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नेपाल में पीएम बनने के 30 दिन: बड़े फैसलों से हलचल, बालेन शाह के कदमों ने बदली सियासत और सिस्टम

अंतरराष्ट्रीय | शमी अहमद / लवेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 28 अप्रैल 2026

बालेन शाह के प्रधानमंत्री पद संभालने के महज 30 दिनों के भीतर नेपाल की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे में तेज़ बदलाव देखने को मिले हैं। 27 मार्च 2026 को शपथ लेने के बाद बालेन शाह ने एक के बाद एक ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने न केवल सरकारी कामकाज की शैली बदली, बल्कि देश के भीतर व्यापक बहस भी छेड़ दी। युवा नेतृत्व के तौर पर उभरे शाह ने शुरुआत से ही सख्त प्रशासनिक संकेत देते हुए कई परंपरागत व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप किया। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद उनका सबसे बड़ा और चर्चित कदम पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी रहा, जिसने नेपाल की राजनीति में भूचाल ला दिया। इसके साथ ही सरकारी दफ्तरों से नेताओं की तस्वीरें हटाने का निर्देश दिया गया, जिसे प्रशासनिक निष्पक्षता की दिशा में बड़ा कदम बताया गया। इसी क्रम में छात्र राजनीति पर रोक लगाने का फैसला भी लिया गया, जिससे विश्वविद्यालयों और युवा संगठनों में नई बहस शुरू हो गई।

बालेन शाह सरकार का एक और महत्वपूर्ण फैसला प्रशासनिक सुधार से जुड़ा रहा, जिसमें सरकारी कर्मचारियों को हर 15 दिन में वेतन देने की व्यवस्था लागू की गई। सरकार का तर्क है कि इससे कर्मचारियों की आर्थिक योजना बेहतर होगी और भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा। इसके साथ ही अफसरों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का निर्णय भी लागू किया गया, जिसका उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना बताया गया है।

हालांकि, इन फैसलों के समानांतर कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। पिछले एक महीने में सरकार के दो मंत्रियों का इस्तीफा हो चुका है, जिससे यह संकेत मिला है कि भीतरखाने सब कुछ सहज नहीं है। वहीं सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी नई नीतियों से प्रभावित हुए हैं। भारत-नेपाल सीमा पर ‘भंसार टैक्स’ लागू होने के बाद व्यापार और आवागमन पर असर पड़ा है, जिसके विरोध में कई जगहों पर स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन भी हुए हैं।

युवा और छात्रों के बीच लोकप्रिय रहे बालेन शाह के प्रति शुरुआती समर्थन अब सवालों के दौर में बदलता दिख रहा है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उनके फैसलों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे तेज़ बदलाव की दिशा में उठाया गया साहसिक कदम मान रहे हैं, तो कुछ इसे जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय बता रहे हैं, जिसके दीर्घकालिक प्रभावों पर अभी स्पष्टता नहीं है।

नेपाल की राजनीति में यह दौर परिवर्तन और प्रयोग का माना जा रहा है, जहां एक युवा नेतृत्व पारंपरिक व्यवस्था को चुनौती देता दिख रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि बालेन शाह के ये फैसले जमीनी स्तर पर कितने सफल होते हैं और क्या वे देश की आर्थिक व प्रशासनिक व्यवस्था को स्थायी रूप से मजबूत कर पाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि नेपाल की सियासत में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है, जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

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