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ट्रंप को सऊदी समर्थन, ईरान को कड़ा संदेश: “जंग नहीं, कूटनीति से निकले समाधान”

अंतरराष्ट्रीय / पश्चिम एशिया / कूटनीति | ABC NATIONAL NEWS | रियाद / वॉशिंगटन / तेहरान | 21 मई 2026

ईरान युद्ध को लेकर पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच सऊदी अरब ने पहली बार खुलकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक रणनीति का समर्थन किया है। सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने ट्रंप के उस फैसले की सराहना की, जिसमें उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित नए सैन्य हमले को रोककर बातचीत और समझौते को एक और मौका देने की बात कही। सऊदी अरब ने इसे “क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता” के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है।

प्रिंस फैसल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि सऊदी अरब “डिप्लोमेसी को मौका देने” के ट्रंप के फैसले की सराहना करता है। उन्होंने कहा कि यह कदम ईरान युद्ध को समाप्त करने, होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही को सामान्य बनाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में बेहद अहम है। सऊदी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि रियाद उम्मीद करता है कि ईरान इस अवसर का उपयोग करेगा और तनाव बढ़ाने के बजाय स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ेगा।

दरअसल, ट्रंप ने हाल ही में खुलासा किया था कि खाड़ी देशों — खासकर सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात — के नेताओं के अनुरोध पर उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को टाल दिया। ट्रंप के अनुसार, इन देशों ने आग्रह किया था कि बातचीत और मध्यस्थता को अंतिम मौका दिया जाए। इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में बैक-चैनल वार्ताएं तेज हुई हैं।

सऊदी अरब की यह प्रतिक्रिया केवल कूटनीतिक बयान नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे पूरे खाड़ी क्षेत्र की रणनीतिक चिंता के रूप में देखा जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव ने खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था, तेल निर्यात और समुद्री सुरक्षा को सीधे प्रभावित किया है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और LNG सप्लाई का रास्ता इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। युद्ध और हमलों के कारण तेल बाजार में भारी अस्थिरता पैदा हुई है और कई देशों में ईंधन तथा खाद्य संकट गहराने लगा है।

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सऊदी विदेश मंत्री ने अपने बयान में पाकिस्तान की भूमिका की भी खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इस संकट में पाकिस्तान द्वारा निभाई जा रही मध्यस्थता “महत्वपूर्ण और सराहनीय” है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान खुद को इस पूरे संकट में “शांति मध्यस्थ” के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, ताकि वह वैश्विक कूटनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर सके।

दूसरी ओर, ईरान अब भी अमेरिका पर भरोसा करने को तैयार नहीं दिख रहा। तेहरान लगातार आरोप लगा रहा है कि अमेरिका बातचीत के समानांतर सैन्य दबाव बनाए हुए है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यदि ईरान पर दोबारा हमला हुआ, तो “क्षेत्रीय युद्ध पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा।”

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संकट में सबसे बड़ा दबाव अब अमेरिका और खाड़ी देशों पर है। तेल कीमतों में तेजी, वैश्विक महंगाई और ऊर्जा आपूर्ति संकट ने पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं को भी झटका दिया है। यही कारण है कि सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश किसी भी कीमत पर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से सामान्य स्थिति में लाना चाहते हैं। पश्चिम एशिया की राजनीति एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ ट्रंप “डील या हमला” की रणनीति पर कायम हैं, दूसरी तरफ सऊदी अरब जैसे क्षेत्रीय शक्तिशाली देश युद्ध के बजाय कूटनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह बातचीत वास्तव में स्थायी समझौते तक पहुंचेगी या फिर पश्चिम एशिया एक और बड़े सैन्य विस्फोट की तरफ बढ़ रहा है।

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