माउस या किसी खिलौने को देखकर उतनी ही खुश हो जाएगी। यह किसी नेता के करिश्मे का प्रमाण नहीं, बल्कि बचपन की सहज और स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है।
समस्या बच्चे की मासूमियत में नहीं, बल्कि उस मासूमियत को राजनीतिक संदेश और व्यक्तिपूजा का माध्यम बना देने में है। किसी शिशु की सहज प्रतिक्रिया को किसी नेता की लोकप्रियता का प्रमाण बताना न तर्कसंगत है, न लोकतांत्रिक और न ही नैतिक। बच्चे प्रचार का साधन नहीं, भविष्य के नागरिक होते हैं।
लोकतंत्र की ताकत किसी एक चेहरे की भक्ति में नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच रखने वाले नागरिकों में होती है। बच्चों को किसी नेता का भक्त नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाला, संविधान का सम्मान करने वाला और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेने वाला नागरिक बनाना चाहिए। यही स्वस्थ लोकतंत्र की असली पहचान है।
हर बच्चे को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह बड़ा होकर नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी या किसी भी नेता का मूल्यांकन उनके काम, नीतियों और जनहित के आधार पर करे, न कि किसी प्रचार या व्यक्तिपूजा के प्रभाव में। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक सोचते हैं, सवाल पूछते हैं और स्वतंत्र निर्णय लेते हैं।
बच्चों की मासूमियत को राजनीतिक संदेशों का माध्यम बनाने के बजाय उसे बचाए रखना ही समाज, लोकतंत्र और आने वाली पीढ़ियों—तीनों के हित में है।




