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युवाओं की चीख, सत्ता का मौन: मोदी सरकार में छात्र आत्महत्याओं का बढ़ता ग्राफ

देश के युवाओं की बदहाल स्थिति: आँकड़े जो व्यवस्था की नाकामी चीख़ रहे हैं

देश के युवाओं की वर्तमान हालत बताने के लिए अब सरकारी आँकड़े ही पर्याप्त हैं और यह स्थिति भयावह है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताज़ा रिपोर्ट 2023 ने एक बार फिर उस क्रूर सच्चाई को सामने रख दिया है जिसे मौजूदा सरकार बार-बार “विकास” और “अमृतकाल” की चमकदार रोशनी में छिपाने की कोशिश करती है—छात्र आत्महत्याओं का सिलसिला थमने के बजाय तेज़ी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की, जो वर्ष 2014 की तुलना में लगभग 75% अधिक है। यह वृद्धि केवल एक सांख्यिकीय आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस पूरी पीढ़ी की सामूहिक चीख है जिसे देश में लगातार बढ़ रही बेरोज़गारी, अवसरों की असमानता, शैक्षणिक प्रदर्शन के अत्यधिक दबाव और सरकारी उदासीनता के कारण भीतर से तोड़ दिया गया है। यह दिखाता है कि तथाकथित “डेमोग्राफिक डिविडेंड” (जनसांख्यिकीय लाभांश) को संभालने में सरकार की नीतियाँ कितनी बुरी तरह विफल रही हैं, जिससे युवा शक्ति निराशा और अवसाद के गहरे गर्त में धकेल दी गई है।

कांग्रेस का सीधा हमला: “मोदी सरकार युवाओं के विरोध में है” और नीतिगत उदासीनता का सच

इस भयावह और चिंताजनक स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर सीधा और तीखा हमला बोला है, यह आरोप लगाते हुए कि सत्ताधारी दल देश के युवाओं के साथ नहीं, बल्कि जानबूझकर उनके विरोध में खड़ा है। कांग्रेस प्रवक्ताओं ने तार्किक सवाल उठाया है कि “जब देश में हर साल हज़ारों विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं, तब प्रधानमंत्री अपनी लोकप्रिय ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उनकी वास्तविक समस्याओं पर बात क्यों नहीं करते?” कांग्रेस का यह आरोप गंभीर है कि मोदी सरकार शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन जैसे मूलभूत और असली मुद्दों से जानबूझकर ध्यान भटका रही है, और इसके बजाय सतही अभियानों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

उनका तर्क है कि ‘परीक्षा पे चर्चा’, ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘नई शिक्षा नीति’ जैसे आकर्षक अभियानों और नारों के पीछे की असलियत यह है कि सरकार केवल दिखावे और प्रचार में व्यस्त है, जबकि जमीनी स्तर पर छात्र भयंकर डिप्रेशन, भविष्य की असुरक्षा और रोज़गारविहीनता (Joblessness) के संकट से अकेले जूझ रहे हैं। यह नीतिगत उदासीनता युवाओं के प्रति सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाती है।

2014 से 2023 तक – सिस्टम की नाकामी और मौतों में भयावह इज़ाफ़ा

छात्र आत्महत्या के मामलों में 2014 से 2023 तक की वृद्धि दर सिस्टम की घोर नाकामी की कहानी बयां करती है। 2014 में जहाँ छात्र आत्महत्या के दर्ज मामले 8,032 थे, वहीं 2023 तक यह भयावह आँकड़ा उछलकर 13,892 पर पहुँच गया। यह बढ़ोतरी केवल संख्यात्मक नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था युवाओं को सुरक्षा और अवसर देने के अपने प्राथमिक दायित्व में विफल रही है। विशेष रूप से 2019 के बाद जब देश ने कोविड-19 महामारी, अचानक आई ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई सामाजिक-आर्थिक अनिश्चितता का दौर देखा, तब छात्रों में मानसिक दबाव कई गुना बढ़ गया। 

लेकिन सरकार ने इसके समाधान के लिए कोई राष्ट्रीय ढाँचा तैयार करने के बजाय, NEET, JEE, UPSC जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में और अधिक अस्थिरता और अनिश्चितता पैदा कर दी। बार-बार होने वाले री-एग्जाम, बड़े पैमाने पर पेपर लीक की घटनाएँ, रिज़ल्ट में अनावश्यक देरी, और कोचिंग माफियाओं का बेलगाम आतंक—इन सबने मिलकर एक पूरी पीढ़ी के भरोसे को तोड़ दिया है और उन्हें निराशा के उस गर्त में धकेल दिया है, जहाँ उन्हें जीवन का कोई अर्थ दिखाई नहीं देता।

