ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 जून 2026
क्या बच्चों के भोजन कार्यक्रम में धार्मिक संस्थाओं की एंट्री शिक्षा और पोषण नीति को नए विवाद में धकेल देगी?
पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील योजना के तहत भोजन आपूर्ति का ठेका ISKCON को दिए जाने की खबर ने एक नई बहस को जन्म दिया है। सवाल केवल भोजन का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक पहचान वाली संस्था को सरकारी स्कूलों के बच्चों के भोजन कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए?भारत का मिड-डे मील कार्यक्रम दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली पोषण योजनाओं में से एक है। इसका उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना, कुपोषण कम करना और स्कूलों में उपस्थिति बढ़ाना है। यह योजना धर्म, जाति, भाषा और विचारधारा से ऊपर उठकर केवल बच्चों के हित के लिए बनाई गई थी। ऐसे में यदि किसी धार्मिक संस्था को इस योजना में केंद्रीय भूमिका दी जाती है, तो स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न खड़े होते हैं।
ISKCON केवल एक भोजन प्रदाता संस्था नहीं है। वह एक धार्मिक और वैचारिक संगठन भी है, जो भगवान कृष्ण की भक्ति पर आधारित वैश्विक आंदोलन चलाता है। उसके मंदिर, साहित्य, धार्मिक कार्यक्रम और भोजन व्यवस्था उसी दर्शन का हिस्सा हैं। ऐसे में आलोचकों का सवाल है कि क्या राज्य को बच्चों के भोजन कार्यक्रम को किसी धार्मिक पहचान से जोड़ने का जोखिम उठाना चाहिए?
बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना देश के अन्य राज्यों से अलग रही है। यहां मछली, अंडा और विविध खाद्य परंपराएं आम जीवन का हिस्सा हैं। लंबे समय से राज्य के अनेक स्कूलों में मिड-डे मील के अंतर्गत अंडा और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ दिए जाते रहे हैं। यदि भोजन आपूर्ति का स्वरूप बदलता है और बच्चों को केवल एक विशेष प्रकार का भोजन उपलब्ध कराया जाता है, तो यह बहस केवल धर्म की नहीं बल्कि पोषण की भी बन जाती है।
पोषण विशेषज्ञ वर्षों से कहते रहे हैं कि गरीब और निम्न आय वर्ग के बच्चों के लिए प्रोटीन अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में किसी भी नई व्यवस्था का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि क्या वह बच्चों की पोषण आवश्यकताओं को पहले से बेहतर पूरा करती है या नहीं।
एक दूसरा प्रश्न धर्मनिरपेक्षता का है। सरकारी स्कूल राज्य के संस्थान हैं, किसी धर्म या संप्रदाय के नहीं। इसलिए कई शिक्षाविदों का मानना है कि भोजन जैसी बुनियादी सार्वजनिक सेवा को धार्मिक संस्थाओं से अलग रखना ही बेहतर नीति है। भले ही भोजन वितरण के दौरान कोई धार्मिक गतिविधि न हो, फिर भी एक वर्ग में यह धारणा बन सकती है कि राज्य किसी विशेष धार्मिक संस्था को बढ़ावा दे रहा है।
हालांकि इस बहस का दूसरा पक्ष भी मौजूद है। ISKCON और उससे जुड़ी संस्थाएं वर्षों से कई राज्यों में बड़े पैमाने पर भोजन वितरण कार्यक्रम संचालित करती रही हैं। उनके समर्थकों का तर्क है कि संस्था के पास विशाल रसोईघर, आधुनिक व्यवस्था और बड़े स्तर पर भोजन तैयार करने की क्षमता है। उनके अनुसार किसी संस्था का मूल्यांकन उसकी सेवा की गुणवत्ता से होना चाहिए, न कि केवल उसकी धार्मिक पहचान से।
फिर भी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वास की है। यदि लाखों बच्चों के भोजन की जिम्मेदारी किसी धार्मिक पृष्ठभूमि वाली संस्था को दी जाती है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भोजन पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक पोषण मानकों पर आधारित और सभी समुदायों के लिए समान रूप से स्वीकार्य हो।
यह भी आवश्यक है कि भोजन योजना में किसी प्रकार का धार्मिक संदेश, प्रतीकात्मक प्रभाव या वैचारिक हस्तक्षेप न हो। बच्चों के अधिकार, उनकी पोषण जरूरतें और शिक्षा का वातावरण किसी भी राजनीतिक या धार्मिक प्रयोग से ऊपर होने चाहिए।
असल सवाल ISKCON या किसी एक संस्था का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत की सार्वजनिक कल्याण योजनाओं को धार्मिक संगठनों के भरोसे चलाया जाना चाहिए, या राज्य को ऐसी सेवाओं को पूरी तरह तटस्थ और धर्मनिरपेक्ष ढांचे में ही संचालित करना चाहिए?
पश्चिम बंगाल में शुरू हुई यह बहस आने वाले समय में राष्ट्रीय बहस बन सकती है। क्योंकि मामला केवल भोजन का नहीं, बल्कि उस मूल सिद्धांत का है जिस पर भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था खड़ी है—सभी बच्चों के लिए समान अवसर, समान सम्मान और समान अधिकार।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों की थाली राजनीति, धर्म और विचारधारा की लड़ाई का मैदान न बने। क्योंकि जब सवाल बच्चों के भोजन का हो, तो प्राथमिकता केवल एक होनी चाहिए—बच्चों का पोषण, न कि किसी भी प्रकार का एजेंडा।




