राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 मई 2026
लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी गठबंधन INDIA bloc के भीतर अब अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। एक तरफ क्षेत्रीय दल चाहते हैं कि केंद्र की राजनीति में कांग्रेस मजबूत रहे ताकि बीजेपी का मुकाबला किया जा सके, लेकिन दूसरी तरफ वही दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को ज्यादा राजनीतिक जगह देने के पक्ष में नहीं दिखाई दे रहे। यही वजह है कि अब INDIA गठबंधन के भविष्य को लेकर बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और कई अन्य राज्यों में तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों ने विपक्षी एकता की तस्वीर को और जटिल बना दिया है।
राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा तमिलनाडु की राजनीति को लेकर हो रही है, जहां कांग्रेस और DMK के रिश्तों में दरार की खबरों ने नया मोड़ ले लिया है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) प्रमुख सी. जोसेफ विजय के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होना राजनीतिक गलियारों में बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस कदम ने कांग्रेस और DMK के बीच बढ़ती दूरी को लगभग सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दक्षिण भारत में कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
इधर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक चुनौतियों ने भी INDIA गठबंधन के भीतर असहजता बढ़ा दी है। क्षेत्रीय दलों को डर है कि यदि कांग्रेस राज्यों में फिर से मजबूत होने लगी तो उनका पारंपरिक वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि विपक्षी दल राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ दिखना चाहते हैं, लेकिन राज्य स्तर पर उसे सीमित रखना चाहते हैं। राजनीतिक जानकार इसे “डबल स्ट्रेटेजी” बता रहे हैं — यानी दिल्ली में कांग्रेस की जरूरत, लेकिन राज्यों में दूरी।
कांग्रेस की रणनीति भी अब पहले से अलग दिखाई दे रही है। पार्टी नेतृत्व समझ चुका है कि केवल गठबंधन की राजनीति के भरोसे लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में वापसी मुश्किल है। ऐसे में कांग्रेस उन राज्यों में भी खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है जहां अब तक क्षेत्रीय दलों का दबदबा रहा है। तमिलनाडु, बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस की बढ़ती सक्रियता ने सहयोगी दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। कई विपक्षी नेताओं को आशंका है कि कांग्रेस भविष्य में उनके राजनीतिक स्पेस को चुनौती दे सकती है।
उधर बीजेपी लगातार विपक्ष की इसी अंदरूनी खींचतान को मुद्दा बनाकर हमला बोल रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि INDIA गठबंधन केवल “सत्ता विरोधी मजबूरी” पर टिका हुआ है, जबकि उसके सहयोगी दलों के बीच भरोसे की कमी साफ दिखाई दे रही है। सत्तापक्ष यह दावा कर रहा है कि विपक्षी दल राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने की बात करते हैं, लेकिन राज्यों में एक-दूसरे को कमजोर करने में लगे रहते हैं। यही वजह है कि बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को “विपक्ष की राजनीतिक अस्थिरता” के रूप में पेश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में INDIA गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती “नेतृत्व और राजनीतिक स्पेस” को लेकर होगी। क्षेत्रीय दल नहीं चाहते कि कांग्रेस राज्यों में फिर से पुराने प्रभाव के साथ लौटे, जबकि कांग्रेस अब खुद को केवल सहयोगी भूमिका तक सीमित रखने के मूड में नहीं दिख रही। यही टकराव भविष्य में गठबंधन की राजनीति को और कठिन बना सकता है।
फिलहाल विपक्षी एकता की तस्वीर जितनी बाहर से मजबूत दिखाई जाती है, अंदरूनी हालात उतने ही उलझे हुए नजर आ रहे हैं। दिल्ली में बीजेपी के खिलाफ साझा रणनीति की बात हो रही है, लेकिन राज्यों में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लगातार तेज होती जा रही है। ऐसे में आने वाले समय में INDIA गठबंधन कितनी मजबूती से टिक पाएगा, इस पर राजनीतिक गलियारों की नजरें टिकी हुई हैं।




