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नवीन पटनायक : निशिकांत दुबे को मेंटल डॉक्टर की जरूरत है

राष्ट्रीय | नई दिल्ली/भुवनेश्वर | 30 मार्च 2026

बीजू पटनायक पर CIA लिंक वाले बयान से ओडिशा में सियासी भूचाल, BJD ने कहा- इतिहास का अपमान

ओडिशा की राजनीति में अचानक बड़ा तूफान खड़ा हो गया है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के एक विवादित बयान ने सियासी माहौल गरमा दिया है। दुबे ने पूर्व मुख्यमंत्री और स्वतंत्रता सेनानी बीजू पटनायक को 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA, अमेरिकी सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच “कड़ी” बताया। बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए बीजेडी प्रमुख और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए कहा, “ऐसे बयान देने वाले को मेंटल डॉक्टर की जरूरत है।”

निशिकांत दुबे ने दावा किया था कि 1962 के युद्ध के दौरान नेहरू सरकार ने अमेरिकी मदद और CIA के सहयोग से रणनीति बनाई, और उस समय बीजू पटनायक अमेरिका, CIA और भारत सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने ओडिशा के चारबटिया एयरबेस पर अमेरिकी U-2 जासूसी विमानों के संचालन का भी जिक्र किया।

दुबे के इस बयान के सामने आते ही ओडिशा में राजनीतिक घमासान शुरू हो गया। बीजू जनता दल (BJD) ने इसे अपने संस्थापक नेता का अपमान बताते हुए “पूरी तरह बेबुनियाद और इतिहास के साथ खिलवाड़” करार दिया।

नवीन पटनायक ने मीडिया से बातचीत में तीखा पलटवार करते हुए कहा, “मुझे उस समय की परिस्थितियां अच्छी तरह याद हैं। मैं तब करीब 13 साल का था। बीजू बाबू चीन के हमले को लेकर बेहद आक्रोशित थे और उन्होंने देश की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाया। नेहरू ने उनके साथ मिलकर रणनीति बनाई थी। दुबे को इन तथ्यों की जानकारी नहीं है।”

विवाद यहीं नहीं थमा। बीजेडी नेताओं ने निशिकांत दुबे से सार्वजनिक माफी की मांग की। विरोध स्वरूप पार्टी के राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा ने दुबे की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति (संचार और सूचना प्रौद्योगिकी) से इस्तीफा दे दिया।

दूसरी ओर, निशिकांत दुबे ने सफाई देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य बीजू पटनायक का अपमान करना नहीं था। उन्होंने बीजू पटनायक को “महान स्वतंत्रता सेनानी” बताते हुए कहा कि उनका बयान दरअसल नेहरू-गांधी परिवार की नीतियों और अमेरिका से संबंधों पर था, न कि बीजू बाबू की छवि को लेकर।

यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। एक तरफ बीजेडी अपने संस्थापक नेता की विरासत की रक्षा में पूरी ताकत से उतर आई है, वहीं बीजेपी अपने सांसद के बयान को ऐतिहासिक संदर्भ बताकर बचाव कर रही है।ओडिशा की सियासत में सवाल उठ रहा है—क्या यह इतिहास की नई व्याख्या है या चुनावी मौसम में छिड़ी सियासी जंग?

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