अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग/वॉशिंगटन | 23 जून 2026
ईरान संकट ने खोले बीजिंग के लिए नए दरवाजे, अमेरिका-इज़राइल की सैन्य रणनीति पर उठे सवाल
पश्चिम एशिया में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच महीनों तक चले संघर्ष ने दुनिया की भू-राजनीति को झकझोर कर रख दिया। लेकिन इस पूरे संकट में एक ऐसा देश भी रहा जिसने न तो कोई मिसाइल दागी, न सेना भेजी और न ही युद्ध में सीधे तौर पर हिस्सा लिया। इसके बावजूद वह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा रणनीतिक लाभार्थी बनकर उभरता दिखाई दे रहा है। वह देश है—चीन।
जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, तब चीन ने खुलकर युद्ध का समर्थन करने के बजाय बातचीत और कूटनीतिक समाधान की वकालत की। बीजिंग ने ईरानी नेतृत्व पर हमलों की आलोचना की और लगातार कहा कि सैन्य कार्रवाई के बजाय संवाद ही समाधान का रास्ता है। चीन ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता कोशिशों का भी समर्थन किया और दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की अपील की।
युद्ध के शुरुआती दिनों में कई विशेषज्ञों का मानना था कि ईरान पर हमले का सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान चीन को होगा, क्योंकि चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है। चीन के तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। लेकिन बीजिंग ने वर्षों पहले ही संभावित संकट को भांपते हुए ऊर्जा सुरक्षा की व्यापक तैयारी कर रखी थी।
रिपोर्टों के अनुसार चीन ने लगभग 1.2 अरब बैरल तेल का रणनीतिक भंडार तैयार कर रखा था। इसके अलावा उसने वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग विकसित किए, नवीकरणीय ऊर्जा में भारी निवेश किया और इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों तथा सौर ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व हासिल कर लिया। परिणाम यह हुआ कि जहां कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा, वहीं चीन अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा।
दिलचस्प बात यह है कि युद्ध के दौरान चीन ने खुद को एक “शांतिदूत” और “जिम्मेदार वैश्विक शक्ति” के रूप में प्रस्तुत किया। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सार्वजनिक रूप से चीन का धन्यवाद किया। इससे बीजिंग को यह संदेश देने का अवसर मिला कि जहां अमेरिका और उसके सहयोगी सैन्य कार्रवाई में व्यस्त थे, वहीं चीन शांति और संवाद का पक्षधर बना रहा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे संघर्ष के दौरान तटस्थ रहे। ट्रंप ने यहां तक कहा कि शी जिनपिंग ने संकट को सुलझाने में मदद की और उनकी भूमिका उपयोगी रही।
विश्लेषकों का मानना है कि इस संघर्ष ने अमेरिका की सैन्य शक्ति और उसकी रणनीतिक सीमाओं पर भी नए सवाल खड़े किए हैं। महीनों तक चले युद्ध के बावजूद वॉशिंगटन कोई निर्णायक परिणाम हासिल नहीं कर सका। इससे चीन को यह आकलन करने का मौका मिला कि यदि भविष्य में ताइवान जैसे मुद्दों पर कोई बड़ा संकट पैदा होता है, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी हो सकती है।
बीजिंग स्थित सेंटर फॉर चाइना एंड ग्लोबलाइजेशन के अध्यक्ष हेनरी वांग का कहना है कि अमेरिका और इज़राइल की सैन्य कार्रवाई ने पिछले 80 वर्षों से स्थापित वैश्विक व्यवस्था को कमजोर किया है। उनके अनुसार यह संघर्ष अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए शक्ति संतुलन की शुरुआत का संकेत हो सकता है।
इस बीच स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच हुई पहली दौर की वार्ता सकारात्मक रही है। दोनों देशों ने 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमति जताई है और एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने का फैसला किया है।
हालांकि युद्ध का तत्काल खतरा कम होता दिखाई दे रहा है, लेकिन इस पूरे संकट ने एक महत्वपूर्ण संदेश जरूर दिया है—21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में केवल सैन्य शक्ति ही निर्णायक नहीं है। आर्थिक तैयारी, ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन और रणनीतिक धैर्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि युद्ध से दूर रहकर भी चीन आज खुद को इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा रणनीतिक विजेता मान सकता है।




