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बजट शिफ्ट : खेतों से कारखानों की ओर

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प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | 1 फरवरी 2026

नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट 2026–27 भाषण लंबा था—करीब 86 मिनट का—और शब्दों में संतुलन, सुधार और भविष्य की तैयारी का भरोसा था। लेकिन जैसे ही भाषण खत्म हुआ, बाजार ने बिना देर किए अपनी राय सुना दी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लुढ़क गए। डेरिवेटिव्स पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाने का फैसला—फ्यूचर्स पर 0.05 प्रतिशत और ऑप्शंस पर 0.15 प्रतिशत—सरकार के लिए सट्टेबाजी पर लगाम का कदम हो सकता है, मगर निवेशकों के लिए यह एक झटका साबित हुआ। संदेश साफ था: नीति का इरादा कुछ भी हो, बाजार का भरोसा डगमगाया है।

चिंता सिर्फ STT तक सीमित नहीं रही। करीब 17 लाख करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे और लगभग 11 लाख करोड़ रुपये के बाजार उधार का संकेत यह बताता है कि सरकार को आने वाले समय में भारी कर्ज लेना पड़ेगा। इसका सीधा असर कॉरपोरेट सेक्टर पर पड़ेगा, जहां कर्ज महंगा होने की आशंका है। पूंजीगत खर्च बढ़ने के बावजूद बजट में ऐसा कोई ठोस संकेत नहीं दिखा, जो निजी निवेश को तुरंत उत्साहित कर सके। यही वजह है कि दुर्लभ सप्ताहांत ट्रेडिंग सत्र में भी बाजार सुस्त और निराश दिखा।

अगर बजट को गहराई से पढ़ा जाए, तो यह एक सतर्क और रक्षात्मक दस्तावेज़ लगता है। इसका झुकाव साफ तौर पर शहरी भारत और मैन्युफैक्चरिंग की ओर है। वैश्विक माहौल भी अनुकूल नहीं है—भूराजनीतिक तनाव, व्यापार युद्ध की आशंकाएं, अमेरिका में राजनीतिक बदलाव की संभावनाएं और तकनीक की तेज रफ्तार। ऐसे समय में बजट ने प्रोत्साहन से ज्यादा स्थिरता को प्राथमिकता दी है। मैन्युफैक्चरिंग को यूरोपीय संघ के साथ संभावित मुक्त व्यापार समझौते के अनुरूप ढालने की कोशिश दिखती है, लेकिन घरेलू मांग को दोबारा जिंदा करने की ठोस रणनीति कमजोर नजर आती है।

बजट के पन्नों में कुछ क्षेत्रों पर खास मेहरबानी दिखती है—पूर्वोत्तर का बौद्ध सर्किट, मत्स्य पालन, नारियल और चंदन जैसे उत्पाद, खासकर केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के संदर्भ में। यह संकेत देता है कि चुनावी भूगोल को नजरअंदाज नहीं किया गया। अपने रिकॉर्ड नौवें बजट में वित्त मंत्री ने अखरोट से लेकर सेमीकंडक्टर तक सबका उल्लेख किया, जिससे यह साफ हुआ कि सरकार दिशा तय करना चाहती है और रणनीतिक नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहती है।

करने वाले से दिशा देने वाला राज्य

इस बजट की सबसे बड़ी खासियत सरकार की बदली हुई भूमिका है। अब सरकार खुद “करने वाला” नहीं, बल्कि “दिशा देने वाला” बनना चाहती है। वह प्राथमिकताएं तय करेगी, सार्वजनिक पूंजी लगाएगी और संकेत देगी, लेकिन असली जिम्मेदारी निजी क्षेत्र पर छोड़ने की सोच है। सार्वजनिक खर्च अब भी मजबूत है, मगर वह अकेला इंजन नहीं रहना चाहता। यह एक नया, मिश्रित मॉडल है—जहां सरकार मार्गदर्शक है, मालिक नहीं।

आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कंपनियां नहीं, बल्कि देश आपस में पूंजी, तकनीक और सप्लाई चेन के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। भारत भी उसी सच्चाई के अनुसार खुद को ढाल रहा है। हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को उसी नजर से देखा जा रहा है, जैसे आज़ादी के बाद के दौर में स्टील और भारी उद्योगों को देखा गया था—ऐसे आधार क्षेत्र, जिनके आसपास पूरा औद्योगिक इकोसिस्टम खड़ा हो सके। सोच बड़ी है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।

गांव और खेती की फीकी आवाज

इस बजट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात खेती और ग्रामीण भारत पर अपेक्षाकृत कम जोर है। बजट भाषण में किसानों की आय का जिक्र 43 मिनट बाद आता है, वह भी 500 जलाशयों को भरने और मत्स्य पालन के एक सीमित प्रस्ताव के साथ। कभी हर बजट की धुरी रहे गांव और किसान इस बार हाशिये पर नजर आए। फोकस ज्यादा है अर्ध-शहरी इलाकों के औद्योगिकीकरण, लॉजिस्टिक्स सुधार और खेती को बीज, जड़ी-बूटी, मत्स्य और फूड प्रोसेसिंग जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने पर।

शहर, फैक्ट्री और टेक पार्क इस बजट की कहानी के मुख्य पात्र हैं। इसमें आर्थिक तर्क है—शहरीकरण उत्पादकता बढ़ाता है, मैन्युफैक्चरिंग बड़े पैमाने पर रोजगार देती है और सेवाएं विदेशी पूंजी खींचती हैं। कोई भी देश इस बदलाव के बिना मध्यम आय की श्रेणी तक नहीं पहुंचा है। लेकिन यह दृष्टिकोण थोड़ा एकतरफा भी है। यूरोप के साथ व्यापार बढ़ने की उम्मीद पर उद्योगों को फिर से ढालना उम्मीदों पर टिका कदम है, जबकि घरेलू मांग अभी भी कमजोर बनी हुई है।

घटती बचत, बढ़ता कर्ज

हाल के वर्षों में टैक्स संग्रह में मजबूती आई है—खासकर जीएसटी और आयकर से। लेकिन असली सवाल आम आदमी की आर्थिक सेहत का है। घरेलू वित्तीय बचत जीडीपी के करीब 5 प्रतिशत तक गिर गई है, जो कई दशकों में सबसे निचला स्तर है, जबकि घरेलू कर्ज लगातार बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि खपत अब बढ़ती आय से नहीं, बल्कि उधार और बचत खत्म करके हो रही है। यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।

आज भी भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। गांवों की खपत ही दोपहिया वाहनों से लेकर एफएमसीजी तक की मांग को संभालती है। अगर ग्रामीण मजबूती कमजोर पड़ी, तो असमानता बढ़ेगी और विकास की रफ्तार धीमी होगी। यह राजनीतिक जोखिम भी है और आर्थिक खतरा भी।

संतुलन की कठिन परीक्षा

कुल मिलाकर बजट 2026–27 एक संतुलन साधने की कोशिश है—वित्तीय अनुशासन भी, सरकारी दखल भी; बाजार समर्थक सोच भी और राज्य की दिशा तय करने वाली भूमिका भी; शहरी फोकस भी और समावेशन की बात भी। यह न पूरी तरह मुक्त बाजार का मॉडल है, न ही पुराना सरकारी नियंत्रण वाला ढांचा। शायद यही भारत के अगले आर्थिक चरण की पहचान बने।

लेकिन सवाल सीधा है—क्या सिर्फ सरकारी खर्च के सहारे 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना पूरा होगा? टिकाऊ विकास तब आता है जब घरों की बचत बढ़े, कंपनियां निवेश करें, निर्यात मजबूत हो और रोजगार पैदा हों। जब तक निजी क्षेत्र का भरोसा असली इंजन नहीं बनेगा, तब तक हर बजट ऊपर से स्थिर और भीतर से दबाव में दिखाई देगा।

संकेत साफ है—भारत की आर्थिक धुरी अब खेतों से कारखानों की ओर खिसक रही है। असली परीक्षा यही है कि क्या यह बदलाव सबको साथ लेकर हो पाएगा, या फिर विकास की इस दौड़ में बहुत से लोग पीछे छूट जाएंगे।

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