Home » National » उज्जैन की ज़मीनों पर बड़ा सवाल: क्या विकास की आड़ में खड़ा हुआ सत्ता का ‘लैंड बैंक’?

उज्जैन की ज़मीनों पर बड़ा सवाल: क्या विकास की आड़ में खड़ा हुआ सत्ता का ‘लैंड बैंक’?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/उज्जैन | 23 जून 2026

CM मोहन यादव के परिवार की 335 एकड़ ज़मीन पर घमासान, विकास परियोजनाओं और निजी संपत्ति विस्तार के बीच उठे गंभीर सवाल

मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा खुलासा चर्चा के केंद्र में है जिसने सत्ता, संपत्ति और विकास परियोजनाओं के रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उज्जैन में सिंहस्थ-2028 और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के नाम पर हो रहे हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्यों के बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके विस्तारित परिवार द्वारा बड़े पैमाने पर जमीन खरीदने के दावों ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की खोजी रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार, रिश्तेदारों और उनसे जुड़े लोगों ने पिछले कुछ वर्षों में उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में जमीन खरीदी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि परिवार के पास अब 245 प्लॉट और लगभग 335 एकड़ भूमि है। इनमें से बड़ी संख्या उन इलाकों में स्थित है जहां राज्य सरकार सड़क, हाईवे, आवास, पर्यटन और शहरी विकास की महत्वाकांक्षी परियोजनाएं चला रही है।

रिपोर्ट के अनुसार 2021 के बाद, जब मोहन यादव राज्य सरकार में मंत्री बने और बाद में मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे, उसी दौरान भूमि खरीद की रफ्तार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई। दावा किया गया है कि परिवार और रिश्तेदारों द्वारा खरीदी गई जमीनों का बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों में है जिन्हें उज्जैन मास्टर प्लान और आगामी विकास परियोजनाओं से प्रत्यक्ष लाभ मिलने वाला है।

राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है कि क्या यह महज संयोग है कि विकास परियोजनाओं के आसपास भूमि खरीद का इतना बड़ा विस्तार हुआ, या फिर इसके पीछे ऐसी जानकारियां थीं जो आम नागरिकों और निवेशकों के पास उपलब्ध नहीं थीं?

उज्जैन इस समय मध्य प्रदेश का सबसे तेजी से विकसित होता धार्मिक और पर्यटन केंद्र माना जा रहा है। सिंहस्थ-2028 को ध्यान में रखते हुए हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। नई सड़कें, रिंग रोड, पर्यटन कॉरिडोर, आवासीय विस्तार और व्यावसायिक ढांचे के निर्माण की योजनाएं पहले से चल रही हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे क्षेत्रों में जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ती हैं। इसी वजह से भूमि खरीद और सरकारी विकास योजनाओं के बीच संबंधों की जांच की मांग भी तेज हो रही है।

विपक्षी दलों का आरोप है कि यदि सत्ता से जुड़े लोग विकास योजनाओं से पहले बड़े पैमाने पर जमीन खरीदते हैं और बाद में उन्हीं क्षेत्रों में सरकारी निवेश पहुंचता है, तो यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि नैतिक जवाबदेही का भी मामला बन जाता है। विपक्ष इस पूरे मामले में स्वतंत्र जांच और विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग कर रहा है।

हालांकि राज्य सरकार से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री के विस्तारित परिवार का लंबे समय से रियल एस्टेट कारोबार से संबंध रहा है और जमीन खरीदना अपने आप में किसी भी प्रकार की अनियमितता साबित नहीं करता। अधिकारियों का यह भी कहना है कि सभी लेन-देन वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत हुए हैं और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पूरी जांच आवश्यक है।

लेकिन बहस यहीं खत्म नहीं होती। लोकतंत्र में सवाल केवल वैधता का नहीं, बल्कि पारदर्शिता का भी होता है। यदि मुख्यमंत्री के परिवार और रिश्तेदारों के पास विकास परियोजनाओं से लाभान्वित होने वाली बड़ी मात्रा में जमीन है, तो जनता यह जानना चाहती है कि इन खरीदों का समय, स्थान और परियोजनाओं की घोषणा के बीच क्या संबंध था।

उज्जैन में राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज है। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि शहर के विस्तार और मास्टर प्लान से जुड़ी सूचनाओं का लाभ चुनिंदा लोगों तक पहले पहुंचता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर सामने आई रिपोर्ट ने उन चर्चाओं को नई ऊर्जा दे दी है।

इस पूरे विवाद ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। क्या देश के बड़े टीवी चैनल और राष्ट्रीय बहसें इस मुद्दे को उतनी ही प्रमुखता देंगी जितनी अन्य राज्यों या विपक्षी नेताओं से जुड़े मामलों को दी जाती है? क्या सत्ता से जुड़े भूमि सौदों पर भी वैसी ही जांच और सवाल होंगे जैसे अन्य राजनीतिक विवादों पर होते हैं?

एक बात स्पष्ट है—उज्जैन की जमीनें केवल रियल एस्टेट का विषय नहीं रह गई हैं। यह मामला अब सत्ता, पारदर्शिता, नैतिक जवाबदेही और विकास मॉडल की विश्वसनीयता से जुड़ चुका है। आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया, संभावित जांच और राजनीतिक संघर्ष तय करेगा कि यह विवाद केवल एक राजनीतिक आरोप बनकर रह जाता है या फिर मध्य प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted