राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर देश में चल रहे राजनीतिक और जनआंदोलन के बीच अब एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने विवाद को और ज्यादा गंभीर बना दिया है। केरल की कांग्रेस नेतृत्व वाली UDF सरकार ने ज्ञानेश कुमार से जुड़े करीब 20 साल पुराने कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की प्रारंभिक जांच फिर शुरू करने का आदेश दिया है। राज्य सरकार ने Vigilance and Anti-Corruption Bureau यानी VACB को मामले की दोबारा पड़ताल करने को कहा है। यह वही दौर है जब ज्ञानेश कुमार केरल कैडर के IAS अधिकारी के रूप में लोक निर्माण विभाग यानी PWD के सचिव थे।
यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब देशभर में विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और उनके इस्तीफे की मांग लगातार तेज हो रही है। दिल्ली से मुंबई और जम्मू तक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। विपक्ष SIR यानी मतदाता सूची के Special Intensive Revision को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है और अब केरल सरकार द्वारा पुराने आरोपों की जांच दोबारा शुरू किए जाने से राजनीतिक टकराव का एक नया मोर्चा खुल गया है।
20 साल पुरानी फाइल फिर खुली, सवाल—आखिर मामला क्या है?
केरल सरकार के इस कदम का संबंध 2006 के आसपास सामने आए Lee See Been विवाद से जुड़े कथित भ्रष्टाचार आरोपों से बताया गया है। उस समय ज्ञानेश कुमार केरल के PWD सचिव थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन के निर्देश पर मामले को लेकर Vigilance जांच कराई गई थी। अब मौजूदा UDF सरकार ने उस पुरानी जांच के निष्कर्षों को फिर से देखने का फैसला किया है।
राज्य के गृह विभाग ने 2006 में हुई Crime Branch जांच से संबंधित निष्कर्ष मांगे हैं ताकि मामले पर कानूनी राय ली जा सके। साथ ही केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने VACB को पहले हुई Vigilance जांच के निष्कर्षों की दोबारा समीक्षा करने का निर्देश दिया है।
यानी करीब दो दशक पुरानी फाइल अब फिर से सरकारी जांच की मेज पर है। सवाल यह है कि उस समय लगाए गए आरोपों में वास्तव में क्या सामने आया था, पुरानी जांच में क्या निष्कर्ष निकले थे और अब नए सिरे से जांच की जरूरत क्यों महसूस हुई? इन सवालों के जवाब जांच आगे बढ़ने के साथ ही सामने आएंगे।
समय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण—CEC पर देशभर में आंदोलन
इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि ज्ञानेश कुमार इस समय देश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और उनके खिलाफ विपक्ष पहले से सड़क पर है। कांग्रेस सहित INDIA bloc के कई दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और मतदाता सूचियों में कथित बदलाव को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने हाल ही में कहा था कि ज्ञानेश कुमार के लिए इस्तीफा देना ही सबसे समझदारी वाला कदम होगा। विपक्ष का कहना है कि यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जनता या राजनीतिक दलों का विश्वास कमजोर होता है तो इसका असर पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है।
अब केरल में उनके पुराने कार्यकाल से जुड़े आरोपों की जांच फिर शुरू होना इस राजनीतिक लड़ाई को एक नया आयाम देता है।
लेकिन जांच का आदेश दोष साबित होना नहीं है
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। प्रारंभिक जांच का आदेश अपने आप में किसी व्यक्ति को भ्रष्टाचार का दोषी साबित नहीं करता। 2006 के आरोपों की वास्तविक प्रकृति, उस समय हुई जांच के निष्कर्ष और अब VACB की दोबारा समीक्षा—इन सभी तथ्यों के सामने आने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
लेकिन राजनीतिक स्तर पर सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि जिस अधिकारी को लेकर आज देश की चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर बहस चल रही है, उसी के पुराने प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़े आरोपों की फाइल दोबारा खोली जा रही है। इससे विपक्ष को केंद्र और चुनाव आयोग पर अपने हमले को और धार देने का मौका मिलना तय माना जा रहा है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन अब राष्ट्रीय मुद्दा
दिल्ली में CEC के खिलाफ प्रदर्शन, मुंबई में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का मार्च, जम्मू में INDIA bloc का प्रस्तावित “Save Democracy” आंदोलन और अब केरल में पुराने भ्रष्टाचार आरोपों की जांच—इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
विपक्ष पहले ही ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद आक्रामक है। कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR के जरिए मतदाता सूची में बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। दूसरी ओर राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में SIR पूरी तरह रद्द करने की मांग की है और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की वकालत की है। उद्धव ठाकरे ने तो ज्ञानेश कुमार को BJP का “हथियार” तक बताया है।
अब केरल सरकार की कार्रवाई ने इस राजनीतिक आग में एक और मुद्दा जोड़ दिया है।
क्या पुरानी जांच बनेगी नई मुसीबत?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या 2006 की पुरानी फाइल ज्ञानेश कुमार के लिए नई राजनीतिक और कानूनी मुश्किल बन सकती है? इसका जवाब फिलहाल जांच के परिणाम पर निर्भर करेगा। यदि VACB को पुराने आरोपों में ऐसे तथ्य मिलते हैं जिन पर आगे कार्रवाई की जरूरत हो, तो मामला निश्चित रूप से गंभीर राजनीतिक प्रभाव डाल सकता है। लेकिन यदि पुरानी जांच के निष्कर्ष ही आरोपों को पुष्ट नहीं करते, तो तस्वीर अलग होगी।
फिलहाल इतना जरूर है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहा विवाद अब केवल SIR, चुनावी पारदर्शिता या इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। उनके पुराने प्रशासनिक कार्यकाल की एक 20 साल पुरानी फाइल फिर से खुल गई है।
और ऐसे समय में जब विपक्ष पहले ही पूछ रहा है कि “क्या ज्ञानेश कुमार को पद पर बने रहना चाहिए?”, केरल से आई इस कार्रवाई ने एक और बड़ा सवाल सामने रख दिया है—क्या यह पुरानी जांच आगे चलकर CEC ज्ञानेश कुमार के लिए नई मुसीबत का कारण बनेगी?
फिलहाल इसका फैसला जांच करेगी, राजनीति नहीं। लेकिन इतना साफ है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजनीतिक दबाव का दायरा लगातार बढ़ रहा है।


