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ट्रम्प की कड़ी चेतावनी: Hamas सुधरे नहीं तो इज़राइल दे सकता है जवाब

वाशिंगटन 29 अक्टूबर 2025

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गाज़ा संघर्ष पर ऐसा बयान दिया है जिसने न केवल

 मध्यपूर्व की सियासत को हिला दिया है, बल्कि यह भी साफ़ कर दिया है कि अमेरिका में सत्ता से बाहर होने के बावजूद ट्रम्प की अंतरराष्ट्रीय नीति अब भी बेहद कठोर और एकतरफ़ा है। ट्रम्प ने कहा कि “Hamas को अब व्यवहार सुधारना होगा, समझौते का पालन करना होगा, और अगर उसने फिर से हमला किया तो इज़राइल को जवाब देने का पूरा अधिकार है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब गाज़ा में हालिया इज़राइली हवाई हमलों में दर्जनों निर्दोष लोगों की मौत हो चुकी है और मानवीय संकट फिर से गहराता जा रहा है। इसके बावजूद ट्रम्प ने एक बार भी फिलिस्तीनी नागरिकों की पीड़ा का उल्लेख नहीं किया — बल्कि पूरा ध्यान “इज़राइल के अधिकार” पर केंद्रित रखा।

ट्रम्प की यह भाषा कूटनीति से ज़्यादा सैन्य सोच को दर्शाती है। वह बार-बार “हिट बैक” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जो इस बात का संकेत है कि अमेरिका के लिए अब भी “आतंक के खिलाफ़ युद्ध” जैसी पुरानी अवधारणाएँ ही मध्यपूर्व की नीति को दिशा दे रही हैं। इस बयान से यह भी जाहिर हुआ कि अमेरिका के भीतर चुनावी राजनीति फिर से मध्यपूर्व को हथियार बनाकर चल रही है — जहाँ ट्रम्प यह दिखाना चाहते हैं कि वह “कमज़ोर डेमोक्रेटिक नीति” के मुकाबले “सशक्त और निर्णायक इज़राइल समर्थक नेता” हैं। यह रणनीति 2024 में उनकी राष्ट्रपति उम्मीदवारी के लिए एक राजनीतिक हथियार भी है, जिससे वे अमेरिकी यहूदी और रुढ़िवादी मतदाताओं को साध सकें।

हालांकि ट्रम्प ने दावा किया कि “गाज़ा में युद्धविराम कायम है”, लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में गाज़ा के कई हिस्सों में हवाई हमलों और गोलाबारी की घटनाएं हुई हैं। गाज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, हाल के इज़राइली हमलों में 25 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। अस्पतालों में भीड़ है, बिजली और दवाओं की भारी कमी है, और संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी के बावजूद मानवीय सहायता गाज़ा तक नहीं पहुँच पा रही है। ऐसे में ट्रम्प का बयान एक ऐसे नेता की तरह लगता है जो दूर बैठकर युद्ध की राजनीति खेल रहा है, जबकि ज़मीन पर हकीकत एक त्रासदी का रूप ले चुकी है।

ट्रम्प की टिप्पणी में “संयम” का जो आग्रह है, वह केवल एकतरफ़ा है। उन्होंने Hamas को संयम बरतने की सलाह दी, लेकिन इज़राइल के लगातार हमलों पर कोई सवाल नहीं उठाया। यह दोहरी नीति दशकों से अमेरिका की मध्यपूर्व नीति की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। जब एक पक्ष को पूर्ण समर्थन दिया जाता है और दूसरे की पीड़ा को “आतंकी गतिविधि” कहकर खारिज कर दिया जाता है, तो यह शांति नहीं, बल्कि असमानता को संस्थागत रूप देता है। ट्रम्प की यह नीति उसी असंतुलन की पुनरावृत्ति है जिसने कई बार गाज़ा में नरसंहार जैसी स्थिति पैदा की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प का यह बयान केवल विदेश नीति नहीं, बल्कि अमेरिकी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। जैसे-जैसे राष्ट्रपति चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, ट्रम्प खुद को “इस्राएल का सच्चा मित्र” और “इस्लामी आतंक के ख़िलाफ़ कठोर नेता” के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। यह वही राजनीतिक चाल है जिसका इस्तेमाल वे पहले भी कर चुके हैं — 2017 में जब उन्होंने यरुशलम को इज़राइल की राजधानी घोषित किया था, तब पूरी दुनिया ने उसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून के उल्लंघन के रूप में देखा, लेकिन अमेरिकी चुनावों में वह उनके लिए “साहसी कदम” बन गया। अब वही लहजा और वही राजनीति फिर दोहराई जा रही है।

गाज़ा में जारी हालात यह साबित करते हैं कि ट्रम्प के शब्द युद्धविराम की जगह आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। इज़राइल के लिए खुली छूट और Hamas के लिए कठोर चेतावनी का अर्थ यह है कि अमेरिका एक बार फिर “सुरक्षा के नाम पर पक्षपात” कर रहा है। यह न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है, बल्कि गाज़ा के लाखों नागरिकों के जीवन के लिए भी विनाशकारी हो सकता है।

दरअसल, ट्रम्प का यह बयान हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह कूटनीति की भाषा है या राजनीतिक ध्रुवीकरण की रणनीति? जब एक पूर्व राष्ट्रपति इतनी संवेदनशील स्थिति में केवल एक पक्ष का पक्षधर बनता है, तो यह संदेश पूरी दुनिया में जाता है कि युद्ध, राजनीति और धर्म — सब कुछ अब केवल सत्ता की भाषा में तौला जा रहा है। और यह वही खतरनाक दौर है जब शांति का शब्द धीरे-धीरे अपनी अर्थवत्ता खोने लगता है।

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