डॉ शुजात कादरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया | नई दिल्ली 29 अक्टूबर 2025
दशकों से फिलिस्तीन का संघर्ष स्वतंत्रता, गरिमा और अपने देश में संप्रभुता पाने की एक बड़ी मानवाधिकार लड़ाई माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में, खासकर 7 अक्टूबर 2023 की घटना के बाद इस संघर्ष की अंतरराष्ट्रीय छवि बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस सहानुभूति में आई गिरावट का सबसे बड़ा कारण है हमास के काम और उसकी विचारधारा, जिसने न सिर्फ गाज़ा को तबाह किया, बल्कि फिलिस्तीनी आंदोलन की नैतिक और कूटनीतिक नींव को भी कमजोर कर दिया।
हमास की स्थापना 1987 में पहली इंतिफ़ादा (Intifada) के दौरान हुई थी। यह मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखा के रूप में उभरा और खुद को इसराइल के कब्जे के खिलाफ “सशस्त्र प्रतिरोध” का प्रतीक बताने लगा। शुरू में, इस विचार को कई फिलिस्तीनियों ने समर्थन दिया जो लंबे समय से अन्याय और विस्थापन से परेशान थे। लेकिन समय के साथ, हमास ने अलग राह अपना ली एक कट्टरपंथी, असहिष्णु और हिंसक संगठन, जिसने शांति और सह-अस्तित्व को ठुकरा दिया।
राजनीतिक ढांचा बनाने या एक व्यवहारिक फिलिस्तीनी राज्य की योजना तैयार करने के बजाय, हमास ने अपनी ऊर्जा हथियारबंदी और युद्ध में झोंक दी। उसके घोषणापत्र में धर्म आधारित विचारों के साथ इसराइल के अस्तित्व को ही नकारा गया है। इसने न केवल संभावित अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को दूर कर दिया, बल्कि फिलिस्तीन को दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) की वैश्विक सहमति से भी बाहर कर दिया जो फिलिस्तीनी राजनयिक पहचान की नींव थी।
7 अक्टूबर 2023 को जब हमास के लड़ाकों ने इसराइल में घुसकर नागरिकों को बंधक बनाए, तो यह फिलिस्तीनियों के लिए नैतिक और रणनीतिक आपदा साबित हुई। दशकों से जो कूटनीतिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बनी थी, वह एक झटके में मिट गई। दुनिया भर में, जो लोग पहले इसराइल के कब्जे और गाज़ा की मानवीय स्थिति पर सहानुभूति रखते थे, अब उन्हें हमास की नृशंसता और नागरिकों पर हमले ने झटका दिया। इससे पूरी दुनिया की नजरों में “प्रतिरोध” और “आतंकवाद” के बीच की रेखा धुंधली हो गई। पश्चिमी देशों, जो पहले इसराइल की नीतियों पर सवाल उठाते थे, अब एकजुट होकर इसराइल के “आत्मरक्षा के अधिकार” के समर्थन में खड़े हो गए। नतीजा गाज़ा तबाही का केंद्र बन गया, और हजारों निर्दोष फिलिस्तीनी हमास की लापरवाही की कीमत चुका रहे हैं।
हमास ने फिलिस्तीनी मुद्दे को अपने राजनीतिक अस्तित्व का औज़ार बना लिया। शासन, विकास या कूटनीति पर ध्यान देने के बजाय, उसने गाज़ा को डर और हथियारों का किला बना दिया। पुनर्निर्माण और लोगों की भलाई के लिए मिले अरबों डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मदद का उपयोग टनल बनाने, हथियार जमा करने और अपनी निजी सेना बनाए रखने में किया गया। “प्रतिरोध” के नाम पर हमास ने विरोधी आवाज़ों को दबाया, नागरिक समाज को चुप कराया और फतह और फिलिस्तीनी प्राधिकरण (Palestinian Authority) के नेताओं को निशाना बनाया।
