ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 17 अक्टूबर 2026
खामोशी के पीछे की आवाज
मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी हूं। मेरी खामोशी को चुप्पी मत समझिए। मेरी अलमारियों में लाखों किताबें हैं—हर किताब एक पूरा जमाना है, हर पन्ना किसी की सांस है। मेरी हर मेज ने न जाने कितनी रातों की मेहनत, कितनी बेचैनी और कितनी अधूरी उम्मीदों को अपने पास से गुजरते देखा है। मैंने उन आंखों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है जिनमें बड़े-बड़े ख्वाब थे, लेकिन जेब खाली थी। मैंने उन नौजवानों की कहानियां अपने भीतर संभाल रखी हैं, जो छोटे शहरों और गांवों से यहां आए, मुश्किलों का मुकाबला किया, रात-रात भर जागकर पढ़े और एक दिन दुनिया में अपनी जगह बना ली। मेरी दीवारों के बीच सिर्फ किताबें नहीं हैं, यहां कई पीढ़ियों के ख्वाबों की गूंज भी है।
हर साल उठने वाला सवाल
हर साल 17 अक्टूबर को, जब सर सैयद अहमद खान का जन्मदिन आता है, मेरे भीतर एक तेज सवाल उठता है—जिस शख्स ने तालीम को समाज की तकदीर बदलने का हथियार बनाया, क्या आज हम उसके पैगाम को सचमुच समझ रहे हैं, या सिर्फ तस्वीरों, तकरीरों और समारोहों में उसकी याद मना रहे हैं?
वह दौर जब सब कुछ टूट रहा था
मैंने सर सैयद को अपनी आंखों से चलते हुए नहीं देखा। मैं उनके दौर की चश्मदीद गवाह नहीं हूं, लेकिन उनकी सोच, उनकी मेहनत, उनकी हिम्मत और उनके ख्वाब से जुड़ी किताबों, दस्तावेजों और तारीख को अपने भीतर समेटे हुए हूं। 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में पैदा हुए उस शख्स ने ऐसे वक्त में तालीम की बात की, जब 1857 के बाद हिंदुस्तानी समाज गहरे जख्मों से गुजर रहा था। मुस्लिम समुदाय खास तौर पर संदेह, भय और पिछड़ेपन के साये में था। बहुत से परिवार बर्बाद हो चुके थे, नए जमाने की तालीम तक पहुंच लगभग नामुमकिन थी और आगे बढ़ने के रास्ते सिकुड़ते जा रहे थे।
हिम्मत का वह फैसला
सर सैयद ने खुद उस तूफान को करीब से देखा। उन्होंने ‘असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद’ लिखकर विद्रोह के कारणों का विश्लेषण किया और महसूस किया कि सिर्फ अपने शानदार अतीत पर फख्र करने से आने वाला कल बेहतर नहीं बनाया जा सकता। दुनिया बदल रही है, इसलिए दुनिया को समझना होगा। साइंस सीखना होगा, अंग्रेजी और नई तालीम हासिल करनी होगी, और अपने बच्चों को ऐसे मौके देने होंगे जिनसे वे वक्त के साथ कदम मिलाकर चल सकें। उनकी इस सोच से हर कोई सहमत नहीं था। रूढ़िवादियों ने उनका विरोध किया, उन्हें काफिर तक कहा गया, लेकिन उन्होंने अपने मिशन को अधूरा नहीं छोड़ा।
इल्म की पहली ईंटें
