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भारत-चीन संबंधों पर विजय गोखले की चेतावनी: “भारत ने रिश्तों को द्विपक्षीय माना, लेकिन चीन हमेशा भू-राजनीतिक नजरिए से देखता रहा”

कूटनीति / विदेश नीति / चीन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 मई 2026

भारत के पूर्व विदेश सचिव और चीन मामलों के विशेषज्ञ विजय गोखले ने भारत-चीन संबंधों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर टिप्पणी की है, जिसने एक बार फिर दोनों देशों के रिश्तों की वास्तविक प्रकृति पर नई बहस छेड़ दी है। अपनी नई पुस्तक “China’s Wars: The Politics and Diplomacy Behind its Military Coercion” और The Hindu को दिए गए इंटरव्यू में गोखले ने स्पष्ट कहा कि भारत ने लंबे समय तक चीन के साथ अपने संबंधों को मुख्यतः द्विपक्षीय दृष्टिकोण से देखा, जबकि बीजिंग ने कभी भी भारत को केवल एक पड़ोसी देश के रूप में नहीं देखा। उनके अनुसार चीन की रणनीति हमेशा व्यापक भू-राजनीतिक, सामरिक और वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में संचालित रही है। यही वह बुनियादी अंतर है जिसने दशकों से भारत-चीन संबंधों को अस्थिर बनाए रखा।

विजय गोखले का यह विश्लेषण ऐसे समय सामने आया है जब एशिया की राजनीति तेजी से बदल रही है। दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान, इंडो-पैसिफिक, हिमालयी सीमा और वैश्विक व्यापार मार्गों तक चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। गोखले के अनुसार चीन के सैन्य या सीमाई कदमों को केवल सीमा विवाद के नजरिए से समझना बड़ी भूल होगी। उन्होंने कहा कि चीन अतीत में जिन संघर्षों या सैन्य कार्रवाइयों में शामिल हुआ, वे केवल क्षेत्रीय विवादों का परिणाम नहीं थे, बल्कि उनके पीछे व्यापक राजनीतिक संदेश, रणनीतिक दबाव और भू-राजनीतिक हित छिपे होते थे। यही कारण है कि चीन की “ग्रे जोन कोएर्शन” नीति — यानी खुले युद्ध से नीचे रहकर लगातार दबाव बनाना — उसकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

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गोखले का संकेत साफ है कि भारत ने कई बार चीन की कार्रवाइयों को केवल सीमा प्रबंधन या द्विपक्षीय तनाव के रूप में समझने की कोशिश की, जबकि बीजिंग इन संबंधों को अमेरिका, रूस, इंडो-पैसिफिक रणनीति, वैश्विक सप्लाई चेन और एशियाई शक्ति संतुलन जैसे बड़े संदर्भों में देखता रहा। यही वजह है कि चीन की हर रणनीतिक चाल केवल हिमालय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका असर व्यापार, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों तक दिखाई देता है। उनके अनुसार चीन के लिए भारत केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एशिया में उभरती संभावित शक्ति और भविष्य के रणनीतिक प्रतिस्पर्धी के रूप में मौजूद है।

पूर्व विदेश सचिव ने यह भी संकेत दिया कि चीन का व्यवहार केवल सैन्य ताकत के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। वह आर्थिक निर्भरता, तकनीकी विस्तार, वैश्विक संस्थानों में प्रभाव, डिजिटल नियंत्रण और क्षेत्रीय गठबंधनों के जरिए भी अपने प्रतिद्वंद्वियों पर दबाव बनाता है। यही कारण है कि आज चीन की नीति को समझने के लिए केवल सीमा विवाद या सैन्य गतिविधियों का अध्ययन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन को केवल “द्विपक्षीय पड़ोसी” की तरह देखने की पुरानी सोच से बाहर निकले और उसे एक व्यापक वैश्विक शक्ति संरचना के हिस्से के रूप में समझे।

विश्लेषकों का मानना है कि विजय गोखले की यह टिप्पणी भारत की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति के लिए महत्वपूर्ण संकेत देती है। पिछले कुछ वर्षों में गलवान संघर्ष, सीमा पर सैन्य तनाव, व्यापार असंतुलन और इंडो-पैसिफिक गठबंधनों ने यह स्पष्ट किया है कि भारत-चीन संबंध अब केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रह गए हैं। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा अब आर्थिक, तकनीकी, सामरिक और वैश्विक प्रभाव के स्तर तक पहुंच चुकी है। ऐसे में चीन को समझने के लिए केवल पारंपरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं माना जा रहा।

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गोखले की पुस्तक और उनके विचार ऐसे समय सामने आए हैं जब चीन अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव, ताइवान मुद्दे, रूस के साथ साझेदारी और इंडो-पैसिफिक में बढ़ती सैन्य सक्रियता के कारण वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। भारत भी QUAD, समुद्री सुरक्षा सहयोग और वैश्विक सप्लाई चेन पुनर्गठन में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। ऐसे माहौल में भारत-चीन संबंध केवल सीमा विवाद का विषय नहीं, बल्कि 21वीं सदी के एशियाई शक्ति संतुलन का सबसे बड़ा प्रश्न बनते जा रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विजय गोखले ने चीन की नीति को “दीर्घकालिक रणनीतिक सोच” से जोड़ते हुए संकेत दिया कि बीजिंग अपने राष्ट्रीय हितों को दशकों आगे की योजना के साथ देखता है। इसके विपरीत भारत अक्सर तत्काल कूटनीतिक संकटों और सीमाई तनावों के संदर्भ में प्रतिक्रिया देता दिखाई देता है। यही अंतर आने वाले वर्षों में एशिया की राजनीति और शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि विजय गोखले की यह टिप्पणी केवल एक राजनयिक विश्लेषण नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक सोच के लिए गंभीर चेतावनी की तरह देखी जा रही है। उनका संदेश साफ है — चीन को केवल सीमा विवाद या व्यापारिक साझेदार के रूप में देखना अब पर्याप्त नहीं होगा। भारत को यह समझना होगा कि बीजिंग हर संबंध को व्यापक भू-राजनीतिक खेल का हिस्सा मानकर आगे बढ़ता है, और आने वाले दशक में यही सोच एशिया की दिशा तय कर सकती है।

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