इससे फिलिस्तीन दो हिस्सों में बंट गया गाज़ा: हमास के सख्त नियंत्रण में और वेस्ट बैंक: कमजोर फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अधीन इस विभाजन ने फिलिस्तीनी एकता को तोड़ दिया और इसराइल को यह कहने का मौका दे दिया कि “शांति के लिए कोई विश्वसनीय साथी नहीं है।”
हमास के आने से पहले, यासिर अराफात के नेतृत्व में PLO (फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन) को दुनिया ने फिलिस्तीनी जनता का वैध प्रतिनिधि माना था। PLO ने संयुक्त राष्ट्र में ऑब्जर्वर का दर्जा हासिल किया, दुनिया भर में दूतावास खोले, और फिलिस्तीनी मुद्दे को न्याय और मानवाधिकारों का सवाल बनाया।
हमास ने इस पूरी कहानी को पलट दिया। उसकी हिंसा ने इसराइल और उसके सहयोगियों को मौका दिया कि वे पूरे फिलिस्तीनी संघर्ष को कट्टरपंथी और आतंकवादी बताएं। पश्चिमी देश, जो पहले इसराइल पर अवैध बस्तियों (settlements) रोकने का दबाव डालते थे, अब केवल आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की बात करते हैं। यहां तक कि कई अरब देश, जो कभी फिलिस्तीन के सबसे बड़े समर्थक थे, अब अपने राष्ट्रीय हितों और इसराइल के साथ समझौतों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
हमास की नीतियों का सबसे बड़ा शिकार खुद गाज़ा के आम नागरिक बने हैं जिन पर भुखमरी, विस्थापन और मौत का पहाड़ टूट पड़ा है। हमास के नेता अक्सर या तो टनलों में छिपे रहते हैं या विदेशों में बैठे आदेश देते हैं, जबकि आम लोग बमबारी झेलते हैं।
हमास की रणनीति लगातार संघर्ष पर टिकी है — क्योंकि जितनी ज्यादा तबाही होती है, उतनी ही दुनिया में इसराइल के खिलाफ निंदा होती है। इस तरह, हमास अपने ही लोगों को ढाल बनाकर उनके दुःख को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है।
आज जब एक नई गाज़ा शांति योजना की बात हो रही है, तो दुनिया की निगाहें इस पर हैं कि क्या हमास अब भी हिंसा छोड़कर बातचीत का रास्ता चुनता है। अगर वह सच में फिलिस्तीनी जनता का प्रतिनिधि होने का दावा करता है, तो उसे अब युद्ध की जगह पुनर्निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। इसराइल, मिस्र, कतर और अमेरिका ने सतर्क आशा जताई है, लेकिन शांति थोपी नहीं जा सकती उसे अपनाना पड़ता है।
दुनिया को समझना होगा कि फिलिस्तीन का समर्थन करना और हमास का समर्थन करना एक ही बात नहीं है। सच्ची एकजुटता उन फिलिस्तीनियों के साथ है जो शांति, सुधार और आत्मनिर्णय की राह पर हैं न कि हिंसा की राह पर। फिलिस्तीनी संघर्ष को अपनी खोई हुई नैतिक जमीन वापस पाने के लिए, उसे हमास की विचारधारा से स्पष्ट और स्थायी दूरी बनानी होगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी यह मानना होगा कि हमास की हिंसा पूरे फिलिस्तीन का चेहरा नहीं है। क्योंकि करोड़ों आम फिलिस्तीनी शिक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता चाहते हैं, न कि अंतहीन युद्ध।
हमास दावा करता है कि वह फिलिस्तीन के लिए लड़ रहा है, लेकिन उसके हर कदम ने फिलिस्तीन को कमजोर ही किया है। उसने दुनिया की सहानुभूति को शक में, एकजुटता को थकान में, और त्रासदी को प्रचार में बदल दिया है। अगर एक स्वतंत्र, सुरक्षित और संप्रभु फिलिस्तीन का भविष्य बनना है, तो वह केवल उन नेताओं के हाथों से बनेगा जो हथियार की जगह कलम, कट्टरता की जगह बातचीत, और नफरत की जगह उम्मीद को चुनेंगे।



