अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/तेहरान | 3 जून 2026
अमेरिका ने ईरान के साथ चल रही वार्ताओं के बीच अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि केवल होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोल देने के बदले तेहरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाए जाएंगे। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि किसी भी प्रकार की प्रतिबंध राहत ईरान द्वारा संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम छोड़ने और अपने परमाणु कार्यक्रम पर ठोस समझौते से ही जुड़ी होगी।
रुबियो के इस बयान को अमेरिका की अब तक की सबसे स्पष्ट और सख्त घोषणा माना जा रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं और पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण आवश्यक है।
उधर ईरान के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि वह बातचीत जारी रखने को तैयार है, लेकिन किसी भी दबाव या “समर्पण” को स्वीकार नहीं करेगा। तेहरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।
इस बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) ने चेतावनी दी है कि यदि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में व्यवधान जारी रहा तो दुनिया की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा। अनुमान है कि कई विकासशील देशों के तेल आयात खर्च में अरबों डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल परिवहन का मार्ग होर्मुज से होकर गुजरता है।
परमाणु मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल ग्रोसी ने भी कहा है कि हालिया संघर्ष के बाद ईरान की कई परमाणु गतिविधियां रुक गई हैं और उसके परमाणु कार्यक्रम के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। इससे संकेत मिलते हैं कि युद्ध और कूटनीतिक दबाव का असर ईरान की परमाणु क्षमताओं पर पड़ा है।
वहीं वॉशिंगटन में इज़राइल और लेबनान के बीच चौथे दौर की वार्ता जारी है। क्षेत्रीय तनाव कम करने और दक्षिणी लेबनान में सैन्य गतिविधियों को सीमित करने पर चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान वार्ता का परिणाम केवल दोनों देशों के संबंधों को ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगा।
यदि दोनों पक्ष किसी समझौते तक पहुंचने में सफल होते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजारों को राहत मिल सकती है, लेकिन फिलहाल अमेरिका की सख्त शर्तों और ईरान के कठोर रुख को देखते हुए अंतिम समझौते का रास्ता अभी भी चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है।




