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ईरानी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों को चीन ने दिखाया ठेंगा, कंपनियों से कहा- US प्रतिबंधों को करो नजरअंदाज

अंतरराष्ट्रीय/व्यापार | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 8 मई 2026

अमेरिका और चीन के बीच तनाव अब खुलकर वैश्विक ऊर्जा राजनीति में दिखाई देने लगा है। चीन ने अपनी कंपनियों को साफ निर्देश दिया है कि वे ईरानी तेल पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करें। बीजिंग के इस कदम को वॉशिंगटन के लिए सीधी चुनौती माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में इसे ऐसे देखा जा रहा है मानो चीन ने अमेरिकी दबाव को साफ शब्दों में “ठेंगा” दिखा दिया हो। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने 2021 के “ब्लॉकिंग स्टैच्यूट” का हवाला देते हुए कहा है कि चीनी कंपनियां उन विदेशी प्रतिबंधों को नहीं मानेंगी जिन्हें चीन अवैध मानता है। यह आदेश खासतौर पर उन चीनी रिफाइनरियों पर लागू बताया जा रहा है जिन पर अमेरिका ने ईरान से तेल खरीदने के आरोप लगाए हैं।

अमेरिका लंबे समय से ईरान की तेल आय को रोककर तेहरान पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने आरोप लगाया कि चीन बड़े पैमाने पर ईरानी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से ईरान की सैन्य गतिविधियों को आर्थिक ताकत दे रहा है। उनका दावा है कि चीन ईरान के लगभग 90 प्रतिशत तेल का खरीदार बन चुका है।

लेकिन चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के खिलाफ बताते हुए साफ कहा है कि संप्रभु देशों के बीच सामान्य व्यापार में अमेरिका को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। बीजिंग ने यह भी संकेत दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के मामले में अमेरिकी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव केवल तेल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी जुड़ी हुई है। ईरान, चीन और रूस के बीच मजबूत होते रिश्तों ने पहले ही अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में चीन का यह कदम वैश्विक राजनीति और पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन पर बड़ा असर डाल सकता है।

इधर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी इस सप्ताह बीजिंग पहुंचे, जहां उन्होंने चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ कई अहम मुद्दों पर चर्चा की। माना जा रहा है कि ऊर्जा सहयोग, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को लेकर दोनों देशों के बीच नई योजनाओं पर बातचीत हुई है।

विश्लेषकों के मुताबिक अगर अमेरिका और चीन के बीच यह टकराव और तेज होता है, तो इसका असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।

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