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मनरेगा पर बढ़ा विवाद: अब बीजेपी शासित राज्यों ने भी उठाए सवाल, क्या धीरे-धीरे खत्म की जा रही है देश की सबसे बड़ी रोजगार योजना?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 जून 2026

केंद्र सरकार द्वारा 1 जुलाई से लागू की जा रही नई ग्रामीण रोजगार योजना ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (VB-G RAM G)’ को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अब तक इस योजना का विरोध विपक्षी दल कर रहे थे, लेकिन अब बीजेपी शासित राज्यों ने भी इसके कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कर दी हैं। इससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या सरकार वास्तव में मनरेगा को मजबूत करना चाहती है या धीरे-धीरे उसे कमजोर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई राज्यों ने नई योजना के तहत राज्यों पर बढ़ने वाले वित्तीय बोझ को लेकर चिंता जताई है। इन राज्यों का कहना है कि नई व्यवस्था में कुल खर्च का 40 प्रतिशत राज्यों को वहन करना होगा, जबकि मनरेगा के तहत मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी और राज्यों पर अपेक्षाकृत बहुत कम वित्तीय भार पड़ता था। पांच राज्यों ने मजदूरी दर बढ़ाने की मांग की है, चार राज्यों ने कृषि सीजन के दौरान प्रस्तावित 60 दिन के ब्लैकआउट पीरियड पर आपत्ति जताई है और अधिकांश राज्यों ने लंबित भुगतान तत्काल जारी करने की मांग भी की है।

यही वह मुद्दे हैं जिनको लेकर विपक्ष शुरुआत से सरकार पर हमला बोलता रहा है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर एकजुट होकर सरकार के प्रस्तावित संशोधनों का विरोध किया था। विपक्ष का आरोप रहा है कि सरकार मनरेगा को सीधे समाप्त करने की बजाय उसके स्वरूप में ऐसे बदलाव कर रही है, जिनसे राज्यों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ेगा। उनका कहना है कि जब राज्यों को अधिक खर्च उठाना पड़ेगा, भुगतान में देरी होगी और नियम अधिक कठोर होंगे, तो धीरे-धीरे यह योजना कमजोर पड़ जाएगी और अंततः दम तोड़ देगी।

मनरेगा वर्ष 2005 में लागू हुआ था और इसे दुनिया की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजनाओं में गिना जाता है। इस कानून के तहत ग्रामीण परिवारों को प्रतिवर्ष 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाती है। वर्षों से यह योजना सूखा, बाढ़, आर्थिक मंदी और कोविड जैसी परिस्थितियों में करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए जीवनरेखा साबित हुई है। यही कारण है कि इसमें किसी भी बड़े बदलाव को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस स्वाभाविक रूप से तेज हो जाती है।

अब इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि नई योजना पर सवाल केवल विपक्षी दल ही नहीं उठा रहे, बल्कि बीजेपी शासित राज्य भी अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं। यदि उन्हीं राज्यों को वित्तीय बोझ, मजदूरी दर, भुगतान और संचालन संबंधी प्रावधानों पर गंभीर चिंताएं हैं, जो केंद्र में सत्तारूढ़ दल द्वारा संचालित हैं, तो यह संकेत देता है कि मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि व्यावहारिक और वित्तीय भी है।

राज्यों का कहना है कि यदि केंद्र अपनी हिस्सेदारी कम करेगा और राज्यों पर अधिक खर्च का भार डालेगा, तो कमजोर वित्तीय स्थिति वाले राज्यों के लिए योजना का प्रभावी संचालन कठिन हो सकता है। इससे ग्रामीण रोजगार प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का तर्क है कि नई योजना का उद्देश्य रोजगार के साथ-साथ आजीविका सृजन, परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और राज्यों की भागीदारी को बढ़ाना है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र सरकार राज्यों और विपक्ष द्वारा उठाई गई इन आपत्तियों पर पुनर्विचार करेगी, या फिर नई योजना को मौजूदा स्वरूप में ही लागू किया जाएगा। क्योंकि यदि इस योजना को लेकर लगातार राज्यों की वित्तीय चिंताएं बढ़ती रहीं, तो यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों ग्रामीण मजदूरों और उनके रोजगार के भविष्य से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है।

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