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1 अप्रैल से शुरू होगी देश की सबसे बड़ी जनगणना प्रक्रिया, दूसरे चरण में होगी जातियों की गिनती

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राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 मार्च 2026

पहले चरण में घर-घर सर्वे, 2027 में जनसंख्या के साथ जातिगत आंकड़ों का व्यापक संग्रह

लंबे इंतजार के बाद देश में जनगणना की प्रक्रिया आखिरकार शुरू होने जा रही है। केंद्र सरकार ने ऐलान किया है कि जनगणना का पहला चरण 1 अप्रैल 2026 से शुरू होगा। इस चरण में देशभर में घर-घर जाकर मकानों की स्थिति, उपलब्ध सुविधाएं और परिवारों से जुड़ी बुनियादी जानकारी जुटाई जाएगी। यह प्रक्रिया “हाउस लिस्टिंग” के रूप में जानी जाती है और इसे सितंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस चरण में अधिकारियों द्वारा यह दर्ज किया जाएगा कि घर पक्का है या कच्चा, बिजली-पानी की व्यवस्था कैसी है, शौचालय, इंटरनेट, वाहन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं। सरकार का मानना है कि इस डेटा से देश की बुनियादी जरूरतों और विकास की स्थिति का सही आकलन किया जा सकेगा।

इसके बाद जनगणना का दूसरा और सबसे अहम चरण वर्ष 2027 में शुरू होगा। इस चरण में देश की पूरी आबादी से जुड़ी विस्तृत जानकारी इकट्ठा की जाएगी। इसमें उम्र, शिक्षा, रोजगार, भाषा, धर्म और अन्य सामाजिक-आर्थिक पहलुओं के साथ-साथ जातिगत जानकारी भी दर्ज की जाएगी।

इस बार की जनगणना की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसमें सभी जातियों की गिनती की जाएगी। अब तक केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आंकड़े ही आधिकारिक तौर पर दर्ज होते थे, लेकिन इस बार अन्य सभी वर्गों को भी शामिल किया जाएगा। लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद सरकार ने यह बड़ा फैसला लिया है।

जनगणना 2027 को डिजिटल बनाने की भी तैयारी की गई है। अधिकारियों को मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करने की सुविधा दी जाएगी और आम नागरिकों को भी खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने का विकल्प मिलेगा। इससे प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और अधिक सटीक बनाने की कोशिश की जा रही है।

करीब 35 लाख से ज्यादा कर्मचारी और अधिकारी इस विशाल अभियान में शामिल होंगे, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी प्रशासनिक कवायद बनाता है। सरकार का कहना है कि इस जनगणना से मिलने वाला डेटा आने वाले वर्षों में नीतियां बनाने, योजनाओं को लागू करने और संसाधनों के बेहतर उपयोग में बेहद अहम साबित होगा।

हालांकि, जातिगत गणना को लेकर देश में बहस भी तेज हो गई है। कुछ लोग इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, तो कुछ को डर है कि इससे समाज में विभाजन की राजनीति को बढ़ावा मिल सकता है। इसके बावजूद सरकार का जोर है कि सटीक और व्यापक डेटा के बिना समावेशी विकास संभव नहीं है।

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