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छात्र आत्महत्याओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: शिक्षा संस्थानों को मानसिक स्वास्थ्य गाइडलाइन लागू करने के निर्देश

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर 2025

देश में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक टिप्पणी की और सभी शिक्षा संस्थानों को छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सख्त दिशा-निर्देश लागू करने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक सफलता नहीं होना चाहिए, बल्कि छात्रों के समग्र मानसिक विकास और भावनात्मक स्थिरता को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी तय

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि छात्र आत्महत्या केवल व्यक्तिगत विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि शिक्षा संस्थानों की प्रणालीगत विफलता का भी संकेत है। कोर्ट ने कहा कि संस्थान केवल अंकों और रैंकिंग के दबाव में छात्रों को नहीं झोंक सकते। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर छात्र को परामर्श, सहयोग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध हो। न्यायालय ने यह भी कहा कि कई बार छात्र सामाजिक या पारिवारिक दबाव के कारण डिप्रेशन में चले जाते हैं, और ऐसे में संस्थानों की जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसे छात्रों की पहचान करें और समय रहते सहायता प्रदान करें।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन पर सख्त टिप्पणी

पीठ ने केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को निर्देश दिया कि सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में “मेंटल हेल्थ एंड वेलनेस पॉलिसी” को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। कोर्ट ने कहा कि यह नीति केवल दस्तावेजों में नहीं बल्कि वास्तविक रूप से कैंपस स्तर पर सक्रिय होनी चाहिए। इसके तहत हर संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर, हेल्पलाइन नंबर, और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए जाएं। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि हर छात्र को “सुरक्षा और सहारा” का अनुभव हो, ताकि वह अकेलेपन या अवसाद की स्थिति में खुद को कमजोर न महसूस करे।

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अकादमिक दबाव और सामाजिक तुलना पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज शिक्षा व्यवस्था इतनी प्रतिस्पर्धी हो गई है कि छात्रों पर लगातार ‘परफॉर्मेंस प्रेशर’ का बोझ रहता है। स्कूलों से लेकर इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों तक, हर जगह सफलता को केवल अंकों और रैंक के पैमाने से तौला जाता है। इस व्यवस्था ने कई प्रतिभाशाली छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। न्यायालय ने इस प्रवृत्ति को खतरनाक बताते हुए कहा कि हमें ऐसे माहौल की आवश्यकता है, जहां छात्रों को असफलता से भी सीखने की आज़ादी मिले।

आईआईटी, एनआईटी और मेडिकल कॉलेजों में बढ़ते मामले

हाल के वर्षों में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे IITs, NITs और मेडिकल कॉलेजों में छात्र आत्महत्याओं के कई मामले सामने आए हैं। 2023-24 में अकेले IITs में दर्जनभर छात्रों ने आत्महत्या की थी, जिनमें से अधिकतर सामाजिक अलगाव, अवसाद या जातीय भेदभाव के कारण परेशान थे। कोर्ट ने इन घटनाओं पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि शिक्षा संस्थान अब “केवल पढ़ाने की जगह” नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्हें “जीवन के पाठ” सिखाने का स्थान बनना होगा।

सकारात्मक पहल की उम्मीद

कोर्ट ने कहा कि अगर देश को युवा ऊर्जा को सही दिशा में लगाना है, तो मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना ही होगा। अदालत ने यह भी कहा कि शिक्षा मंत्रालय को हर छह महीने में रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें बताया जाएगा कि कितने संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य नीतियां लागू हुई हैं और उनके परिणाम क्या हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों ने एक “ऐतिहासिक कदम” बताया है।

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सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी है—कि छात्रों का जीवन किसी परीक्षा या रैंक से बड़ा है। अब जिम्मेदारी देश के हर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय पर है कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएं और सुनिश्चित करें कि किसी छात्र को अपने सपनों की कीमत अपनी जान देकर न चुकानी पड़े।

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