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क्या क्षेत्रीय दलों का सूर्यास्त शुरू हो चुका है, या भारतीय राजनीति नए पुनर्गठन के दौर में है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 जून 2026

कांग्रेस को खत्म करने निकली राजनीति ने कई क्षेत्रीय दलों को कमजोर कर दिया, लेकिन क्या अंततः वही कांग्रेस सबसे बड़ी चुनौती बनकर लौट रही है?

भारतीय राजनीति बेहद निर्मम होती है। यहां न तो कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई स्थायी शत्रु। सत्ता, संगठन, नेतृत्व और जनाधार—इन्हीं चार स्तंभों पर राजनीतिक दल खड़े रहते हैं। इनमें से एक भी स्तंभ कमजोर पड़ा तो कभी अजेय दिखने वाले दल भी देखते-देखते ढह जाते हैं।

आज भारतीय राजनीति एक बड़े संक्रमणकाल से गुजर रही है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर खुली बगावत, महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) पर लगातार राजनीतिक दबाव, जदयू की सिकुड़ती प्रासंगिकता, एनसीपी का विभाजन, बसपा का ठहराव और आम आदमी पार्टी की चुनौतियां एक बड़े सवाल को जन्म देती हैं—क्या क्षेत्रीय दलों का स्वर्णिम युग समाप्ति की ओर है?

पहली नजर में तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना की स्थिति समान दिखाई दे सकती है, लेकिन दोनों की राजनीतिक संरचना में बुनियादी अंतर है। तृणमूल कांग्रेस मुख्यतः ममता बनर्जी के करिश्माई नेतृत्व और सत्ता तंत्र पर आधारित पार्टी रही है। यदि संगठनात्मक टूट लगातार बढ़ती है और सत्ता का आधार कमजोर होता है, तो पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है।

इसके विपरीत शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की क्षेत्रीय अस्मिता, मराठी स्वाभिमान और भावनात्मक पहचान का प्रतीक भी रही है। 2022 के विभाजन के बाद विधायक गए, सांसद गए, चुनाव चिह्न गया, सत्ता गई, लेकिन उद्धव ठाकरे राजनीति से गायब नहीं हुए। इसका कारण केवल संगठन नहीं, बल्कि वह सहानुभूति है जो महाराष्ट्र के एक बड़े वर्ग में आज भी मौजूद है।

राजनीति में सहानुभूति कई बार संसाधनों और सत्ता से भी बड़ी ताकत बन जाती है। इंदिरा गांधी से लेकर एन.टी. रामाराव, लालू प्रसाद यादव और जगन मोहन रेड्डी तक भारतीय राजनीति ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है। यही कारण है कि शिवसेना (यूबीटी) को खत्म घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी।

दूसरी तरफ जनता दल (यूनाइटेड) की स्थिति कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। पार्टी की पूरी राजनीतिक पहचान लगभग नीतीश कुमार के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है। नेतृत्व का अगला चेहरा स्पष्ट नहीं है और संगठनात्मक विस्तार भी रुक चुका है। बिहार की राजनीति में जदयू की भूमिका पहले जैसी निर्णायक नहीं रह गई है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का संकट भी कम गहरा नहीं है। शरद पवार भारतीय राजनीति के सबसे कुशल रणनीतिकारों में गिने जाते हैं, लेकिन पार्टी विभाजन ने संगठनात्मक ढांचे को गंभीर क्षति पहुंचाई है। सवाल यह नहीं है कि शरद पवार कितने बड़े नेता हैं, बल्कि यह है कि उनके बाद पार्टी कितनी टिकाऊ साबित होगी।

बहुजन समाज पार्टी का मामला सबसे अलग है। यह पार्टी सामाजिक आंदोलन से निकली और सत्ता तक पहुंची। लेकिन पिछले एक दशक में संगठनात्मक जड़ता, नेतृत्व की सीमित सक्रियता और नए सामाजिक गठबंधनों की कमी ने उसे कमजोर किया है। बसपा का संकट बाहरी विरोधियों से अधिक आंतरिक निष्क्रियता का संकट है। हालांकि दलित राजनीति में उसका प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है, ऐसा कहना अभी भी जल्दबाजी होगी।

आम आदमी पार्टी भी अपने विस्तारवादी दौर से निकलकर अस्तित्व बचाने की राजनीति के दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। दिल्ली मॉडल ने उसे राष्ट्रीय पहचान दी, लेकिन राष्ट्रीय विस्तार उस गति से नहीं हो पाया जिसकी अपेक्षा की गई थी।

इन सबके बीच सबसे रोचक कहानी कांग्रेस की है।

2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति से अप्रासंगिक बनाना था। उस समय ऐसा लगता भी था कि कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने वाली है। 2014 और 2019 के चुनावों ने इस धारणा को और मजबूत किया।

लेकिन राजनीति में रिक्त स्थान कभी स्थायी नहीं रहता।

आज कांग्रेस 2014 और 2019 की तुलना में कहीं अधिक संगठित, आत्मविश्वासी और आक्रामक दिखाई देती है। कई राज्यों में उसका वोट शेयर बढ़ा है। विपक्षी राजनीति का केंद्रीय ध्रुव बनने की उसकी क्षमता भी मजबूत हुई है। राहुल गांधी, जिनकी राजनीतिक क्षमता पर कभी गंभीर सवाल उठाए जाते थे, अब विपक्षी राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं।

यह स्थिति 2004 की याद दिलाती है। तब अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों को अटल बिहारी वाजपेयी की वापसी लगभग तय लग रही थी। लेकिन चुनाव परिणामों ने सारे अनुमान बदल दिए। उस दौर में उम्मीदों का केंद्र सोनिया गांधी थीं, आज कांग्रेस की राजनीति राहुल गांधी के इर्द-गिर्द पुनर्गठित होती दिखाई दे रही है।

हालांकि राजनीति में किसी भी दल के भविष्य को अंतिम रूप से तय करना जोखिम भरा होता है। भारतीय मतदाता बार-बार साबित कर चुका है कि वह राजनीतिक समीकरणों को पलटने की क्षमता रखता है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति एक नए पुनर्गठन के दौर में प्रवेश कर चुकी है।

कुछ क्षेत्रीय दल सिकुड़ रहे हैं, कुछ टूट रहे हैं, कुछ नए गठबंधनों की तलाश में हैं। वहीं कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी अपने राजनीतिक पुनर्जागरण का दावा कर रही है।

आने वाले चुनाव केवल सरकारें नहीं तय करेंगे। वे यह भी तय करेंगे कि भारत की राजनीति का अगला दशक क्षेत्रीय दलों का होगा, राष्ट्रीय दलों का होगा या फिर एक नए राजनीतिक संतुलन का।

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