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‘डिजिटल नेपाल’ के सपने पर सवाल: सरकारी कामकाज में Gmail-WhatsApp निर्भरता से डेटा सुरक्षा पर बढ़ी चिंता

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अंतरराष्ट्रीय | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 28 अप्रैल 2026

नेपाल में ‘डिजिटल नेपाल’ का सपना अब नई चुनौतियों के घेरे में आ गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व में डिजिटल बदलाव की दिशा में कदम तो तेज हुए हैं, लेकिन सरकारी कामकाज में Gmail और WhatsApp जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती निर्भरता ने डेटा सुरक्षा, निजता और राष्ट्रीय संप्रभुता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उच्च स्तर पर ही डिजिटल अनुशासन की कमी दिखे, तो यह पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए जोखिम बन सकता है।

दरअसल, प्रधानमंत्री बनने से पहले ही बालेन शाह ने सार्वजनिक तौर पर एक Gmail आईडी साझा की थी, जो अब भी उनके आधिकारिक संचार का हिस्सा बताई जाती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने विभिन्न प्रांतों के जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद के लिए WhatsApp ग्रुप बनाने के निर्देश दिए। इस तरह के कदमों से संवेदनशील सरकारी सूचनाओं के विदेशी सर्वरों पर जाने का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि Gmail Google के सर्वर और WhatsApp Meta के इकोसिस्टम पर निर्भर हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी और कूटनीतिक संवाद में इस तरह के प्लेटफॉर्म्स का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील हो सकता है। नेपाल के कई मंत्रालयों और विभागों में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। स्वास्थ्य, शहरी विकास और जल आपूर्ति मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर न्यायपालिका और विदेशी दूतावासों तक—कई अधिकारी आधिकारिक काम के लिए Gmail या Yahoo जैसे निजी ईमेल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर रहे हैं। इससे सरकारी डेटा बाहरी कंपनियों के सर्वरों पर संग्रहित हो जाता है, जिस पर देश का सीधा नियंत्रण नहीं रहता।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस प्रवृत्ति को खतरनाक बताया है। उनका कहना है कि आज के दौर में डेटा ही शक्ति है और जिस देश के पास अपने डेटा पर नियंत्रण नहीं होता, उसकी डिजिटल संप्रभुता भी कमजोर हो जाती है। 2021 में सामने आए Pegasus जासूसी कांड का उदाहरण देते हुए विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बनाना आज के समय में मुश्किल नहीं रह गया है।

नेपाल में समस्या सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि कानूनी ढांचे की भी है। देश में अभी तक कोई व्यापक डेटा संरक्षण कानून लागू नहीं है। हालांकि कुछ अलग-अलग कानूनों और नीतियों में डेटा सुरक्षा से जुड़े प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं माने जा रहे। 2023 में साइबर सुरक्षा नीति और 2025 में पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन पॉलिसी लाई गई, लेकिन इन्हें लागू करने के लिए ठोस कानून अभी तक नहीं बन पाया है।

इसी बीच सरकार ‘डिजिटल नेपाल ट्रांसफॉर्मेशन’ प्रोजेक्ट के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भारी कर्ज लेने की तैयारी कर रही है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब बुनियादी डेटा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं है, तो इस डिजिटल बदलाव की नींव कितनी सुरक्षित होगी। विशेषज्ञों का सुझाव है कि नेपाल को अपने सरकारी ईमेल सिस्टम को ‘.gov.np’ डोमेन पर पूरी तरह शिफ्ट करना चाहिए और देश के भीतर ही डेटा सर्वर स्थापित करने चाहिए।

इसके साथ ही डिजिटल साक्षरता भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। आम नागरिकों से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक में साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता की कमी है। नेपाल पुलिस के साइबर ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में डेटा चोरी, हैकिंग और ईमेल दुरुपयोग के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जो इस खतरे की गंभीरता को दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘डिजिटल नेपाल’ का सपना तभी सफल हो सकता है, जब तकनीक के साथ-साथ सुरक्षा, कानून और जागरूकता पर भी बराबर ध्यान दिया जाए। फिलहाल स्थिति यह संकेत देती है कि डिजिटल विस्तार की रफ्तार तेज है, लेकिन सुरक्षा का ढांचा अभी उस गति से मजबूत नहीं हो पाया है। यही असंतुलन आने वाले समय में नेपाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

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