ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु/नई दिल्ली | 18 जून 2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। एक सदी के इस सफर में संघ देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक बन चुका है। शिक्षा, सेवा, श्रमिक संगठनों, छात्र गतिविधियों, ग्रामीण विकास, सामाजिक अभियानों और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति दिखाई देती है। लेकिन जितना बड़ा संगठन, उतना बड़ा सवाल भी—क्या RSS को भी वही पारदर्शिता और जवाबदेही स्वीकार नहीं करनी चाहिए जो देश की अन्य संस्थाओं पर लागू होती है?
देश में एक सामान्य नागरिक यदि ट्रस्ट बनाता है तो उसे पंजीकरण कराना पड़ता है। कोई एनजीओ चलाता है तो उसे नियमित ऑडिट और वित्तीय विवरण जमा करने पड़ते हैं। धार्मिक संस्थाओं, सोसायटियों और फाउंडेशनों को भी अपनी आय, व्यय और गतिविधियों का रिकॉर्ड रखना पड़ता है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या RSS इन मानकों से अलग कोई विशेष श्रेणी है?
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने हाल ही में यही प्रश्न उठाया है। उन्होंने संघ की कानूनी स्थिति, वित्तीय ढांचे और उससे जुड़े संस्थानों की जवाबदेही को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। राजनीतिक मतभेदों से अलग हटकर देखें तो उनके कई सवाल ऐसे हैं जिन पर सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए।
RSS और उससे प्रेरित संगठनों का नेटवर्क देशभर में फैला हुआ है। शिक्षा संस्थान, छात्रावास, सेवा परियोजनाएं, अनुसंधान केंद्र, प्रकाशन संस्थान, सामाजिक संगठन और विभिन्न मंच संघ की विचारधारा से जुड़े बताए जाते हैं। यदि इतना व्यापक ढांचा मौजूद है तो यह जानना कोई असामान्य मांग नहीं है कि इन संस्थाओं की आय का स्रोत क्या है, उनका वित्तीय संचालन कैसे होता है और उनकी संपत्तियों का प्रबंधन किस व्यवस्था के तहत किया जाता है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न समानता का है। जब देश के लाखों ट्रस्ट, एनजीओ, धार्मिक संस्थाएं और सामाजिक संगठन कानूनी पंजीकरण, ऑडिट और वित्तीय खुलासे के दायरे में आते हैं, तो RSS के लिए अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए? क्या किसी संस्था का प्रभाव, आकार या राजनीतिक महत्व उसे सार्वजनिक जवाबदेही से मुक्त कर सकता है?
यह सवाल और भी महत्वपूर्ण तब हो जाता है जब संघ का विस्तार अंतरराष्ट्रीय स्तर तक दिखाई देता है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों में संघ से जुड़े संगठन स्थानीय कानूनों के तहत पंजीकृत संस्थाओं के रूप में काम करते हैं। वे वहां के नियामक नियमों का पालन करते हैं, आवश्यक वित्तीय जानकारी उपलब्ध कराते हैं और कानूनी ढांचे के भीतर कार्य करते हैं। यदि विदेशों में यह व्यवस्था स्वीकार्य है तो भारत में इसी प्रकार की पारदर्शिता पर चर्चा से परहेज क्यों?
एक और प्रश्न सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत को उच्च स्तरीय सरकारी सुरक्षा प्राप्त है। इस सुरक्षा पर होने वाला खर्च अंततः करदाताओं के पैसे से ही वहन किया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना अस्वाभाविक नहीं कि जिस संगठन के शीर्ष नेतृत्व की सुरक्षा पर सार्वजनिक धन खर्च हो रहा है, उसकी संस्थागत और वित्तीय संरचना के बारे में अधिक पारदर्शिता क्यों नहीं होनी चाहिए?
हाल के वर्षों में संघ का प्रभाव केवल सामाजिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है। राष्ट्रीय नीतियों, सार्वजनिक बहसों और राजनीतिक विमर्श पर भी उसके प्रभाव की चर्चा होती रही है। ऐसे में जवाबदेही की अपेक्षा और अधिक स्वाभाविक हो जाती है।
यह विवाद उस पुराने बयान के बाद भी फिर चर्चा में आया जिसमें मोहन भागवत ने कहा था कि संकट के समय RSS के स्वयंसेवक बहुत कम समय में संगठित हो सकते हैं, जबकि सेना को औपचारिक प्रक्रियाओं के कारण अधिक समय लग सकता है। विपक्षी दल अब उसी बयान का हवाला देते हुए पूछ रहे हैं कि यदि संघ स्वयं को इतना प्रभावशाली और संगठित मानता है तो उसे पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्नों से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
संघ के समर्थक इन सवालों को राजनीतिक हमला बताते हैं। उनका कहना है कि RSS कोई गुप्त संगठन नहीं है, उसकी शाखाएं खुले मैदानों में लगती हैं और उसके अधिकांश कार्यक्रम सार्वजनिक होते हैं। यह तर्क अपनी जगह हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल सार्वजनिक गतिविधियों से नहीं आती, बल्कि वित्तीय और प्रशासनिक जवाबदेही से भी आती है।
असल प्रश्न RSS के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में कोई भी संस्था इतनी बड़ी हो सकती है कि उससे सवाल पूछना ही अनुचित माना जाए? यदि कानून और पारदर्शिता के नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, तो यह अपेक्षा RSS से भी की जानी स्वाभाविक है।
लोकतंत्र में सम्मान का सबसे मजबूत आधार प्रभाव नहीं, बल्कि जवाबदेही होती है। और जवाबदेही का पहला कदम है—पारदर्शिता। यदि संघ अपने शताब्दी वर्ष में अपनी संरचना, वित्तीय स्रोतों और संस्थागत व्यवस्था के बारे में अधिक स्पष्टता और खुलापन दिखाता है, तो इससे उसकी विश्वसनीयता और मजबूत ही होगी। आखिर लोकतंत्र में प्रश्न पूछना विरोध नहीं, बल्कि स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श की पहचान है।




