अनिल यादव। लखनऊ 6 दिसंबर 2025
उत्तर प्रदेश में गंगा नदी की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। जनसत्ता की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के कई हिस्सों में गंगा का पानी अब नहाने लायक भी नहीं बचा, जो न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चिंताजनक है, बल्कि सीधे-सीधे सरकारी दावों की पोल खोलता है। नमामि गंगे जैसी मेगा योजना पर वर्षों से हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बावजूद गंगा आज भी प्रदूषण, सीवेज और केमिकल कचरे के बोझ से दब रही है। विभिन्न घाटों पर किए गए जल परीक्षण बताते हैं कि पानी में घुलनशील ऑक्सीजन बेहद कम है, बैक्टीरिया की मात्रा खतरनाक स्तर पर है और प्रदूषक तत्व लगातार बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में धार्मिक आस्था, रोग-सुरक्षा और पर्यावरण—तीनों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
गंगा की यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नीति और शासन की असफलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण बन चुकी है। नमामि गंगे योजना को मोदी सरकार ने अपने सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के रूप में प्रचारित किया था। बड़े मंचों से यह घोषणा बार-बार की गई कि “गंगा पहले से अधिक स्वच्छ और निर्मल हुई है।” लेकिन जमीनी वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। यूपी के कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, बुलंदशहर, बक्सर आदि क्षेत्रों में गंगा का पानी आज भी इतना प्रदूषित है कि स्नान करना स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो बंद पड़े हैं, या कम क्षमता पर चल रहे हैं, या फिर उनमें तकनीकी और प्रशासनिक अव्यवस्था है। नतीजा यह कि बिना साफ़ किया हुआ गंदा पानी सीधे गंगा में जा रहा है।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि गंगा की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ की खपत के बावजूद “राम तेरी गंगा मैली” वाली स्थिति जस की तस बनी हुई है। यह पंक्ति आज एक कड़वी सच्चाई बन गई है। इतनी भारी लागत के बाद भी नदी की स्थिति में व्यापक सुधार नहीं हुआ—न पानी नहाने योग्य हुआ, न प्रदूषण कम हुआ, न जलीय जीवन सुरक्षित हुआ। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई घाटों पर पानी का रंग गाढ़ा हो गया है, दुर्गंध आती है और स्नान करने पर त्वचा संबंधी रोग बढ़ रहे हैं। यह सब संकेत देता है कि केवल बजट बढ़ाने और बड़े-बड़े दावे करने से गंगा साफ नहीं होगी।
सरकारी रिपोर्टें और वास्तविक स्थिति के बीच का यह अंतर बेहद चौंकाने वाला है। जहाँ कागज़ों पर सब कुछ “सफल” बताया जाता है, वहीं वास्तविकता में गंगा लगातार बीमार होती जा रही है। गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनदायिनी धारा, सांस्कृतिक धरोहर और आस्था का आधार है। जब उसका पानी नहाने योग्य भी न रहे, तो यह बात सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहती—यह प्रशासन की प्राथमिकताओं, उसकी नीतियों और उसकी कार्यक्षमता पर बड़ा सवाल बन जाती है।
आज जरूरी है कि सरकार प्रचार से आगे बढ़कर असल समस्याओं पर काम करे—अवैध सीवेज डिस्चार्ज बंद हो, इंडस्ट्रियल वेस्ट पर सख्त निगरानी हो, सीवेज प्लांट पूरी क्षमता पर चलें, और स्थानीय समुदायों को सफाई अभियान का हिस्सा बनाया जाए। वरना गंगा की पवित्रता, उसका प्राकृतिक संतुलन और करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य गंभीर खतरे में बना रहेगा।
उत्तर प्रदेश में गंगा का यह हाल एक स्पष्ट चेतावनी है—यदि अभी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियों को शायद वह गंगा न मिले जिसे हमने किताबों और परंपराओं में पवित्र, निर्मल और जीवनदायिनी के रूप में पढ़ा है।




