अंतरराष्ट्रीय | महेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 मई 2026
अमेरिका-ईरान युद्ध और वैश्विक सप्लाई संकट के बीच अब चीन की गतिविधियों ने दुनिया की चिंता और बढ़ा दी है। आरोप है कि चीन चुपचाप बड़े पैमाने पर अनाज, खाद और जरूरी कृषि संसाधनों का भंडारण कर रहा है। इस मुद्दे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन ने इसी तरह जमाखोरी जारी रखी, तो आने वाले महीनों में वैश्विक खाद्य और कृषि संकट और गहरा सकता है। इसका सीधा असर भारत जैसे कृषि प्रधान देशों पर भी पड़ सकता है। विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष डेविड मालपास ने चीन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बीजिंग दुनिया का सबसे बड़ा खाद और अनाज भंडार तैयार कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि मौजूदा वैश्विक संकट के समय इस तरह की जमाखोरी अंतरराष्ट्रीय बाजार को अस्थिर कर सकती है। उन्होंने कहा कि चीन को तत्काल यह नीति रोकनी चाहिए, वरना खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
दरअसल, पश्चिम एशिया में युद्ध और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में बढ़ते तनाव ने वैश्विक सप्लाई चेन को पहले ही झटका दे दिया है। तेल, गैस, खाद और कई जरूरी वस्तुओं की ढुलाई प्रभावित हो रही है। इसी बीच चीन ने खाद के निर्यात पर रोक जैसे कदम उठाकर कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन अपने घरेलू भंडार को लगातार बढ़ा रहा है ताकि भविष्य में किसी भी आपूर्ति संकट से निपटा जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन केवल सुरक्षा कारणों से ऐसा नहीं कर रहा, बल्कि इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक सोच भी हो सकती है। जब वैश्विक बाजार में कमी होगी और कीमतें बढ़ेंगी, तब विशाल भंडार रखने वाले देशों को बड़ा फायदा मिल सकता है। माना जा रहा है कि चीन आने वाले समय में खाद और अनाज को “रणनीतिक हथियार” की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर चिंताजनक मानी जा रही है। भारत यूरिया और डीएपी जैसी कई जरूरी खादों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है। चीन अगर निर्यात कम करता है या भंडारण बढ़ाता है, तो भारतीय बाजार में खाद की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका असर सीधे किसानों और कृषि उत्पादन पर पड़ेगा।
रिपोर्ट्स के अनुसार युद्ध शुरू होने से पहले जहां भारत लगभग 500 डॉलर प्रति टन की दर से यूरिया खरीद रहा था, वहीं अब कीमतें लगभग दोगुनी तक पहुंचने लगी हैं। इससे खेती की लागत बढ़ने का खतरा है। अगर खाद महंगी होगी, तो फसल उत्पादन प्रभावित होगा और अंत में आम लोगों को महंगाई का सामना करना पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पहले भी कई बार रणनीतिक संसाधनों को लेकर इसी तरह की नीतियां अपनाता रहा है। चाहे दुर्लभ खनिज हों, इलेक्ट्रॉनिक सप्लाई हो या कृषि संसाधन — चीन वैश्विक बाजार में अपनी पकड़ मजबूत रखने की कोशिश करता रहा है। अब अनाज और खाद को लेकर उठे सवालों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता और बढ़ा दी है।
भारत सरकार भी हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है। सूत्रों के मुताबिक कृषि मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं। सरकार वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश में भी जुटी हुई है ताकि भविष्य में खाद संकट को रोका जा सके। इसके अलावा घरेलू उत्पादन बढ़ाने और रणनीतिक भंडार तैयार करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में संकट बना रहता है, तो पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। ऐसे में चीन की जमाखोरी जैसी खबरें बाजार में डर और अनिश्चितता को और बढ़ा रही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अब युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि खाद, ऊर्जा, सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था भी आधुनिक भू-राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले दिनों में दुनिया की नजर चीन की अगली रणनीति और वैश्विक बाजार की प्रतिक्रिया पर टिकी रहेगी।




