सुमन कुमार । नई दिल्ली
आठ महीने की गर्भवती सुनाली खातून आखिरकार अपने छोटे बेटे के साथ बांग्लादेश से भारत लौट आईं। लंबे संघर्ष, कानूनी लड़ाई और गहरी मानसिक पीड़ा से गुजरने के बाद यह वापसी संभव हो सकी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह वापसी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और स्पष्ट आदेश के बाद संभव हुई, जिसने सरकार को निर्देश दिया कि सुनाली और उनके बच्चे को सुरक्षित वापस भारत लाया जाए। यह मामला सिर्फ एक मां और पत्नी का संघर्ष नहीं था, बल्कि एक ऐसी कहानी बन गया जिसमें कानूनी जटिलताएँ, अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया, और परिवार बिखरने का दर्द मिलकर एक बड़ी मानवीय त्रासदी में बदल गए थे।
सुनाली खातून की स्थिति बेहद संवेदनशील थी—8 महीने की गर्भवती होने के बावजूद उन्हें दूसरे देश में रहना पड़ा, अपने पति से दूर और अनिश्चित भविष्य के साथ। उनके साथ उनका छोटा बेटा भी था, जिसकी सुरक्षा और देखभाल की पूरी ज़िम्मेदारी अकेले उनके कंधों पर थी। लगातार शरीर की कमजोरी, डॉक्टरों की सीमित पहुंच, आर्थिक संकट और कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता ने सुनाली की परेशानी को और बढ़ाया। कई बार उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उनका केवल एक ही अनुरोध है—उन्हें भारत लौटने दिया जाए और उनके पति को भी भारत लाकर सुरक्षित न्यायिक प्रक्रिया दी जाए।
जब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया और आदेश जारी किया, तब स्थिति बदली। कोर्ट ने कहा कि मानवीय आधार पर सुनाली और बच्चे को तत्काल भारत लाया जाना चाहिए। कोर्ट के हस्तक्षेप ने ही वह रास्ता खोला जिससे भारत सरकार ने बांग्लादेश से समन्वय स्थापित किया और उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की। मंगलवार सुबह सीमा पार करते हुए जब सुनाली अपने बेटे को गोद में लेकर भारत पहुंचीं, तो उनकी आंखों में राहत और चिंता दोनों झलक रही थीं—राहत इसलिए कि वह अपने देश वापस आ गईं, और चिंता इसलिए कि उनके पति आज भी वहीं फंसे हुए हैं।
भारत लौटते ही सुनाली ने भावुक स्वर में कहा, “मैं चाहती हूं कि मेरे पति को भी भारत लाया जाए। हम परिवार हैं, हमें साथ रहना चाहिए।” यह बयान सिर्फ एक पत्नी की पुकार नहीं था, बल्कि उस पीड़ा का प्रतीक था जो परिवारों को तब सहनी पड़ती है जब अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ मानव संबंधों से बड़ी हो जाती हैं। वह बार-बार यही कहती रही कि वह कोई अपराधी नहीं, सिर्फ अपने पति के साथ सुरक्षित जीवन जीने की इच्छा रखने वाली एक सामान्य भारतीय महिला हैं।
स्थानीय प्रशासन ने उनकी वापसी पर उन्हें स्वास्थ्य निरीक्षण और सुरक्षा उपलब्ध कराई है, क्योंकि उनकी गर्भावस्था अंतिम चरण में है और उन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता है। सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार समूहों ने भी उनकी वापसी का स्वागत करते हुए कहा है कि यह मामला एक उदाहरण है कि कैसे न्यायपालिका मानवीय संकटों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यह भी साफ है कि अगर समय रहते सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप न करता, तो सुनाली और उनके बच्चे को गंभीर स्वास्थ्य खतरों तथा असुरक्षित परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता था।
फिलहाल, सुनाली का संघर्ष लौटने के साथ खत्म नहीं हुआ। उनका अगला और सबसे बड़ा आग्रह यही है कि उनके पति को भी कानूनी प्रक्रिया के तहत भारत लाया जाए ताकि परिवार एकजुट रह सके। यह मामला अब सरकार और विदेश मंत्रालय के पाले में है कि वे इस मानवीय अनुरोध पर कितनी तत्परता दिखाते हैं। सुनाली की घर वापसी एक बड़ी राहत जरूर है, लेकिन उनका परिवार अभी पूरा नहीं हुआ—और वह खुद कह रही हैं, “मैं सुरक्षित हूं, मेरा बच्चा सुरक्षित है… बस अब मेरे पति को भी भारत आना चाहिए।”




