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दीदी तय करें—अभिषेक या हम? कल्याण बनर्जी के अल्टीमेटम से TMC में सत्ता संग्राम

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 11 जून 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहा असंतोष अब खुली बगावत का रूप लेता दिखाई दे रहा है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद, चार बार के लोकसभा सदस्य और जाने-माने अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के सामने ऐसा अल्टीमेटम रख दिया है जिसने पार्टी में मचे घमासान को सार्वजनिक कर दिया है। कल्याण बनर्जी ने साफ शब्दों में कहा है कि अब ममता बनर्जी को फैसला करना होगा कि वे अभिषेक बनर्जी को चुनती हैं या उन नेताओं को जो वर्षों से पार्टी और उनके प्रति वफादार रहे हैं। इस बयान को टीएमसी के अंदर छिड़े नेतृत्व संघर्ष का सबसे बड़ा सार्वजनिक विस्फोट माना जा रहा है।

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब कलकत्ता हाईकोर्ट में फर्जी हस्ताक्षर और सीआईडी समन से जुड़े मामले में अभिषेक बनर्जी की ओर से पेश होने से कल्याण बनर्जी ने इनकार कर दिया। अदालत में सुनवाई के दौरान उनकी अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। बाद में मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी का बढ़ता अहंकार अब असहनीय हो चुका है और इसी कारण उन्होंने न केवल इस मामले बल्कि भविष्य में अभिषेक से जुड़े किसी भी कानूनी मामले से दूरी बनाने का फैसला किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने स्वयं अदालत में मामले की तत्काल सुनवाई की व्यवस्था करवाई थी, लेकिन बाद में अभिषेक बनर्जी ने उनके बेटे और सहयोगियों को दरकिनार कर किसी जूनियर वकील को पेश करने का निर्णय लिया, जिसे उन्होंने व्यक्तिगत और पेशेवर अपमान बताया।

कल्याण बनर्जी यहीं नहीं रुके। उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के लिए भी सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि पार्टी की मौजूदा दयनीय स्थिति के बावजूद अभिषेक के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा कि “पार्टी बर्बाद हो गई, लेकिन उनका घमंड नहीं गया।” यह बयान इसलिए और महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कल्याण बनर्जी लंबे समय से ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते रहे हैं और संगठन में उनका प्रभाव भी कम नहीं माना जाता।

टीएमसी के लिए यह संकट ऐसे समय सामने आया है जब पार्टी पहले ही बड़े राजनीतिक झटकों से गुजर रही है। लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से 19 सांसदों के बागी होने की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ चुकी हैं। इनमें काकोली घोष, यूसुफ पठान, सायोनी घोष, शत्रुघ्न सिन्हा, शताब्दी रॉय, रचना बनर्जी, पार्थ भौमिक, बापी हलदार और कई अन्य प्रभावशाली चेहरे शामिल बताए जा रहे हैं। दूसरी ओर राज्यसभा में 12 सांसदों में से दो सांसदों के इस्तीफे ने भी पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हाल ही में सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के इस्तीफों को इसी असंतोष की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल व्यक्तिगत टकराव नहीं बल्कि टीएमसी में नेतृत्व और उत्तराधिकार की लड़ाई का संकेत है। अभिषेक बनर्जी को लंबे समय से ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन पार्टी के कई पुराने नेताओं को लगता है कि संगठन में फैसले अब सीमित दायरे में लिए जा रहे हैं और अनुभवी नेताओं की भूमिका लगातार कम होती जा रही है। यही वजह है कि चुनावी पराजय के बाद असंतोष दबे स्वर से निकलकर खुली चुनौती के रूप में सामने आ रहा है।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि ममता बनर्जी इस संकट से कैसे निपटेंगी। क्या वे अपने भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के पीछे मजबूती से खड़ी रहेंगी, या फिर संगठन में बढ़ती नाराजगी को शांत करने के लिए वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलने की नई रणनीति बनाएंगी? कल्याण बनर्जी के अल्टीमेटम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि टीएमसी में अब केवल राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि अस्तित्व और नेतृत्व की लड़ाई चल रही है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने जल्द कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया, तो टीएमसी में जारी बगावत और गहरा सकती है। लोकसभा सांसदों की नाराजगी, राज्यसभा से इस्तीफे, विधायकों के असंतोष और अब कल्याण बनर्जी जैसी वरिष्ठ हस्ती की खुली चेतावनी ने यह संकेत दे दिया है कि तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट के दौर से गुजर रही है। देश की नजरें ममता बनर्जी पर टिकी हैं—क्या वे पार्टी को एकजुट रखने में सफल होंगी या टीएमसी का यह सत्ता संघर्ष और बड़ा राजनीतिक विस्फोट साबित होगा।

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