ओपिनियन | डॉ. निपुणिका शाहिद, असिस्टेंट प्रोफेसर, फैकल्टी ऑफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, न्यू दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 23 जून 2026
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनावी प्रक्रिया में नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर भागीदारी, जागरूकता और जवाबदेही की मांग में निहित होती है। आज भारत में एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन दिखाई दे रहा है। युवा पीढ़ी अब केवल मतदान करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि सार्वजनिक विमर्श, सामाजिक आंदोलनों, नीति निर्माण और जनहित के मुद्दों में सक्रिय भागीदारी निभा रही है। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार का संकेत है।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। अक्सर इस जनसांख्यिकीय शक्ति की चर्चा आर्थिक विकास और रोजगार के संदर्भ में होती है, लेकिन इसका लोकतांत्रिक महत्व भी उतना ही बड़ा है। किसी भी लोकतंत्र की मजबूती केवल सरकारों से नहीं, बल्कि सक्रिय नागरिकों से तय होती है। आज भारत का युवा वर्ग इस जिम्मेदारी को समझ रहा है और लोकतंत्र का सक्रिय भागीदार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब समाज में बड़े बदलाव आए, उनमें युवाओं की भूमिका निर्णायक रही। स्वतंत्रता आंदोलन में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अनेक युवा क्रांतिकारियों ने औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी। आपातकाल के दौरान भी छात्रों और युवाओं ने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। आज परिस्थितियां भले बदल गई हों, लेकिन युवाओं की भूमिका नहीं बदली है। फर्क केवल इतना है कि अब आंदोलन के मंचों के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म भी उनके हाथ में हैं।
हाल के वर्षों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों ने शिक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों जैसे विषयों पर सक्रिय हस्तक्षेप किया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय और देश के अनेक अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्र सार्वजनिक बहसों का हिस्सा बने हैं। उनके विचारों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन उनकी सक्रियता लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक प्रश्न पूछते हैं और सार्वजनिक नीतियों पर विचार-विमर्श करते हैं।
युवाओं की यह भूमिका केवल राजनीतिक बहसों तक सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी उनकी भागीदारी उल्लेखनीय रही है। बढ़ते प्रदूषण, जल संकट, जैव विविधता के क्षरण और वैश्विक तापमान वृद्धि जैसे मुद्दों पर युवा लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और अन्य शहरों में हजारों छात्र और युवा पेशेवर पर्यावरणीय अभियानों में शामिल हुए हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि पर्यावरण का संकट भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती है।
डिजिटल क्रांति ने भी युवाओं को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है। सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि जनसंवाद और सामाजिक हस्तक्षेप का महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। सड़क सुरक्षा, महिला अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा सुधार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे अनेक विषयों को युवाओं ने डिजिटल अभियानों के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया है। कई बार स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने और प्रशासन को कार्रवाई के लिए बाध्य करने में भी युवाओं की डिजिटल सक्रियता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
2024 के आम चुनावों ने भी युवा मतदाताओं की बढ़ती भूमिका को स्पष्ट किया। राजनीतिक दलों ने पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को विशेष रूप से आकर्षित करने की कोशिश की। लेकिन मतदान से आगे बढ़कर बड़ी संख्या में युवा स्वयंसेवक, डिजिटल प्रचारक, नीति विश्लेषक और तथ्य-जांचकर्ता के रूप में भी सामने आए। यह बदलाव बताता है कि नई पीढ़ी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि नीतिगत बहस और जवाबदेही में भी रुचि रखती है।
हालांकि युवाओं की सक्रियता को अक्सर आदर्शवाद या अनुभवहीनता कहकर खारिज करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इतिहास बताता है कि हर परिवर्तनकारी विचार की शुरुआत युवाओं के साहसिक प्रश्नों से ही हुई है। लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना, सार्वजनिक संस्थाओं की समीक्षा करना और बेहतर शासन की मांग करना नागरिक अधिकार के साथ-साथ नागरिक दायित्व भी है। जो समाज अपने युवाओं की आवाज को दबाता है, वह अंततः उदासीनता और निराशा को बढ़ावा देता है।
साथ ही यह भी आवश्यक है कि युवा सक्रियता जिम्मेदार, तथ्यपरक और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित हो। सोशल मीडिया जहां जागरूकता फैलाने का माध्यम है, वहीं वह गलत सूचना का स्रोत भी बन सकता है। इसलिए युवाओं के सामने चुनौती केवल अपनी बात रखने की नहीं, बल्कि उसे तथ्यों, तर्क और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर प्रस्तुत करने की भी है। प्रभावी सक्रियता के लिए उत्साह के साथ धैर्य और जिम्मेदारी भी आवश्यक है।
भारत आज तकनीकी परिवर्तन, आर्थिक आकांक्षाओं और सामाजिक चुनौतियों के एक जटिल दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में युवाओं की भागीदारी केवल महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि अनिवार्य है। उनकी ऊर्जा, नवाचार क्षमता और परिवर्तन की आकांक्षा लोकतंत्र को अधिक समावेशी, उत्तरदायी और संवेदनशील बना सकती है।
अंततः लोकतंत्र की ताकत सरकारों की आवाज में नहीं, बल्कि नागरिकों की भागीदारी में होती है। और जब युवा प्रश्न पूछते हैं, संवाद करते हैं, संगठित होते हैं और समाज को जागृत करने का प्रयास करते हैं, तब लोकतंत्र और अधिक मजबूत होता है। आज का युवा केवल भविष्य का नागरिक नहीं है; वह वर्तमान का सजग प्रहरी भी है।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य केवल सत्ता के गलियारों में तय नहीं होगा। वह उन युवा आवाजों से भी आकार लेगा जो सवाल पूछने का साहस रखती हैं, बदलाव का सपना देखती हैं और समाज को बेहतर बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाती हैं। राष्ट्र को जगा रही यह युवा चेतना भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक सकारात्मक और आशाजनक संकेत है।




