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एंटी-कन्वर्जन सेल से रोजगार मिलेगा या डिग्री?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 जून 2026

उत्तर प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में “एंटी-कन्वर्जन सेल” बनाने का आदेश आया है। खबर पढ़कर लगा कि शायद राज्य की सरकार और राजभवन ने यह तय कर लिया है कि शिक्षा की दुनिया की सारी समस्याएं खत्म हो चुकी हैं। अब न शिक्षकों की कमी है, न शोध का संकट है, न प्रयोगशालाओं की बदहाली है, न कैंपस प्लेसमेंट की चिंता है, न बेरोजगारी का सवाल बचा है। अब बस एक ही समस्या रह गई है—धर्मांतरण!

देश का युवा नौकरी मांग रहा है, लेकिन उसे सेल मिल रहा है। छात्र बेहतर लाइब्रेरी मांग रहे हैं, उन्हें निगरानी तंत्र मिल रहा है। विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय रिसर्च की बात कर रहे हैं, लेकिन सत्ता को कैंपस में “संदिग्ध गतिविधियां” तलाशने की ज्यादा चिंता है। ऐसा लगता है जैसे सरकार का लक्ष्य विश्वविद्यालयों को ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि चौकीदारी का केंद्र बनाना हो।

सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश के किसी विश्वविद्यालय में यह समीक्षा हुई कि कितने छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार पा रहे हैं? कितने कॉलेजों में स्थायी शिक्षक हैं? कितने संस्थानों में आधुनिक लैब और रिसर्च सुविधाएं उपलब्ध हैं? कितने विद्यार्थियों को इंडस्ट्री के अनुरूप प्रशिक्षण मिल रहा है? यदि नहीं, तो फिर प्राथमिकता का यह क्रम आखिर तय कौन कर रहा है?

विडंबना यह है कि जिस देश को अगले दशक में दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति होने का दावा किया जा रहा है, उसी देश में युवाओं की ऊर्जा को रोजगार, नवाचार और कौशल विकास की बजाय सांस्कृतिक और धार्मिक बहसों में उलझाया जा रहा है। पढ़ाई कैसे बेहतर हो, फैकल्टी का प्रदर्शन कैसे सुधरे, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम कैसे बढ़ें, स्टार्टअप और रिसर्च को कैसे प्रोत्साहन मिले—इन मुद्दों पर उतनी सक्रियता दिखाई नहीं देती, जितनी “एंटी-कन्वर्जन सेल” जैसे अभियानों पर दिखाई देती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की राजनीति पर आलोचकों का आरोप लंबे समय से यही रहा है कि असली मुद्दों से ध्यान हटाकर भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दों को केंद्र में रखा जाता है। बेरोजगारी पर सवाल उठे तो धर्म की बहस शुरू कर दो। महंगाई पर चर्चा हो तो सांस्कृतिक खतरे का शोर बढ़ा दो। शिक्षा व्यवस्था की खामियां सामने आएं तो किसी नए वैचारिक अभियान का ऐलान कर दो। नतीजा यह होता है कि जनता की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और सरकार की जवाबदेही पीछे छूट जाती है।

आज उत्तर प्रदेश के लाखों युवा डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक आम खबर बन चुकी है। सरकारी पद वर्षों तक खाली पड़े रहते हैं। निजी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण अवसर सीमित हैं। लेकिन इन समस्याओं पर उतनी तत्परता दिखाई नहीं देती जितनी कैंपसों में “एंटी-कन्वर्जन सेल” बनाने में दिखाई दे रही है।

विश्वविद्यालयों का उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान का विस्तार होना चाहिए। अगर कैंपसों को लगातार संदेह, निगरानी और वैचारिक नियंत्रण के दायरे में रखा जाएगा, तो शिक्षा का वातावरण कमजोर होगा, मजबूत नहीं। दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय इसलिए महान नहीं बने क्योंकि वहां निगरानी समितियां थीं; वे इसलिए महान बने क्योंकि वहां विचारों की स्वतंत्रता, शोध और नवाचार को महत्व दिया गया।

देश के युवाओं को सेल नहीं, स्किल चाहिए। निगरानी नहीं, नौकरी चाहिए। भय नहीं, भविष्य चाहिए। लेकिन लगता है कि सत्ता को भविष्य से ज्यादा फिक्र उन मुद्दों की है जिनसे राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा हो सके।

आखिरकार सवाल वही है—क्या एंटी-कन्वर्जन सेल बेरोजगार युवाओं को नौकरी देगा? क्या इससे कैंपस प्लेसमेंट बढ़ेंगे? क्या इससे रिसर्च पेपरों की संख्या बढ़ेगी? क्या इससे विश्वविद्यालय विश्व रैंकिंग में ऊपर जाएंगे?

अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर यह समझना कठिन नहीं कि असली मकसद शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि बहस का विषय बदलना है।

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