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क्या PNB–OBC–UBI मेगा मर्जर सच में सफल रहा या ग्राहकों के लिए नई परेशानियां लेकर आया?

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 26 फरवरी 2026

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में 2020 का Punjab National Bank, Oriental Bank of Commerce और United Bank of India का विलय एक बड़ा और साहसिक प्रयोग माना गया। सरकार का उद्देश्य साफ था—छोटे और वित्तीय दबाव झेल रहे बैंकों को मिलाकर एक ऐसा बैंक तैयार करना जो पूंजी, नेटवर्क और कर्ज देने की क्षमता के मामले में मजबूत हो और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके। मेरी नजर में यह मर्जर बुनियादी तौर पर सकारात्मक कदम था, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता केवल आकार और आंकड़ों से नहीं बल्कि ग्राहक अनुभव और संचालन की स्थिरता से तय होगी।

क्या बड़े आकार ने बैंक को ज्यादा मजबूत बनाया?

मर्जर के बाद PNB का कुल कारोबार लगभग 18 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंचना और शाखाओं का नेटवर्क 11 हजार से अधिक होना इस बात का संकेत है कि बैंक की बाजार मौजूदगी काफी मजबूत हुई। OBC और UBI की क्षेत्रीय पकड़ ने PNB को उत्तर और पूर्वी भारत में अतिरिक्त मजबूती दी। बड़े बैंक का फायदा यह होता है कि वह बड़े प्रोजेक्ट्स को फंड कर सकता है, जोखिम को बेहतर तरीके से संभाल सकता है और आर्थिक झटकों के समय ज्यादा स्थिर रहता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह मर्जर बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत करने और आर्थिक विकास को गति देने की दिशा में अहम साबित हुआ।

क्या वित्तीय प्रदर्शन में सुधार मर्जर की सफलता साबित करता है?

पोस्ट-मर्जर वित्तीय संकेतकों में सुधार यह दिखाता है कि बैंक धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ा। लाभप्रदता में सुधार, नेट NPA में गिरावट और पूंजी उपयोग की दक्षता बढ़ना इस बात के संकेत हैं कि संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हुआ। हालांकि शुरुआती दौर में OBC और UBI के उच्च NPA का दबाव दिखा, लेकिन समय के साथ इसमें कमी आई। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि मर्जर ने बैंक को दीर्घकाल में लाभ पहुंचाया, भले ही शुरुआत चुनौतीपूर्ण रही हो।

क्या ट्रांजिशन की समस्याओं ने ग्राहकों का भरोसा कमजोर किया?

किसी भी बड़े मर्जर की असली परीक्षा उसका इंटीग्रेशन होता है, और यहीं सबसे ज्यादा दिक्कतें सामने आईं। अलग-अलग IT सिस्टम, शाखा संरचना और कार्य संस्कृति को एक मंच पर लाने में समय लगा। कई जगह तकनीकी समस्याएं, सेवा में देरी और शाखा बदलाव के कारण ग्राहकों को असुविधा का सामना करना पड़ा। कर्मचारियों के लिए भी नई जिम्मेदारियां और स्थानांतरण मानसिक दबाव का कारण बने। यही वह पहलू है जिसने मर्जर के सकारात्मक प्रभाव के बावजूद ग्राहकों के बीच असंतोष की भावना पैदा की।

क्या शाखाओं का एकीकरण दक्षता था या पहुंच में कमी?

लागत कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए शाखाओं के एकीकरण को बैंक के नजरिए से सही ठहराया जा सकता है, लेकिन इसका स्थानीय प्रभाव अलग रहा। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं की दूरी बढ़ने से ग्राहकों को अतिरिक्त परेशानी हुई। जमा और कर्ज वृद्धि में शुरुआती गिरावट भी यही संकेत देती है कि ग्राहकों का भरोसा पूरी तरह स्थिर होने में समय लगा। यह सवाल उठता है कि क्या दक्षता बढ़ाने की प्रक्रिया में क्षेत्रीय पहुंच से समझौता हो गया।

क्या ग्राहकों को सुविधा ज्यादा मिली या असहजता बढ़ी?

ग्राहकों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही। डिजिटल बैंकिंग, बड़ा एटीएम नेटवर्क और अधिक उत्पाद विकल्प कुछ ग्राहकों के लिए फायदेमंद साबित हुए, जबकि पुराने ग्राहकों के लिए प्रक्रियाओं में बदलाव और सेवा संबंधी समस्याएं चिंता का कारण बनीं। यह साफ दिखता है कि बैंक का आकार बढ़ना अपने आप में ग्राहक संतुष्टि की गारंटी नहीं देता; सेवा की गुणवत्ता और भरोसा ही असली पैमाना होता है।

क्या आगे के कदम मर्जर की वास्तविक सफलता तय करेंगे?

PNB के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने बढ़े हुए आकार को बेहतर सेवा और भरोसे में बदलने की है। IT सिस्टम को और मजबूत करना, डिजिटल सेवाओं को सरल बनाना, ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग पहुंच बनाए रखना और कर्मचारियों को नई परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षित करना जरूरी होगा। साथ ही NPA नियंत्रण और जोखिम प्रबंधन पर लगातार ध्यान देना बैंक की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करेगा।

साहसिक कदम, लेकिन सफलता का असली पैमाना ग्राहक भरोसा

PNB–OBC–UBI मर्जर एक आवश्यक और दूरदर्शी कदम था जिसने भारतीय बैंकिंग को संरचनात्मक मजबूती दी। फायदे स्पष्ट हैं, लेकिन ग्राहकों की सुविधा और भरोसे में कमी की शिकायतें यह संकेत देती हैं कि यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। अंततः यह मर्जर तभी पूरी तरह सफल माना जाएगा जब बैंक अपने बड़े आकार को बेहतर सेवा, तेज फैसलों और मजबूत ग्राहक विश्वास में बदल सके।

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