Home » National » आज़ादी से आत्मनिर्भरता तक: महिला, बाल विकास और जनकल्याण की राष्ट्रीय यात्रा

आज़ादी से आत्मनिर्भरता तक: महिला, बाल विकास और जनकल्याण की राष्ट्रीय यात्रा

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

प्रस्तावना: स्वतंत्र भारत में सामाजिक पुनर्निर्माण का संकल्प 15 अगस्त 1947 को जब भारत आज़ाद हुआ, तब देश की जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग—महिलाएं और बच्चे—सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यंत पिछड़े थे। आज़ादी की सुबह केवल राजनैतिक स्वाधीनता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समता की रोशनी भी लेकर आई। संविधान निर्माताओं ने महिलाओं और बच्चों को समान अधिकार और गरिमामयी जीवन की गारंटी दी। इसी सोच से महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार और समावेशी जनकल्याण की योजनाएं शुरू हुईं, जिनका असर आज हम ग्रामीण भारत से लेकर वैश्विक मंचों तक देख सकते हैं।

संवैधानिक सुरक्षा और महिला अधिकारों की नींव भारतीय संविधान ने महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिए। अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15(1) (लिंग के आधार पर भेदभाव निषेध), अनुच्छेद 16 (रोज़गार में समान अवसर), और अनुच्छेद 39 (राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों) में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा की नींव रखी गई। 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण दिया गया, जिसे कई राज्यों ने बढ़ाकर 50% कर दिया। यह एक ऐतिहासिक कदम था, जिसने लाखों ग्रामीण महिलाओं को राजनीतिक सशक्तिकरण का अवसर दिया।

महिला शिक्षा और कौशल विकास में क्रांति आजादी के शुरुआती दशकों में लड़कियों की शिक्षा दर अत्यंत कम थी। 1951 में महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 8.9% थी, जो 2021 तक बढ़कर 70% से अधिक हो चुकी है। इसके लिए सर्व शिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसी योजनाएं निर्णायक साबित हुईं। साथ ही, महिला आईटीआई, स्किल इंडिया, राष्ट्रीय महिला उद्यमिता मिशन जैसी पहलों ने महिलाओं को नए युग के कौशल से लैस किया। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के तहत लाखों महिलाओं ने रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण प्राप्त किया।

महिला स्वास्थ्य और मातृत्व सुरक्षा में उन्नति मातृ मृत्यु दर (MMR) में उल्लेखनीय गिरावट आई है—1990 के आसपास जहाँ यह 556 प्रति एक लाख जन्म थी, वहीं 2020 तक यह घटकर 97 हो चुकी है। जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने वाली पहलें महिलाओं के स्वास्थ्य की रीढ़ बनीं। आयुष्मान भारत योजना ने गरीब महिलाओं को पाँच लाख तक की मुफ्त स्वास्थ्य सेवा प्रदान की। साथ ही, मिशन इंद्रधनुष के तहत करोड़ों महिलाओं और बच्चों को टीकाकरण का लाभ मिला। आयुष और योग आधारित मातृत्व एवं प्रसव संबंधी कार्यक्रमों ने भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वाभाविक लोकप्रियता पाई है।

कानून और महिला सुरक्षा: सशक्त नारी, सुरक्षित समाज वर्षों के संघर्ष के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई सशक्त कानून लागू हुए—दहेज प्रतिषेध अधिनियम (1961), बाल विवाह निषेध अधिनियम, घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम (2005), कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH) कानून (2013), और हाल ही में ट्रिपल तलाक पर प्रतिबंध (2019)। महिला हेल्पलाइन (181), वन स्टॉप सेंटर (सखी सेंटर), निर्भया फंड और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर शिकायतों की सुविधा ने कानून को ज़मीनी स्तर पर लागू करने में मदद की है।

आर्थिक सशक्तिकरण और महिला उद्यमिता महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए स्वसहायता समूह (SHGs), दीनदयाल अंत्योदय योजना, महिला बैंकिंग (जैसे उज्ज्वला योजना के तहत खाते), मुद्रा योजना और डिजिटल भुगतान प्रणाली ने निर्णायक भूमिका निभाई। ई-ग्राम स्वराज पोर्टल और महिला मंडल एप जैसे डिजिटल प्रयासों से ग्रामीण महिलाओं ने स्वरोजगार और ई-मार्केटिंग में कदम रखा है। भारत में 2023 तक 80 लाख से अधिक महिला उद्यमी पंजीकृत हो चुकी थीं।

बाल अधिकार और सुरक्षा: भविष्य की नींव मजबूत बच्चों के लिए RTE कानून (2009), किशोरी बालिकाओं के लिए RKSK योजना, आंगनवाड़ी सेवाओं का विस्तार, मिड-डे मील स्कीम, और कोविड के बाद PM-POSHAN योजना जैसे कार्यक्रमों ने पोषण और शिक्षा का आधार मजबूत किया। POCSO अधिनियम (2012) ने बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण दिया। बाल श्रम निषेध और संरक्षण अधिनियम, और मिशन वात्सल्य के तहत बच्चों के पुनर्वास एवं देखरेख की योजनाएं चलाई गईं। डिजिटल शिक्षा के लिए DIKSHA और PM eVIDYA जैसे प्लेटफॉर्म्स प्रभावी साबित हुए।

महिला नेतृत्व और वैश्विक मंचों पर भारत की पहचान इंदिरा गांधी से लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक, भारत ने महिला नेतृत्व के अनेक स्वर्णिम उदाहरण गढ़े हैं। भारतीय सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन, लड़ाकू भूमिका और NDA में प्रवेश जैसी उपलब्धियाँ हाल के वर्षों में दर्ज हुई हैं। ISRO, DRDO, IITs और न्यायपालिका में महिला उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। भारत ने G20, UN, WHO जैसे मंचों पर महिला और बाल अधिकारों के लिए नीतिगत नेतृत्व प्रदान किया है। ‘लैंगिक बजटिंग’ और ‘सेंटर फॉर जेंडर इक्विटी’ जैसे मॉडल अब वैश्विक अनुकरणीय बन चुके हैं।

समावेशी भारत का निर्माण स्वतंत्र भारत की विकास गाथा में महिला और बाल विकास केवल सामाजिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्थान का आधार रहे हैं। आज़ादी के 78 वर्षों में देश ने इन्हें नीति, कानून, योजना, बजट और तकनीक के माध्यम से सामाजिक शक्ति में बदला है। महिला और बाल कल्याण को मुख्यधारा में लाकर भारत एक समावेशी, न्यायपूर्ण और आत्मनिर्भर राष्ट्र की ओर अग्रसर है—जहाँ हर नागरिक, चाहे वह नारी हो या बालक, सशक्त, सुरक्षित और स्वाभिमानी जीवन जी सके।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments