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योगी मंत्री का ज़हरीला बयान: दैत्यों का वंशज है मुसलमान, पढ़ा लिखा सबसे बड़ा आतंकवादी, मस्जिद–मदरसे पर ताला लगे, तत्काल फांसी हो

उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर नफ़रत के सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है, और इस बार आग भड़काने वाला कोई हाशिये का चेहरा नहीं, बल्कि योगी सरकार में सत्ता-सम्मान पाने वाला चेहरा है। योगी की कैबिनेट में दर्जा प्राप्त मंत्री ठाकुर रघुराज सिंह ने मुसलमानों पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया है जो न सिर्फ भारतीय संविधान के खिलाफ है बल्कि सामाजिक सौहार्द पर सीधा हमला भी है। उनका बयान—“जो जितना पढ़ा लिखा मुसलमान है, उतना ही बड़ा आतंकवादी है… मुसलमान दैत्यों के वंशज हैं… मस्जिदों में ताले लगने चाहिए… मदरसे बंद हो जाने चाहिए”—इस बात का प्रमाण है कि सत्ता के कुछ हिस्से नफ़रत को नीति की तरह लागू करने लगे हैं। यह बयान सिर्फ मुसलमानों को नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र और शिक्षा की अवधारणा को चुनौती देने वाला है।

इससे पहले भी कई बीजेपी समर्थक नेताओं ने ऐसे ही उकसाऊ बयान दिए थे। हिंदू युवा वाहिनी के प्रदेश प्रभारी राघवेंद्र सिंह ने कहा था कि जो “हिंदू लड़का मुसलमान लड़की लेकर आएगा, उसे नौकरी दी जाएगी।” यह बयान न सिर्फ महिलाओं को खरीद-फरोख्त की वस्तु की तरह पेश करता है, बल्कि समाज को धर्म की दीवारों के बीच बाँटने का संगठित प्रयास भी है। सवाल यह है कि क्या यह सब योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में “नया शासन मॉडल” बन चुका है, जहां नफ़रत को पुरस्कार और मौन को कर्तव्य मान लिया गया है?

अब बड़ा सवाल बीजेपी के मुसलमान चेहरों से है—दानिश आज़ाद अंसारी, शहनवाज़ हुसैन, मुख्तार अब्बास नक़वी, और यहां तक कि राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान—क्या ये सभी इस नफ़रत भरे माहौल को देखकर भी खामोश रहेंगे? क्या पार्टी वफादारी ने उनकी ज़ुबान सील कर दी है, या उन्हें लगता है कि इन बयानों की आग से सिर्फ आम मुसलमान जलेंगे, वे नहीं? यह चुप्पी सिर्फ राजनीतिक नहीं, नैतिक विफलता भी है।

इधर संघ प्रमुख मोहन भागवत बार-बार हिंदू–मुस्लिम सौहार्द की बातें करते हैं, संवाद का आग्रह करते हैं। लेकिन अगर सच में उन्हें “सद्भाव” पर अपना अगला व्याख्यान देना है, तो पहले उन्हें योगी आदित्यनाथ के इन “अश्वमेध रथ के सारथियों”—ठाकुर रघुराज सिंह और राघवेंद्र सिंह—को तामपत्र, सप्तपर्णी शाल और श्रीफल देकर सम्मानित कर देना चाहिए। आखिर नफ़रत फैलाने के बदले जिस तरह की सुविधाएं, मकान, ज़मीनें, ठेके और राजनीतिक सुरक्षा इन लोगों को मिलती है, उसमें यह सम्मान तो न्यूनतम औपचारिकता ही है।

दरअसल, यह खेल बहुत गहरा है। गगनचुंबी मकान, हज़ारों बीघा ज़मीन, राजधानी से दिल्ली तक फैले राजनीतिक नेटवर्क, मोटे बैंक बैलेंस—इन सबके बाद अब इन नेताओं का एक ही काम बचता है: आम हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ धर्मयुद्ध में धकेलना। जबकि उनके अपने परिवार, रिश्तेदार और आने वाली कई पीढ़ियाँ सत्ता के संरक्षण में पहले ही सुरक्षित कर दी गई हैं। ऐसे “महान सपूतों” को नफ़रत की राजनीति में RSS-बीजेपी द्वारा मिलता स्नेह, संरक्षण और मंच यह साबित करने के लिए काफी है कि इस अभियान का लक्ष्य समाज को बांटना नहीं, उसे स्थायी रूप से नियंत्रित करना है।

भारत का लोकतंत्र ऐसे ज़हरीले बयानों से पहले भी गुज़रा है, लेकिन सत्ता की छाया में खुलेआम फैलती नफ़रत इस बार कहीं ज़्यादा संगठित, कहीं ज़्यादा संरक्षित और कहीं ज़्यादा खतरनाक दिखाई देती है।

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