Home » National » अरावली पर ‘कॉरपोरेट कृपा’ की राजनीति? सोनिया गांधी के तीखे हमले से घिरा मोदी सरकार का पर्यावरण मॉडल

अरावली पर ‘कॉरपोरेट कृपा’ की राजनीति? सोनिया गांधी के तीखे हमले से घिरा मोदी सरकार का पर्यावरण मॉडल

एबीसी डेस्क 3 दिसंबर 2025

प्रस्तावित नीति पर सोनिया गांधी का सीधा वार—“पर्यावरण सुरक्षा को नीलाम कर रही है सरकार”

अरावली पहाड़ियों को लेकर मोदी सरकार की नीतियों पर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी के तीखे प्रहार ने राष्ट्रीय राजनीति में एक नया तूफ़ान खड़ा कर दिया है। गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में फैली यह प्राचीन पर्वतमाला, जो दिल्ली को धूल-आंधी से बचाने और थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकने के लिए प्राकृतिक रक्षक की तरह खड़ी है, आज नई पर्यावरणीय-राजनीतिक जंग का केंद्र बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 नवंबर को सुनाए गए उस विवादित फैसले के बाद यह बहस और तीव्र हो गई है, जिसमें अरावली को केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों तक सीमित कर दिया गया—एक ऐसा निर्णय, जिसके कारण लगभग 90% क्षेत्र खनन से छूट सकता है और कंपनियों को खुली छूट मिल सकती है। सोनिया गांधी ने इसे “भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय” बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

स्मॉग में घुटता उत्तर भारत और सरकार का ‘कॉरपोरेट-फ्रेंडली’ रुख—कांग्रेस का आरोप

दिल्ली–एनसीआर में दम घोंटने वाली हवा, पंजाब–हरियाणा के भूजल का बढ़ता जहर और अरावली की घटती हरियाली—इन सबको जोड़कर कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि यह सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि “शासन के चरित्र का संकट” है। गांधी ने लिखा कि अवैध खनन और पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई पहले से ही अरावली को बर्बाद कर रही थी, अब सुप्रीम कोर्ट की परिभाषा और सरकार की चुप्पी ने इसे ‘कानूनी छूट’ में बदल दिया है। उनका कहना है कि धूल, धुआं और जहरीले कण दिल्ली की हवा को लगातार और घातक बना रहे हैं, जिससे हर साल हजारों लोगों की मौत होती है—और इसके बावजूद केंद्र सरकार “जनहित की जगह मुनाफे की राजनीति” को प्राथमिकता दे रही है।

पर्यावरण को लेकर सरकार की ‘नीतिगत लापरवाही’—सोनिया गांधी की विस्तृत सूची में कई गंभीर आरोप

सोनिया गांधी ने अपने लेख में सिर्फ अरावली का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि पिछले एक दशक की नीतियों को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) 2020 के ड्राफ्ट से लेकर CRZ नोटिफिकेशन 2018 तक—हर जगह नियमों में ढील देकर, सुनवाई घटाकर और स्थानीय समुदायों की आपत्ति को कमजोर करके सरकार ने कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि वन क्षरण से लेकर खनन अनुमति तक, हर क्षेत्र में “सरकारी लापरवाही और निजी कंपनियों की बढ़ती पकड़” साफ दिखाई देती है। सोनिया गांधी ने चेताया कि जंगलों की कटाई, पहाड़ों की तबाही और नदियों पर बढ़ते दबाव ने देश को अभूतपूर्व पर्यावरण संकट की ओर धकेल दिया है।

राहुल गांधी भी मैदान में—“नीति निर्माण बिकाऊ हो चुका है, केवल कुछ लाभार्थियों के लिए”

राहुल गांधी ने अपनी पोस्ट में मां के लेख के प्रमुख अंश साझा करते हुए मोदी सरकार पर और भी कठोर शब्दों में निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि सत्ता में आने के बाद से सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति “निर्लज्ज उदासीनता और लालच भरी प्रवृत्ति” दिखाई है। राहुल गांधी ने पूछा, “क्या नीतिनिर्माण इतना सस्ता हो गया है कि भविष्य की पीढ़ियों के हितों को बेचकर कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाया जाए?” उनका यह बयान इस राजनीतिक बहस को और उग्र बना रहा है, खासकर तब जब देश के कई हिस्सों में पर्यावरणीय आपदाएं लगातार गहराती जा रही हैं।

सोनिया गांधी की मांग—“भारत को पर्यावरण के लिए नई डील चाहिए, जनता की भागीदारी के साथ”

अपने विस्तृत संपादकीय में सोनिया गांधी ने कहा कि भारत को अब ‘नई पर्यावरण डील’ की आवश्यकता है—एक ऐसी नीति जो जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की सुरक्षा और खनन नियंत्रण जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर बनाई जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि हिमालय से लेकर विन्ध्याचल और अरावली तक, देश की पर्वतमालाएँ गंभीर खतरे में हैं और यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। सोनिया गांधी ने यह भी स्पष्ट किया कि पर्यावरण कानूनों में संशोधन उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि आम जनता, किसानों, आदिवासियों और स्थानीय समुदायों के हितों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

अंतिम प्रश्न—क्या अरावली सिर्फ खनन का मुद्दा है या भारत के पर्यावरण भविष्य की असली परीक्षा?

कांग्रेस के हमलों और संपादकीय लेख ने इस बहस को महज राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़ाकर एक बड़े राष्ट्रीय प्रश्न में बदल दिया है—क्या भारत विकास और पर्यावरण के संतुलन पर एक नई सोच अपनाएगा या मौजूदा नीतियां प्राकृतिक धरोहरों को कॉरपोरेट मुनाफे की भेंट चढ़ाती रहेंगी? अरावली केवल एक पहाड़ी शृंखला नहीं, बल्कि भारत के पर्यावरणीय भविष्य की पहली लाइन ऑफ डिफेंस है। और अब यह राजनीतिक टकराव यह तय करेगा कि सरकार इस चुनौती को समझने के लिए तैयार है या नहीं।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted