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272 जोकरों की चिट्ठी: सत्ता के लाडलों का नया खेल—लोकतंत्र बचाने के नाम पर जनता की आँखों में धूल

महेंद्र सिंह । नई दिल्ली 20 नवंबर 2025

भारतीय लोकतंत्र के सामने आज असली चुनौती क्या है? बेरोजगारी? महंगाई? संस्थाओं की गिरती साख? चुनावी प्रक्रिया पर लगातार उठते सवाल? या फिर आज़ाद मीडिया के मरते हुए आखिरी साँसें? नहीं—अगर 272 सेवानिवृत्त जजों, ब्यूरोक्रेटों और अफसरों की चिट्ठी पढ़ी जाए, तो पता चलता है कि लोकतंत्र का असली खतरा तो राहुल गांधी हैं, क्योंकि वे निष्पक्ष चुनाव की माँग कर रहे हैं! यह कितना विचित्र है कि जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन सत्ता के आलीशान दफ्तरों में बिताया, जिन्होंने सरकारी सुविधाओं, चमचागिरी के फायदे और ‘ओल्ड पेंशन स्कीम’ की मलाई का भोग किया, जिनके बच्चों की शिक्षा और संपत्ति की विरासत सत्ता के सहारे विस्तार पाती रही—वही लोग आज लोकतंत्र के स्वयंभू रखवाले बनकर खड़े हैं और देश को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं।

इन 272 ‘संवेदनशील आत्माओं’ का ज़मीर तब नहीं जागा जब नोटबंदी से करोड़ों लोगों की नौकरियाँ चली गईं; इन्हें लोकतंत्र तब नहीं याद आया जब किसानों पर काले कानून थोपकर उन्हें दिल्ली की सर्दी में मरने के लिए छोड़ दिया गया; इन्हें संविधान की रक्षा की चिंता तब नहीं हुई जब विश्वविद्यालयों में छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, पत्रकारों को जेल में डाला गया और राज्यों की सरकारें खरीद-फरोख्त के जरिए गिराई गईं। लेकिन जैसे ही राहुल गांधी बोले—“भारत में चुनाव निष्पक्ष होने चाहिए”—अचानक इनका दिल धड़कने लगा, लोकतंत्र खतरे में दिखाई देने लगा और ये सब मिलकर ऐसे चिल्लाने लगे जैसे देश की रीढ़ टूटने वाली हो।

सवाल है—ये 272 लोग अचानक इतने बेचैन क्यों? इसकी वजह बेहद सरल है: क्योंकि उन्हें पता है कि निष्पक्ष चुनाव का मतलब है सत्ता के गहरे खेल का खुलासा, वह सत्ता तंत्र जो दशकों से इन जैसे लोगों को संरक्षण देता आया है। अगर चुनाव निष्पक्ष हुए, अगर मतदाता सूची की धांधलियों की जांच हुई, अगर बूथ कैप्चरिंग, वोटर गड़बड़ियाँ, फर्जी नाम और हास्यास्पद डेटा का सच सामने आया—तो इनका पूरा बनाया हुआ “एलीट तंत्र” ढह जाएगा।

याद कीजिए—मतदाता सूचियों में किस तरह एक पते पर 1100 वोट निकलते हैं, मकान नंबर ‘0’ होता है, पिता का नाम xyzdfg और पति का नाम fuckdsgh लिखा होता है, और चुनाव आयोग अपनी आँखें मूँद लेता है। यही वह सिस्टम है जिसे ये 272 लोग संरक्षित करते आए हैं। यही कारण है कि जब राहुल गांधी इस व्यवस्था को चुनौती देते हैं, तब इन्हें लोकतंत्र की याद आती है। और उनकी चिट्ठी पढ़कर ऐसा लगता है मानो किसी सर्कस के जोकर लोकतंत्र पर ज्ञान दे रहे हों—हर पंक्ति में नाटकीयता, हर तर्क में राजनीतिक स्वाद, और हर चिंता में सत्ता का डर।

कटाक्ष यह है कि ये वही लोग हैं जो सत्ता के दरबारों में बैठकर प्रेस—पुलिस—न्यायपालिका—प्रशासन सब पर प्रभाव डालते रहे, लेकिन आज जब राहुल गांधी जैसे नेता बिना सत्ता में आए जनता की आवाज़ बन रहे हैं, तो इन्हें यह स्वीकार नहीं हो रहा। राहुल गांधी की रीढ़ की हड्डी—उनका सीधा खड़ा रहना, सवाल पूछने की क्षमता, संस्थागत तानाशाही का विरोध—इन 272 जोकरों को सबसे ज्यादा चुभ रहा है। उन्हें डर है कि अगर यह नई राजनीतिक चेतना बढ़ी, तो उनका पुराना ‘सिस्टम का साम्राज्य’ ही खत्म हो जाएगा।

हकीकत यह है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या राहुल गांधी नहीं, बल्कि यही 272 लोग हैं—जो खुद को जनता से ऊपर, संविधान से बड़ा और नागरिकों की समझ से परे मानते हैं। उनकी चिट्ठी नकली है, उनकी चिंता बनावटी है और उनका ‘लोकतंत्र प्रेम’ हास्यास्पद अभिनय से ज्यादा कुछ नहीं।

लेकिन दुनिया की हर राजनीतिक स्क्रिप्ट की तरह, इसका अंत भी तय है। जितना ये 272 जोकर चिल्लाएँगे, जितना ये जनता को भ्रमित करने की कोशिश करेंगे, जितना ये सत्ता को ढाल बनाकर लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाएँगे—

सच उतना ही मजबूत होकर सामने आएगा। और इतिहास ने कभी भी जोकरों की आवाज़ पर विश्वास नहीं किया— उसने हमेशा सच की धीमी, स्थिर, दृढ़ चाल को ही चुना है।

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