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2 लाख करोड़ गायब, 7 साल ऑडिट बंद—क्या CAG मोदी–शाह की जेब में है?

सुनील कुमार । अहमदाबाद/ नई दिल्ली 20 नवंबर 2025

देश में वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए यह बड़ा खुलासा हुआ है कि गुजरात की 8 प्रमुख नगरपालिकाओं में पिछले 4 से 7 वर्षों तक एक भी ऑडिट नहीं हुआ। इस दौरान जनता का ₹2 लाख करोड़ से अधिक का पैसा बिना किसी निगरानी, बिना किसी समीक्षा और बिना किसी विधिक परीक्षण के खर्च कर दिया गया। यह केवल आर्थिक कदाचार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सीधा हमला है—लेकिन देश की गोडी मीडिया इस पूरे मामले पर गहरी चुप्पी बनाए हुए है, जैसे यह कोई मामूली प्रशासनिक त्रुटि हो और न कि भारत के नागरिकों के टैक्स का इतिहास का सबसे बड़ा अनऑडिटेड व्यय!

गुजरात, जो केंद्र सरकार का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, वर्षों से भारी-भरकम केंद्रीय फंडिंग पाता रहा है। लेकिन अब यह खुलासा हो रहा है कि इन फंड्स का कोई हिसाब-किताब नहीं रखा गया, न कोई ऑडिट, न कोई रिपोर्ट, न कोई जवाबदेही। जबकि दूसरी तरफ जनता को हिंदू–मुस्लिम, मंदिर–मस्जिद, ‘संस्कृति रक्षा’, ‘समान नागरिकता’ और धर्म आधारित विवादों में उलझाए रखने का नैरेटिव लगातार परोसा जा रहा है। यह रणनीति साफ बताती है कि ध्यान भटकाने का खेल किस कदर सुनियोजित और खतरनाक स्तर पर चल रहा है।

इसी मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने एक बेहद तीखा, सटीक और असुविधाजनक सच उजागर करते हुए कहा है कि भारत की सर्वोच्च ऑडिट संस्था—Comptroller and Auditor General (CAG)—अब अपनी संवैधानिक भूमिका निभाने में सक्षम नहीं रही। जवाहर सरकार ने अपने बयान में कहा:

“मैं बार-बार कहता हूँ कि CAG अब मोदी–शाह की जेब में है। इसकी शुरुआत विनोद राय से हुई, जिसने UPA-2 को बदनाम किया और बाद में मोदी–शाह ने उसे खूब पुरस्कृत किया। आज CAG को मोदी–शाह के बेहूदे और अत्यधिक संदिग्ध खर्चों का ऑडिट करने की ज़रूरत ही नहीं। उसका काम सिर्फ विपक्षी राज्यों को शर्मिंदा करना रह गया है।”

जवाहर सरकार की यह टिप्पणी केवल एक राजनीतिक बयान नहीं—यह उस गंभीर संस्थागत क्षरण को उजागर करती है जिसका सामना भारत आज कर रहा है। CAG जैसे संवैधानिक संस्थान का उद्देश्य सत्ता पर निगरानी रखना, सरकारी खर्चों का परीक्षण करना और जनता के टैक्स के पैसों का सही उपयोग सुनिश्चित करना होता है। लेकिन अगर वही संस्था सत्ताधारियों के हितों की रक्षा का उपकरण बन जाए, तो देश की वित्तीय और लोकतांत्रिक संरचना दोनों खतरे में पड़ जाती हैं।

गुजरात की नगरपालिकाओं में वर्षों तक ऑडिट न होना केवल “लापरवाही” नहीं—यह सरकारी तंत्र की चौंकाने वाली मिलीभगत का मामला बनता है। सवाल उठते हैं:

  • आखिर इतने बड़े स्तर का वित्तीय अंधेर किसकी अनुमति से चला?
  • किन परियोजनाओं में कितना पैसा खर्च हुआ?
  • कितना पैसा गायब, गबन या गलत तरीके से उपयोग हुआ?
  • और क्यों 7 साल तक CAG ने एक बार भी नोटिस नहीं लिया?

गुजरात मॉडल की आड़ में चल रहे इस बेनियाम वित्तीय साम्राज्य को सवालों से बचाने के लिए जनता को लगातार धर्म-संप्रदाय की बहसों में उलझाना इस सरकार की सबसे सफल रणनीति रही है। हिंदू–मुस्लिम विवाद, धर्म आधारित राजनीति, टीवी डिबेट्स में शोर—सब कुछ जनता का ध्यान उन मुद्दों से हटाने के लिए किया जा रहा है जो वास्तव में देश की नींव को हिला रहे हैं: पारदर्शिता का अभाव, संस्थाओं का पतन, और टैक्स चोरी या टैक्स दुरुपयोग की गहरी जड़ें।

जवाहर सरकार की चेतावनी यह याद दिलाती है कि यदि CAG जैसी संस्था सत्ता की जेब में चली जाए, तो देश में भ्रष्टाचार का कोई “रिकॉर्ड” ही नहीं बचेगा। और जब रिकॉर्ड ही नहीं होंगे, तो जवाबदेही का सवाल कौन उठाएगा?

गुजरात की इस ऑडिट-रहित वित्तीय आपदा पर तुरंत कार्रवाई, स्वतंत्र जांच और CAG की जवाबदेही तय करने की माँग अब केवल विपक्ष की नहीं, बल्कि देश के हर जागरूक नागरिक की होनी चाहिए। क्योंकि जब ₹2 लाख करोड़ बिना हिसाब खर्च हो जाए, और देश फिर भी चुप रहे, तो यह लोकतंत्र का खतरनाक क्षण होता है—जिसे नज़रअंदाज़ करने की कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी।

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