राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 सितंबर 2026
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनावी चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की एक अहम टिप्पणी ने चुनावी मामलों में Artificial Intelligence यानी AI के इस्तेमाल की संभावनाओं पर नई चर्चा छेड़ दी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि मामले को तेजी से निपटाने के लिए AI और मशीन-लर्निंग टूल्स की मदद ली जा सकती है। आयोग ने इस विवाद के निपटारे के लिए छह महीने का समय मांगा था, लेकिन अदालत ने तीन महीने को पर्याप्त बताया। अदालत की टिप्पणी का मकसद AI को निर्णय लेने वाला बनाना नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में मौजूद दस्तावेजों को जल्दी पढ़ने, व्यवस्थित करने और उनमें जरूरी तथ्यों को खोजने की प्रक्रिया को तेज करना है।
आखिर TMC विवाद में AI की जरूरत क्यों पड़ी?
इस मामले में चुनाव आयोग के सामने बड़ी मात्रा में दस्तावेज, हलफनामे और दोनों पक्षों के दावे हैं। राजनीतिक दल के नाम और चुनावी चिह्न पर अंतिम फैसला केवल किसी एक दस्तावेज या बयान के आधार पर नहीं होता। आयोग को उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखना होता है और दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर देना होता है। इसी वजह से दस्तावेजों की संख्या बढ़ने पर उन्हें पढ़ना, वर्गीकृत करना और एक-दूसरे से मिलाना लंबी प्रक्रिया बन सकती है। चुनाव आयोग ने भी सुप्रीम कोर्ट के सामने बताया कि प्रतिद्वंद्वी गुटों, पार्टी पदाधिकारियों और समर्थकों की ओर से बड़ी संख्या में हलफनामे दाखिल किए जाते हैं। ऐसे में AI प्रारंभिक दस्तावेजी काम को काफी तेज कर सकता है।
1. लाखों हलफनामों की छंटाई
AI का सबसे पहला इस्तेमाल दस्तावेजों को व्यवस्थित करने में हो सकता है। मान लीजिए दोनों गुटों की ओर से हजारों या लाखों हलफनामे दाखिल किए जाते हैं। AI इनमें मौजूद नाम, पद, जिला, पार्टी सदस्यता, संगठनात्मक जिम्मेदारी और दूसरे प्रमुख विवरणों को पहचानकर अलग-अलग श्रेणियों में रख सकता है। इससे अधिकारियों को हर दस्तावेज को शुरुआत से पढ़ने के बजाय जरूरी हिस्से तक जल्दी पहुंचने में मदद मिल सकती है।
2. एक जैसे और दोहराए गए दस्तावेजों की पहचान
बड़ी संख्या में दाखिल दस्तावेजों में कई हलफनामे एक जैसी भाषा या समान जानकारी वाले हो सकते हैं। AI ऐसे दस्तावेजों को पहचानकर समूह बना सकता है। इससे अधिकारियों को यह समझने में आसानी हो सकती है कि कितने स्वतंत्र दस्तावेज हैं और कितने दस्तावेजों में मूल रूप से समान जानकारी दोहराई गई है।
3. अलग-अलग रिकॉर्ड का आपस में मिलान
AI पार्टी की सदस्यता सूची, पदाधिकारियों की सूची, बैठक की कार्यवाही, प्रस्ताव और दूसरे संगठनात्मक रिकॉर्ड में मौजूद नामों को एक-दूसरे से मिलाने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का नाम अगर एक दस्तावेज में पार्टी पदाधिकारी के तौर पर दर्ज है और दूसरे रिकॉर्ड में उसकी अलग भूमिका दिखाई गई है, तो AI उस अंतर को जांच के लिए चिन्हित कर सकता है।
4. विरोधाभासी दावों को सामने लाना
ऐसे विवादों में दोनों पक्ष एक ही तथ्य की अलग व्याख्या कर सकते हैं। AI दोनों पक्षों के दस्तावेजों को पढ़कर यह चिन्हित कर सकता है कि किस मुद्दे पर उनके दावे एक-दूसरे से अलग हैं। उदाहरण के तौर पर एक पक्ष किसी बैठक को वैध बताता है और दूसरा उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। AI इस तरह के विरोधाभासों को सामने रख सकता है ताकि जांच अधिकारी उस मुद्दे पर विशेष ध्यान दे सकें।
5. हजारों पन्नों में जरूरी नाम और तथ्य खोजना
AI की मदद से किसी खास व्यक्ति, पद, बैठक, तारीख या प्रस्ताव से जुड़ी जानकारी हजारों पन्नों में तेजी से खोजी जा सकती है। इससे अधिकारियों को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कोई नाम या दावा किन-किन दस्तावेजों में दर्ज है और अलग-अलग जगहों पर उसके बारे में क्या जानकारी दी गई है।
6. पूरे विवाद की टाइमलाइन तैयार करना
