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संघ और बीजेपी में झूठा व अज्ञानी होना जरूरी? राजनाथ भी निकले व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी ग्रैजुएट

महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 3 दिसंबर 2025

राजनाथ सिंह के बयान ने खड़ा किया बड़ा सवाल: क्या BJP में सच बोलना अपराध हो गया है?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह दावा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू सरकारी पैसों से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे और सरदार पटेल ने इसका विरोध किया, भारतीय राजनीति में नए विवाद का सूत्रपात कर चुका है। यह बयान केवल राजनीतिक हमला नहीं, एक ऐसा झूठ है जिसे दस सेकंड की फैक्ट-चेकिंग भी ध्वस्त कर देती है। लेकिन असली मुद्दा यह नहीं कि राजनाथ ने क्या कहा—बल्कि यह है कि क्यों कहा? क्या अब बीजेपी में आगे बढ़ने के लिए झूठ बोलना ही योग्यता बन चुका है? क्या ऐसा दबाव है कि वरिष्ठ नेता भी पार्टी की झूठी कथा-निर्माण मशीनरी का हिस्सा बन जाएँ? यह सवाल अब आम जनता से लेकर बौद्धिक वर्ग तक हर कोई पूछ रहा है। संघ और बीजेपी में अज्ञानियों की भी फौज है। जिन्हें पता कुछ नहीं होता है लेकिन अज्ञानता और झूठ फैलाने में सबसे आगे रहते हैं। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी भरे पड़े हैं।

दस्तावेज़ शून्य, सबूत शून्य—फिर भी झूठ बोले तो नेता लायक? BJP में यही ट्रेंड!

इतिहासकारों ने स्पष्ट कहा है कि नेहरू द्वारा बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए सरकारी फंड इस्तेमाल करने का दावा पूरी तरह मनगढ़ंत है। इस कथित प्रस्ताव का समर्थन करने वाला न कोई सरकारी नोट मिलता है, न फाइल, न कैबिनेट रिकॉर्ड, न व्यक्तिगत पत्र—कुछ भी नहीं। भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार से लेकर कोर्ट की फाइलों तक कहीं ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। तथ्य शून्य और दावे इतने बड़े—यह BJP की उसी राजनीतिक शैली का उदाहरण है जिसमें झूठ स्वयं में “तथ्य” बन जाता है। जब दस्तावेज़ नहीं, तो सवाल उठता है—यह झूठ बोला क्यों गया? और जवाब मिलता है—क्योंकि BJP में झूठ बोलना रणनीति नहीं, संस्कृति है।

RSS–BJP की राजनीति: जहाँ इतिहास नहीं पढ़ाया जाता, इतिहास गढ़ा जाता है

यह पहला अवसर नहीं है जब RSS और BJP ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय नेताओं पर मनगढ़ंत कहानियाँ थोपी हों। कभी गांधी को विभाजन का दोषी बताया गया, कभी नेहरू को मुस्लिमों का तुष्टिकारी घोषित किया गया, और कभी पटेल को मुस्लिम-विरोधी ठहराया गया—सब बिना सबूत के। RSS की लंबे समय से एक वैचारिक आवश्यकता रही है कि वह उन नेताओं की छवि धूमिल करे जिन्होंने भारत का लोकतांत्रिक ढांचा खड़ा किया। आज राजनाथ सिंह उसी परंपरा को आगे बढ़ाते दिखते हैं—जहाँ तथ्य अप्रासंगिक हैं, और कथाएँ राजनीतिक पूँजी बन चुकी हैं।

राजनाथ सिंह—मध्यमार्गी छवि से ‘झूठों की फौज’ का हिस्सा बनने तक

राजनाथ सिंह को हमेशा BJP का अपेक्षाकृत संतुलित और शांत नेता माना जाता था। लेकिन उनकी हालिया बयानबाज़ी बताती है कि अब खुद वरिष्ठ नेता भी पार्टी की विचारधारा-संगत झूठ परोसने की मशीनरी से बाहर नहीं रह पाए हैं। जिस व्यक्ति ने अपने राजनीतिक करियर में कई बार संयम दिखाया, वही आज इतिहास की सबसे बुनियादी परतों को भी तोड़-मरोड़कर पेश कर रहा है। यह सिर्फ़ उनकी व्यक्तिगत गिरावट नहीं, इस बात का संकेत है कि BJP में ऊपर से नीचे तक एक ही लाइन चल रही है—झूठ को अपनाओ, प्रचार करो, और सच को दबाओ।

नेहरू–पटेल की विरासत को कलंकित करने का RSS–BJP का एजेंडा—नया अध्याय शुरू

नेहरू और पटेल दोनों ने राज्य के धन का धार्मिक स्थलों में उपयोग न करने का सख्त सिद्धांत अपनाया था। सोमनाथ मंदिर इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ एक पैसा सरकारी फंड का नहीं लगा। लेकिन आज BJP की रणनीति यही है कि नेहरू की छवि को तोड़ा जाए, पटेल को “अपना नेता” दिखाया जाए और दोनों के बीच झूठा टकराव पैदा किया जाए। राजनाथ सिंह का बयान इसी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है—एक ऐसा झूठ गढ़ना जिसे बार-बार बोलकर लोगों के मन में भ्रम पैदा किया जा सके।

क्या BJP में नेता होने का मतलब ‘संगठित झूठ’ का प्रसारक होना है?

जो नेता सवाल पूछते हैं, दस्तावेज़ मांगते हैं या तथ्य रखते हैं—वे पार्टी की लाइन में फिट नहीं बैठते। लेकिन जो झूठ बोलते हैं, इतिहास तोड़ते हैं, ध्रुवीकरण भड़काते हैं—वे ऊपर चढ़ते हैं। यही वजह है कि अब लोगों के मन में यह सवाल तीखे अंदाज़ में उठ रहा है: क्या संघ और बीजेपी में रहने के लिए झूठा होना ही सबसे बड़ी योग्यता है? राजनाथ सिंह के हालिया बयान ने इसे और मजबूत कर दिया है कि सच बोलना अब राजनीतिक आत्महत्या जैसा कदम माना जाता है।

झूठ की रिले रेस में अब राजनाथ भी शामिल, और सवाल देश का—इतिहास बचाएगा कौन?

राजनाथ सिंह का यह बयान इतिहास, राजनीति और सच—तीनों पर एक coordinated हमला है। यह उस मानसिकता का हिस्सा है जिसमें झूठ को इतने आत्मविश्वास से बोला जाता है कि वह जनता के एक हिस्से को सच जैसा लगे। लेकिन लोकतंत्र में इतिहास झूठ से नहीं चलता—सत्य से चलता है। और आज यही सत्य सबसे बड़ा शिकार हो रहा है। इसलिए सवाल सिर्फ़ राजनाथ सिंह का नहीं—यह सवाल पूरे देश का है: क्या अब BJP और RSS में टिके रहने के लिए झूठ बोलना अनिवार्य हो चुका है?

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