अंतरराष्ट्रीय | लवेंद्र बहादुर थापा | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 11 मई 2026
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने नेपाल सरकार से काठमांडू में चल रही कथित जबरन बेदखली कार्रवाई को तुरंत रोकने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने कहा कि राजधानी काठमांडू के नदी किनारे बसे अनौपचारिक बस्तियों से हजारों लोगों को बिना पर्याप्त सुरक्षा और पुनर्वास व्यवस्था के हटाया जा रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों और नेपाल के संविधान का उल्लंघन हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (OHCHR) की ओर से जारी बयान के अनुसार, 25 अप्रैल 2026 से थापाथली, मनोहरा, सिनामंगल, बल्खु, बंसीघाट, बालाजू और धोबीखोला कॉरिडोर सहित कई इलाकों में बेदखली अभियान चलाया जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि प्रभावित परिवारों को केवल 24 घंटे का नोटिस दिया गया और उसके बाद तेजी से मकानों को तोड़ा गया।
यूएन विशेषज्ञों ने कहा, “हजारों लोग, जिनमें कई आंतरिक रूप से विस्थापित और बेहद कमजोर परिस्थितियों में रहने वाले परिवार शामिल हैं, उन्हें पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था के बिना हटाया जा रहा है। यह नेपाल की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों के खिलाफ है।”
बयान में दो लोगों की मौत पर भी गंभीर चिंता जताई गई। जानकारी के अनुसार, 24 अप्रैल को मनोहरा बस्ती में एक 18 वर्षीय युवक ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली, जबकि 1 मई को बल्खु क्षेत्र के एक 61 वर्षीय निवासी का शव बागमती नदी से मिला। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि दोनों घटनाएं बेदखली से पैदा हुई निराशा से जुड़ी हो सकती हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि किसी भी विस्थापन से पहले सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रभावित लोगों को वैकल्पिक आवास, मुआवजा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि केवल अस्थायी और खराब गुणवत्ता वाले राहत शिविर मानवाधिकार मानकों को पूरा नहीं करते।
यूएन विशेषज्ञों ने नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2024 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि नदी किनारे की बस्तियों को हटाने से पहले भूमिहीन परिवारों के लिए आवास सुनिश्चित किया जाना चाहिए। नेपाल का संविधान भी भूमिहीन दलितों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य पर डालता है।
संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने नेपाल सरकार से तत्काल बेदखली रोकने, प्रभावित समुदायों के साथ सार्थक संवाद शुरू करने और स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। साथ ही प्रभावित परिवारों को मनोसामाजिक सहायता और पर्याप्त मुआवजा देने पर भी जोर दिया गया है।
यूएन विशेषज्ञों ने कहा, “मानव गरिमा, कानून का शासन और सामाजिक न्याय हर सरकारी कार्रवाई का आधार होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को राज्य की कार्रवाई के कारण बेघर नहीं होना चाहिए।”




