Home » Opinion » मोदी ने ममता को हराया या इंडिया गठबंधन की उलझन सुलझा दी?

मोदी ने ममता को हराया या इंडिया गठबंधन की उलझन सुलझा दी?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 जून 2026

राजनीति कई बार ऐसे दिलचस्प मोड़ लेती है जहां विरोधी की जीत भी आपके लिए फायदे का सौदा साबित हो जाती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो कुछ हुआ, उसके बाद विपक्षी खेमे में एक नया तर्क तेजी से चर्चा में है—क्या नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाकर अनजाने में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का ही रास्ता साफ कर दिया?

तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से इंडिया गठबंधन का हिस्सा तो थी, लेकिन उसके राजनीतिक तेवर अक्सर सहयोगी दलों से अलग दिखाई देते थे। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले और उसके बाद भी तृणमूल कांग्रेस के कई नेता खुद को विपक्ष का सबसे प्रभावशाली चेहरा मानते रहे। गोदी मीडिया हो या तथाकथित सेक्युलर विश्लेषक, एक बड़ा वर्ग लगातार यह नैरेटिव गढ़ता रहा कि बीजेपी को अगर कोई चुनौती दे सकता है तो वह केवल ममता बनर्जी हैं और विपक्ष का नेतृत्व भी उन्हीं के हाथों में होना चाहिए।

यही वह बिंदु था जहां कांग्रेस और तृणमूल के बीच अंतर्विरोध दिखाई देने लगे थे। कांग्रेस के भीतर एक बड़ा वर्ग मानता था कि राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के बावजूद उसे लगातार पीछे धकेलने की कोशिश हो रही है। दूसरी तरफ तृणमूल के समर्थकों का मानना था कि राहुल गांधी की तुलना में ममता बनर्जी अधिक आक्रामक और प्रभावी चुनौती पेश कर सकती हैं।

यदि पश्चिम बंगाल में तृणमूल अपनी राजनीतिक शक्ति को बरकरार रखती और पहले से अधिक मजबूत होकर उभरती, तो संभव था कि 2029 के लिए प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का मुद्दा इंडिया गठबंधन के भीतर बड़ा विवाद बन जाता। समाजवादी पार्टी, कुछ क्षेत्रीय दल और अन्य सहयोगी भी शक्ति संतुलन के हिसाब से नए समीकरण बनाने लगते। ऐसे में बीजेपी से लड़ने की बजाय विपक्ष का बड़ा समय नेतृत्व की लड़ाई में खर्च होता।

आज स्थिति अलग है। तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक ताकत कमजोर होने और उसके नेताओं के टूटकर जाने के बाद इंडिया गठबंधन में नेतृत्व को लेकर पहले जैसी अनिश्चितता नहीं दिखाई देती। कांग्रेस स्वाभाविक रूप से गठबंधन के केंद्र में लौट आई है और राहुल गांधी विपक्ष के सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरे के रूप में उभरे हैं।

ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी आलोचना यह रही है कि उन्होंने कई बार विपक्षी एकता से ज्यादा अपनी पार्टी के विस्तार को प्राथमिकता दी। कांग्रेस के पारंपरिक क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारना हो या सहयोगी दलों के साथ टकराव, तृणमूल ने अक्सर ऐसा रास्ता चुना जिससे विपक्षी एकता कमजोर हुई। आलोचकों का मानना है कि यदि उन्होंने समय रहते व्यापक विपक्षी गठबंधन की राजनीति को स्वीकार किया होता तो तस्वीर अलग हो सकती थी।

कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक डीएमके का उदाहरण भी देते हैं। उनका तर्क है कि क्षेत्रीय दल जब अपने प्रभाव को राष्ट्रीय प्रभाव समझने लगते हैं तो रणनीतिक गलतियां होने लगती हैं। राजनीति केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं बल्कि गठबंधन प्रबंधन का भी खेल है। जहां कांग्रेस धीरे-धीरे सहयोगियों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रही थी, वहीं कई क्षेत्रीय दल अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं में उलझे दिखाई दिए।

यह भी सच है कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई केवल एक राज्य या एक नेता के दम पर नहीं जीती जा सकती। राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक गठबंधन, साझा एजेंडा और नेतृत्व की स्पष्टता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी चुनावी ताकत। पश्चिम बंगाल की घटनाओं ने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि इंडिया गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर पहले जैसी धुंध अब नहीं रही।

राजनीति की विडंबना देखिए। जिन नरेंद्र मोदी पर विपक्ष को कमजोर करने का आरोप लगाया जाता है, उन्हीं की राजनीतिक रणनीति के परिणामस्वरूप विपक्ष के भीतर मौजूद एक बड़ा अंतर्विरोध भी समाप्त होता दिखाई दे रहा है। इसीलिए विपक्षी खेमे में कुछ लोग व्यंग्य में कह रहे हैं—”मोदी हैं तो मुमकिन है।”

हालांकि यह केवल एक राजनीतिक दृष्टिकोण है। वास्तविकता का फैसला अंततः 2029 का चुनाव करेगा, जब यह स्पष्ट होगा कि विपक्ष की यह नई स्पष्टता उसे मजबूत बनाती है या क्षेत्रीय दलों की कमजोरी उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted