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बंगाल की जूट इंडस्ट्री पर संकट गहराया, अब ‘रेस्क्यू’ होगा या री-स्ट्रक्चरिंग’?

व्यापार/अर्थव्यवस्था | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 8 मई 2026

पश्चिम बंगाल की पहचान मानी जाने वाली जूट इंडस्ट्री एक बार फिर गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। नई राजनीतिक परिस्थितियों और “डबल इंजन सरकार” की चर्चा के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि क्या सरकार इस उद्योग को राहत देकर बचाने की कोशिश करेगी या फिर पूरे सेक्टर में बड़े स्तर पर री-स्ट्रक्चरिंग और बदलाव का रास्ता अपनाया जाएगा। हुगली और आसपास के इलाकों की जूट मिलें कभी बंगाल की आर्थिक रीढ़ मानी जाती थीं। लाखों मजदूर, किसान और छोटे व्यापारी इस उद्योग से जुड़े रहे हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में लगातार बंद होती मिलें, मजदूरों की छंटनी, पुरानी मशीनें, उत्पादन लागत में बढ़ोतरी और प्लास्टिक व सिंथेटिक उत्पादों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने जूट उद्योग को कमजोर कर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ सरकारी सहायता या सब्सिडी से अब यह उद्योग लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा। जूट सेक्टर को नई तकनीक, आधुनिक मशीनरी और ग्लोबल मार्केट के हिसाब से बदलना होगा। पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग और इको-फ्रेंडली उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच जूट के लिए बड़े अवसर जरूर हैं, लेकिन इसके लिए निवेश और नीति सुधार बेहद जरूरी बताए जा रहे हैं।

हाल ही में केंद्र सरकार ने कच्चे जूट के स्टॉक लिमिट को लेकर भी अहम फैसला लिया है ताकि बाजार में जमाखोरी रोकी जा सके और कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि अगर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बंगाल की कई और जूट मिलों पर ताले लग सकते हैं।

राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि जूट बेल्ट लंबे समय से बंगाल की राजनीति का प्रभावशाली क्षेत्र रही है। ऐसे में अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि नई व्यवस्था जूट उद्योग को सिर्फ राहत देगी या इसे पूरी तरह नए मॉडल में ढालने की कोशिश करेगी।

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