AI अलग-अलग दस्तावेजों में दर्ज तारीखों और घटनाओं को जोड़कर एक क्रमवार टाइमलाइन तैयार कर सकता है। मसलन, पार्टी के भीतर विवाद कब सामने आया, कौन-सी बैठक कब हुई, किस बैठक में क्या प्रस्ताव आया, किस पक्ष ने कब जवाब दिया और कौन-से दस्तावेज कब दाखिल किए गए। इससे पूरे मामले को घटनाक्रम के रूप में समझने में सुविधा हो सकती है।
7. दस्तावेजों का संक्षिप्त सार
किसी मामले में हजारों पन्नों की सामग्री हो तो प्रत्येक अधिकारी के लिए हर दस्तावेज को समान विस्तार से पढ़ना कठिन हो सकता है। AI प्रत्येक दस्तावेज का सार बनाकर उसके महत्वपूर्ण बिंदु सामने ला सकता है। इससे अधिकारी यह तय कर सकते हैं कि किन दस्तावेजों की विस्तृत जांच जरूरी है।
8. संदिग्ध पैटर्न को जांच के लिए चिन्हित करना
AI बड़ी मात्रा में डेटा में असामान्य पैटर्न खोज सकता है। उदाहरण के लिए एक ही तरह की जानकारी कई दस्तावेजों में अचानक दिखाई दे रही हो या किसी रिकॉर्ड में तारीख और दूसरी जानकारी में असंगति हो। AI ऐसे मामलों को जांच के लिए फ्लैग कर सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सीमा है—AI का किसी दस्तावेज को संदिग्ध बताना यह साबित नहीं करता कि वह फर्जी है। अंतिम सत्यापन इंसानी जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही होगा।
AI फैसला नहीं करेगा
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। AI को चुनाव आयोग का निर्णयकर्ता नहीं बनाया जा सकता। AI यह तय नहीं कर सकता कि कौन-सा गुट किसी राजनीतिक दल का वास्तविक प्रतिनिधि है या मूल चुनावी चिह्न किसे मिलना चाहिए। वह केवल दस्तावेजों और सूचनाओं को व्यवस्थित करने तथा विश्लेषण में सहायता दे सकता है।
TMC के मामले में चुनाव आयोग को पार्टी के नाम और चिह्न से जुड़े विवाद का फैसला लागू नियमों और दोनों पक्षों की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर करना है। चुनाव आयोग ने फिलहाल दोनों गुटों के बीच विवाद के अंतिम निपटारे तक मूल पार्टी नाम और ‘घासफूल’ चिह्न को फ्रीज किया है और दोनों पक्षों को अलग-अलग नाम और चिह्न दिए हैं।
इंसानी जांच क्यों जरूरी रहेगी?
AI जितना भी तेज हो, वह दस्तावेज में लिखी बात को अपने आप सच नहीं मान सकता। किसी हलफनामे में किया गया दावा सही है या नहीं, किसी बैठक का रिकॉर्ड वास्तविक है या नहीं, किसी व्यक्ति की सदस्यता वैध है या नहीं और किसी दस्तावेज की कानूनी अहमियत कितनी है—इन सवालों का फैसला संबंधित अधिकारी और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाएगा।
यही वजह है कि AI का इस्तेमाल “फैसला करने” के बजाय “फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया को तेज करने” के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है। तकनीक हजारों पन्नों को कुछ ही समय में छांट सकती है, लेकिन उन दस्तावेजों की विश्वसनीयता और कानूनी महत्व का मूल्यांकन मानव विशेषज्ञों को ही करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने समयसीमा पर भी जताई सख्ती
इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट पहले भी चुनाव आयोग से मामले के निपटारे की समयसीमा बताने को कह चुका है। 25 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने कहा था कि मामले को बहुत लंबा नहीं खिंचना चाहिए और शिवसेना विवाद में देरी के परिणामों का भी उल्लेख किया था।
अब अदालत ने दोनों पक्षों को अतिरिक्त दस्तावेज, हलफनामे और जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने में नाम और चुनावी चिह्न के विवाद पर फैसला करने को कहा गया है। आयोग ने छह महीने की जरूरत बताई थी, लेकिन अदालत ने तीन महीने को पर्याप्त माना और कहा कि कोई असाधारण परिस्थिति पैदा होने पर आयोग फिर अदालत के सामने आ सकता है।
इस पूरे मामले ने यह सवाल भी सामने ला दिया है कि आने वाले समय में चुनावी और कानूनी प्रक्रियाओं में AI की भूमिका कितनी बढ़ सकती है। TMC विवाद में फिलहाल AI के इस्तेमाल की चर्चा मुख्य रूप से दस्तावेजों की छंटाई, तुलना, खोज और विश्लेषण तक सीमित है। अंतिम निर्णय की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की ही रहेगी। यही अंतर महत्वपूर्ण है—AI हजारों पन्नों को पढ़ने में मदद कर सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक और कानूनी फैसला इंसानी प्रक्रिया से ही होगा।