रोज़गार का विकराल संकट, भविष्य का भय और मेहनत का मूल्य ख़त्म होना

मोदी सरकार ने सत्ता में आते समय “हर साल दो करोड़ नौकरियाँ” देने और “स्किल इंडिया” के ज़रिए युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन हकीकत इन वादों से कोसों दूर है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आँकड़ों के मुताबिक़, भारत में युवाओं (15-29 वर्ष) की बेरोज़गारी दर 20% से ऊपर बनी हुई है, जो दुनिया के अन्य प्रमुख विकासशील देशों की तुलना में काफी अधिक है। नौकरियाँ कम हैं, प्रतिस्पर्धा अत्यधिक है, और सबसे बड़ी बात यह है कि सरकारी परीक्षाओं में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार और धांधली ने युवाओं की कमर तोड़ दी है। 

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों में हर साल प्रतिष्ठित सरकारी भर्ती परीक्षाओं के रद्द या स्थगित होने की खबरें आती हैं, जिससे लाखों छात्रों का समय और पैसा बर्बाद होता है। इस अनिश्चित और निराशाजनक माहौल में छात्र यह महसूस करने लगे हैं कि उनकी मेहनत का कोई मतलब नहीं बचा है, क्योंकि योग्यता की जगह व्यवस्था की कमियाँ और भ्रष्टाचार हावी हैं—यही मानसिकता उन्हें अंततः आत्महत्या की कगार पर ले जा रही है।

मनोवैज्ञानिक सहायता और शिक्षा सुधार की गंभीर कमी: एक संवेदनहीन रवैया

एक सभ्य समाज में मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिक आवश्यकता माना जाता है, लेकिन भारत में इसकी उपलब्धता बेहद दयनीय है: यहाँ हर 10 लाख छात्रों पर केवल 1 मनोवैज्ञानिक काउंसलर उपलब्ध है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में मानसिक स्वास्थ्य के महत्त्व पर बातें तो की गईं, पर जमीनी स्तर पर इसके लिए बजट आवंटन लगभग नगण्य है। यूनेस्को की एक गंभीर रिपोर्ट के अनुसार, भारत में छात्रों में डिप्रेशन के मामलों में पिछले पाँच साल में 60% की वृद्धि हुई है, जो एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति है। इसके बावजूद, न स्कूलों में चौबीसों घंटे काम करने वाली हेल्पलाइन स्थापित की गई हैं, न कॉलेजों में पर्याप्त संख्या में प्रोफेशनल काउंसलर नियुक्त किए गए हैं। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या पर सरकार का रवैया—जो कि केवल “आत्मनिर्भर बनो” जैसे खोखले नारे तक सीमित है—वास्तव में एक संवेदनहीन और गैर-जिम्मेदाराना बयान बनकर रह गया है, जो संकटग्रस्त युवाओं को और अधिक अकेला महसूस कराता है।

कांग्रेस का सवाल: “मोदी जी, कब सुनेंगे इन आत्माओं की आवाज़?” और नीतिगत आत्महत्या

कांग्रेस नेताओं ने अंत में प्रधानमंत्री से स्पष्ट और निर्णायक जवाब मांगा है: “आप देश के युवाओं को ‘विकास के इंजन’ कहते हैं, तो फिर क्यों हर साल हज़ारों युवा खुद अपनी ज़िंदगी की चाबी घुमा देते हैं?” उन्होंने तीखे सवाल दागे हैं: “क्यों NEET और UPSC जैसी परीक्षाएँ अब मानसिक यातना और भ्रष्टाचार का केंद्र बन गई हैं?” और “क्यों सरकार ने राष्ट्रीय छात्र मानसिक स्वास्थ्य नीति पर एक शब्द भी नहीं कहा और कोई स्पष्ट योजना नहीं लाई?” कांग्रेस का कहना है कि यह केवल छात्र आत्महत्या नहीं है, बल्कि यह सरकार की नीतिगत आत्महत्या है—जिसने भारत की सबसे ऊर्जावान, सबसे प्रतिभाशाली और सबसे आशावान पीढ़ी को अवसर न देकर, बल्कि अनिश्चितता और अवसाद देकर तोड़ दिया है। 

मोदी सरकार के “अमृतकाल” की चमकदार तस्वीरों के पीछे आँकड़े स्याह हैं—हर 40 मिनट में एक छात्र आत्महत्या करता है। देश का भविष्य दम तोड़ रहा है, और सत्ता अभी भी गहन मौन में है। यह रिपोर्ट न सिर्फ़ आँकड़ों का लेखा-जोखा है, बल्कि यह एक गंभीर चेतावनी भी है—अगर अब भी व्यवस्था नहीं बदली और युवाओं की समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ी न व्यवस्था पर आशा रखेगी, न भविष्य पर भरोसा।

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