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देवताओं और राजनीतिक आंदोलनों के नाम पर ली शपथ अमान्य: केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 20 पार्षद फिर लेंगे शपथ

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | कोच्चि/तिरुवनंतपुरम | 24 जून 2026

केरल हाईकोर्ट ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों की शपथ को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें चार सप्ताह के भीतर दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि पार्षदों द्वारा विभिन्न देवी-देवताओं, शहीदों और राजनीतिक आंदोलनों के नाम पर ली गई शपथ केरल नगर पालिका अधिनियम, 1994 के निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।

न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन की एकल पीठ ने यह फैसला एलडीएफ परिषद दल के नेता एस.पी. दीपक की याचिका पर सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह संबंधित पार्षदों के लिए नई शपथ ग्रहण प्रक्रिया की व्यवस्था सुनिश्चित करे।

मामला इस वर्ष जनवरी में हुए शपथ ग्रहण समारोह से जुड़ा है, जब कई निर्वाचित पार्षदों ने संविधान और कानून में निर्धारित प्रारूप से हटकर विभिन्न धार्मिक प्रतीकों, शहीदों तथा राजनीतिक विचारधाराओं के नाम पर शपथ ली थी। याचिकाकर्ता ने इसे कानून के खिलाफ बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की शपथ केवल उस प्रारूप में ही ली जा सकती है जो कानून में निर्धारित है। व्यक्तिगत आस्था, धार्मिक विश्वास या राजनीतिक प्रतिबद्धता का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन संवैधानिक पद ग्रहण करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें इन पार्षदों के चुनाव को ही रद्द करने की अपील की गई थी। कोर्ट ने माना कि शपथ प्रक्रिया में त्रुटि का अर्थ यह नहीं है कि उनका निर्वाचन स्वतः अवैध हो जाता है। इसलिए उन्हें दोबारा वैध शपथ लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।

इस फैसले को स्थानीय निकायों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अदालत ने साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में कानून सर्वोपरि है और शपथ ग्रहण जैसी संवैधानिक प्रक्रिया को व्यक्तिगत या वैचारिक अभिव्यक्ति का मंच नहीं बनाया जा सकता।

फैसले के बाद अब तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों को निर्धारित प्रारूप के अनुसार पुनः शपथ लेनी होगी। यदि वे तय समय सीमा के भीतर ऐसा नहीं करते हैं तो उनके अधिकारों और पद की वैधता को लेकर नए कानूनी प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय भविष्य में देशभर की स्थानीय निकाय संस्थाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जहां व्यक्तिगत आस्था और संवैधानिक दायित्वों के बीच स्पष्ट रेखा खींची गई है।

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