9 जनवरी 1864 को गाजीपुर में उन्होंने साइंटिफिक सोसाइटी की बुनियाद रखी, ताकि पश्चिमी साइंस और जरूरी विषयों की किताबें उर्दू में लोगों तक पहुंच सकें। 1869-70 में वे इंग्लैंड गए, लगभग सत्रह महीने वहां रहे, ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसी संस्थाओं को देखा और लौटकर दिसंबर 1870 में ‘तहज़ीब-उल-अख़लाक़’ शुरू किया—ताकि लोग तालीम, अखलाक और समाज सुधार पर खुलकर सोचें। फिर 24 मई 1875 को अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल स्कूल की शुरुआत हुई। 8 जनवरी 1877 को वायसराय लॉर्ड लिटन ने इसकी नींव का पत्थर रखा। 1920 में यह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बन गई।
ख्वाब जो इंसान के बाद भी जिंदा रहा
सर सैयद 27 मार्च 1898 को इस दुनिया से रुखसत हो गए, लेकिन उनका ख्वाब खत्म नहीं हुआ। इंसान चला जाता है, उसकी सोच आने वाली नस्लों को रास्ता दिखाती रहती है। यही किसी बड़े मिशन की असली ताकत है।
उन नामों की चमक
मैंने अपनी किताबों में उन लोगों के नाम पढ़े हैं, जिन्होंने अलीगढ़ की शैक्षणिक परंपरा से जुड़कर अलग-अलग मैदानों में अपनी पहचान बनाई। भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी, मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर, अपनी आवाज से दिलों को छूने वाले तलत महमूद, बड़े इतिहासकार इरफान हबीब, आणविक जीवविज्ञान के अग्रदूत ओबैद सिद्दीकी, समुद्री विज्ञान के माहिर सैयद जहूर कासिम (जिन्होंने भारत के पहले अंटार्कटिका अभियान का नेतृत्व किया), हॉकी के मशहूर खिलाड़ी जफर इकबाल—ये नाम इस परंपरा की अलग-अलग झलकियां हैं। डॉ. बुशरा अतीक ने कैंसर रिसर्च में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार जीता। ये नाम बताते हैं कि तालीम इंसान के लिए कितने रास्ते खोल सकती है।
बेटियों की तालीम का अधूरा सफर
मैं बेटियों की तालीम के बारे में भी सोचती हूं। सर सैयद अपने दौर की सीमाओं से मुक्त नहीं थे। उन्होंने लड़कों की आधुनिक तालीम को प्राथमिकता दी। लेकिन किसी समाज की तरक्की की कहानी तब तक अधूरी है, जब तक उसकी बेटियों को बराबरी के मौके न मिलें। आज महिलाएं साइंस, मेडिकल रिसर्च, सियासत और कला में अपनी काबिलियत साबित कर रही हैं। फिर भी सवाल बाकी है—क्या हर बेटी को अपनी काबिलियत दिखाने का बराबर मौका मिलता है? गरीबी या समाज की सोच के नाम पर कितने ख्वाब छोटे कर दिए जाते हैं?
जब हक मारे जा रहे हों और जबान पर ताला लग रहा हो
अब मैं आज के हिंदुस्तान को देखती हूं। इंटरनेट है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है, मुकाबला तेज है। लेकिन साथ ही वोट चोरी की बयार बह रही है, SIR के नाम पर लाखों-करोड़ों नाम काटे जाने की चर्चाएं हैं, लोगों के हक मारे जा रहे हैं, ज्यादतियां हो रही हैं और रोजगार की दुश्वारियां सख्त हो गई हैं। नौजवानों के ख्वाब बड़े हैं, लेकिन डिग्री के बाद भी नौकरी की तलाश में भटकना आम हो गया है। कहीं अच्छे स्कूलों की कमी है, कहीं काबिल शिक्षक नहीं और कहीं ऊंची तालीम का खर्च पहुंच से बाहर है। ऐसे में सर सैयद को याद करना सिर्फ पुरानी तारीख का जश्न नहीं हो सकता।
तालीम का आज का मतलब
