मुंबई/ टाटा नगर/ नई दिल्ली 28 अक्टूबर 2025
भारत के सबसे प्रतिष्ठित उद्योग समूह टाटा ग्रुप से जुड़ी उसकी आत्मा कही जाने वाली संस्था Tata Trusts में बड़ा फेरबदल हुआ है। रतन टाटा के बेहद करीबी और वर्षों से उनके विश्वासपात्र माने जाने वाले मेहली मिस्त्री को अब ट्रस्ट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। यह फैसला अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से चल रही आंतरिक खींचतान और असहमति का परिणाम बताया जा रहा है।
कब और कैसे हुआ फैसला
मेहली मिस्त्री को 2022 में Tata Trusts का ट्रस्टी बनाया गया था। तीन साल का उनका कार्यकाल इस अक्टूबर में पूरा हो रहा था। रतन टाटा के विश्वासपात्र होने के कारण यह माना जा रहा था कि उनकी पुनर्नियुक्ति महज़ औपचारिकता होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ट्रस्ट के भीतर सर्कुलर प्रस्ताव (Circular Resolution) के ज़रिए उनकी पुनर्नियुक्ति पर वोटिंग कराई गई, जिसमें अधिकांश ट्रस्टीज ने उनके पक्ष में मतदान नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि मिस्त्री की विदाई लगभग तय हो गई।
जानकारी के मुताबिक, यह प्रस्ताव अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में ट्रस्ट की आंतरिक बैठक में रखा गया था। उस बैठक में चेयरमैन नोएल टाटा, ट्रस्टी वेंणु श्रीनिवासन, विजय सिंह और अन्य सदस्यों ने मिस्त्री की पुनर्नियुक्ति का विरोध किया। वहीं, कुछ पुराने सदस्य इस फैसले से असहज दिखे, लेकिन बहुमत का पलड़ा भारी रहा।
आखिर क्यों हुआ विरोध
टाटा ट्रस्ट्स के भीतर बीते एक साल से असहमति की एक लकीर खिंचती दिख रही थी। मेहली मिस्त्री ने 2024 में यह प्रस्ताव रखा था कि किसी भी ट्रस्टी की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति सर्वसम्मति से ही की जाए। यानी बिना सभी ट्रस्टियों की मंजूरी के कोई फैसला न हो। यह प्रस्ताव सुनने में लोकतांत्रिक लगा, लेकिन इसके पीछे शक्ति-संतुलन को लेकर कई प्रश्न उठे।
नोएल टाटा और कुछ अन्य वरिष्ठ सदस्यों का मत था कि “सर्वसम्मति की बाध्यता” से निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी और जटिल हो जाएगी। वहीं, मिस्त्री गुट का मानना था कि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहेगी। यही वैचारिक मतभेद आगे चलकर गहराया और अंततः मिस्त्री की कुर्सी चली गई।
रतन टाटा के करीबी होने के बावजूद विदाई क्यों
मेहली मिस्त्री, रतन टाटा के सबसे पुराने साथियों में से एक रहे हैं। टाटा ग्रुप के कठिन दौर में भी उन्होंने टाटा के प्रति निष्ठा दिखाई थी। 2016 में सायरस मिस्त्री की विदाई के बाद जब समूह के अंदर सत्ता-संघर्ष चरम पर था, तब मेहली मिस्त्री ने खुलकर रतन टाटा का समर्थन किया था।
लेकिन आज जो स्थिति बनी है, वह यह दिखाती है कि टाटा ट्रस्ट्स अब सिर्फ व्यक्ति-निष्ठा पर नहीं, बल्कि सामूहिक संस्थागत निर्णयों पर चल रहा है। नोएल टाटा के चेयरमैन बनने के बाद यह दूसरा बड़ा संकेत है कि नई पीढ़ी पुराने समीकरणों से अलग राह पर बढ़ रही है।
Tata Trusts में सत्ता-संतुलन का नया दौर
Tata Trusts, टाटा समूह का सबसे शक्तिशाली अंग है — इसकी संयुक्त हिस्सेदारी टाटा संस में करीब 66% है। यानी टाटा समूह के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों पर ट्रस्ट का सीधा प्रभाव रहता है। मेहली मिस्त्री के बाहर जाने से ट्रस्ट के अंदर संतुलन का समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा। नोएल टाटा, वेंणु श्रीनिवासन और विजय सिंह का गठजोड़ अब ज्यादा मज़बूत स्थिति में है। यह संकेत है कि आने वाले वर्षों में ट्रस्ट की कार्यशैली में केंद्रीकरण बढ़ सकता है।
आगे क्या
मेहली मिस्त्री की विदाई को टाटा समूह के इतिहास में एक “भावनात्मक लेकिन रणनीतिक मोड़” माना जा रहा है। जहाँ एक ओर रतन टाटा युग की परंपराएं समाप्त होती दिख रही हैं, वहीं नोएल टाटा युग का आरंभ स्पष्ट होता जा रहा है। इस फैसले का असर केवल Tata Trusts तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह टाटा संस, TCS, टाटा स्टील, और अन्य कंपनियों की नीति-निर्माण प्रणाली** पर भी पड़ेगा। टाटा ग्रुप की संस्कृति हमेशा से विश्वास, पारदर्शिता और सम्मान पर आधारित रही है। अब देखना यह होगा कि इन मूल्यों को बरकरार रखते हुए नई पीढ़ी किस तरह समूह को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करती है।
मेहली मिस्त्री का बाहर होना सिर्फ एक व्यक्ति का पतन नहीं, बल्कि एक विचारधारा का अंत है — वह विचार जो रतन टाटा के विश्वास और व्यक्तिगत रिश्तों के बल पर खड़ा था। अब टाटा ट्रस्ट्स एक नई संरचना में प्रवेश कर चुका है, जहाँ व्यक्तिगत समीकरणों से ज़्यादा महत्त्व संस्थागत अनुशासन का होगा। टाटा समूह के इस बदलाव को आने वाले दशक में “नई पीढ़ी बनाम पुरानी परंपरा” के संघर्ष की भूमिका के रूप में याद किया जाएगा।




