एबीसी डेस्क 5 जनवरी 2026
यह तस्वीर सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं, बल्कि उस दौर की याद है जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत अपनी शर्तों पर खड़ा होना जानता था। सामने हैं वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़—लैटिन अमेरिका के शेर, अमेरिकी वर्चस्व को खुली चुनौती देने वाले नेता। उनके अगल-बगल खड़े हैं हिंदुस्तान के दो ऐसे बाघ (तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति एपीजे कलाम), जो किसी माफ़ीवीर एनजीओ के प्रशिक्षित दुमछल्ले नहीं थे, राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाली सोच के प्रतीक थे। यह वह समय था जब दोस्ती, समझौते और कूटनीति का मतलब आत्मसम्मान से समझौता करना नहीं होता था।
साल 2004 में देश में यूपीए की सरकार बनी और महज़ एक साल बाद, 2005 में, ह्यूगो शावेज़ भारत आए। वह दौर आसान नहीं था। अमेरिका का दबाव खुलकर मौजूद था—वेनेजुएला से नज़दीकी बढ़ाने को लेकर चेतावनियां, इशारे और वैश्विक राजनीति की चालें अपने पूरे ज़ोर पर थीं। लेकिन भारत ने उस समय साफ़ कहा—“समझौता होगा, कोई कुछ भी कर ले।” यह कोई भावनात्मक बयान नहीं था, बल्कि रणनीतिक आत्मविश्वास का संकेत था। सरकार के भीतर भी यह साफ़ संदेश था कि फैसले वॉशिंगटन देखकर नहीं, बल्कि दिल्ली के हित देखकर होंगे।
कहते हैं उस वक्त “सरदार जी” ने मिसाइलमैन से साफ़ कहा—“आगे बढ़ा जाए।” और मिसाइलमैन ने बिना किसी हिचक के जवाब दिया—“यकीनन, देश पहले है।” यही वह संवाद था जिसने इतिहास की दिशा तय की। इसके बाद भारत और वेनेजुएला के बीच ऊर्जा, तेल, तकनीक और रणनीतिक सहयोग को लेकर ताबड़तोड़ समझौते हुए। यह सिर्फ़ काग़ज़ी करार नहीं थे, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संतुलन की राजनीति में एक ठोस कदम थे।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे दिलचस्प और प्रतीकात्मक तस्वीर वह है, जब भारत यात्रा के अंत में ह्यूगो शावेज़ ने तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को गले लगाया। यह महज़ औपचारिक शिष्टाचार नहीं था, बल्कि उस दौर की राजनीति का आईना था। तब विपक्ष और पक्ष, बड़ा-छोटा, विचारधारा की खाइयों में पूरी तरह बंटा हुआ नहीं था। राष्ट्रीय हित के सवाल पर एक साझा समझ थी—देश की विदेश नीति दलों से ऊपर होती है।
आज जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोस्ती और दुश्मनी अक्सर सोशल मीडिया की सुर्खियों और बयानबाज़ी से तय होती दिखती है, तब शावेज़ की वह भारत यात्रा एक सवाल छोड़ जाती है—क्या हम आज भी वैसी ही बेबाकी, वैसा ही आत्मविश्वास और वैसी ही सर्वदलीय परिपक्वता दिखा पाते हैं? वह दौर शायद इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि तब देश पहले था—बिना शोर, बिना डर और बिना किसी से माफ़ी मांगे।