आज तालीम का मतलब सिर्फ अंग्रेजी सीखना या डिग्री हासिल करना नहीं है। इसका मतलब अपने हकूक को जानना, सही और गलत में फर्क करना, अफवाह और सच के बीच अंतर करना और किसी बात को आंख मूंदकर मानने के बजाय सवाल पूछना भी है। रब्बे ज़िद्नी इल्मा—इल्म बढ़ाने की यह दुआ आज और भी जरूरी हो गई है। बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है—यह बात आज और भी तेज और अहम हो गई है।
सवाल पूछने की हिम्मत
मैं यह भी जानती हूं कि सर सैयद की जिंदगी और उनकी सोच को समझने के लिए सवाल पूछना जरूरी है। किसी बड़े शख्स की इज्जत करने का मतलब यह नहीं कि उसकी हर बात को बिना सोचे सही मान लिया जाए। असल इज्जत यह है कि उसके अच्छे कामों से सीखा जाए, उसकी कमजोरियों को समझा जाए और अपने दौर की जरूरतों के हिसाब से आगे बढ़ा जाए। आज जरूरत ऐसे संस्थानों की है जहां नए खयाल पैदा हों, रिसर्च हो और छात्रों को खुलकर सवाल पूछने का मौका मिले—ताकि वे न सिर्फ नौकरी पा सकें, बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा भी कर सकें और अपनी जबान आजाद रख सकें।
17 अक्टूबर की असली मांग
हर साल 17 अक्टूबर को जब सर सैयद डे मनाया जाता है, तो मैं चाहती हूं कि लोग मेरी अलमारियों में रखी किताबों की खामोश आवाज भी सुनें। मैं चाहती हूं कि कोई गरीब बच्चा यहां आकर किताब खोले और उसे अपने सपनों तक पहुंचने का रास्ता मिले। कोई बेटी अपनी पसंद का विषय पढ़ सके। कोई नौजवान साइंस के मैदान में नई खोज करे और अपने हकूक को समझने की ताकत हासिल करे। सर सैयद का नाम अच्छे स्कूलों, मजबूत लाइब्रेरी, छात्रवृत्तियों और हर बच्चे को मिलने वाले बराबर मौकों में दिखाई दे।
रोशनी जो कभी पुरानी नहीं होती
मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी हूं। मेरी असली पहचान उन लोगों से है, जिन्होंने यहां आकर इल्म हासिल किया और दुनिया में अपना नाम बनाया। कोई समाज सिर्फ अपने अतीत पर फख्र करके आगे नहीं बढ़ सकता। सर सैयद अहमद खान को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हिंदुस्तान का हर बच्चा अच्छी तालीम हासिल कर सके, हर बेटी को आगे बढ़ने का मौका मिले, इल्म किसी दीवार में कैद न रहे और लोग अपने हकूक को जानने, सवाल करने और जबान आजाद रखने के काबिल बनें।
आज भी खड़ा सवाल
सर सैयद का दौर गुजर गया, लेकिन उनका सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है: हम अपने बच्चों को कैसा मुस्तकबिल दे रहे हैं? क्या हम उन्हें सिर्फ डिग्री दे रहे हैं या सोचने-समझने, सवाल करने और अपने अधिकारों की रक्षा करने की ताकत भी दे रहे हैं? इमारतें पुरानी हो जाती हैं, किताबों के पन्ने पीले पड़ जाते हैं, पीढ़ियां बदल जाती हैं, लेकिन इल्म की रोशनी कभी पुरानी नहीं होती। जब हक मारे जा रहे हों, ज्यादतियां हो रही हों, रोजगार न मिल रहा हो और जबान पर ताला लग रहा हो, तब सर सैयद सिर्फ जरूरी नहीं, बल्कि बेइंतहा जरूरी हैं।
फैज की नज़्म के साथ
फैज अहमद फैज की मशहूर नज़्म के साथ सर सैयद डे की सभी को बेशुमार मुबारकें और नेक ख्वाहिशात…..
हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
— एक लाइब्रेरी की जुबानी, सर सैयद के ख्वाब और आज के हिंदुस्तान की जरूरत।



